Gulabkothari's Blog

जुलाई 27, 2009

संकल्प-4

प्रारब्ध भी
देता है
संकल्प और
विकल्प,
बनते हैं भावों से
जुड़कर वर्तमान में,
करते हैं कर्म
पाने को फल
संकल्पित मन से,
दु:ख है
फल का संकल्प
मानव जीवन का,
फल नहीं होता
हमारे हाथ,
कब मिलेगा
कौन जाने,
कितने जनम बाद,
क्यों प्रतीक्षा
करें फल की
मानव
कर्म हजार हैं
जीवन में
संकल्प एक है,
बदलता नहीं,
समय के साथ,
जूझता है
बने रहने को
संकट काल में
हर हाल में,
तभी मिलती है
कीर्ति उसको,
बढ़ता है
यश उसका,
मिलता है सबको
भाग्य से,
संकल्प है तुष्टि
स्पर्द्धा रहित,
ईष्र्या रहित
कामना रहित,
अनूठा हर मानव
अनूठा ही
हर संकल्प,
ईश्वर अंश
अनूठे रूप में।
संकल्प करता है
विकसित
इस अंश को,
जोड़ता है
हर अंश को
प्राणी मात्र को,
विकसित होती है
उत्कृष्टता जीवन की,
सेवा, भक्ति रूप
मातृभाव से।
नारी अग्रणी है
संकल्प की,
वही करती है
संकल्पित
पुरूष्ा को भी,
बना देती है
उध्र्वमुखी,
शीतल करके
उसका अहं भाव।
बना देती है
उसे सृष्टा
ब्रह्मा की तरह
और बन जाते हैं
आकाश-वायु
अगिA-आदित्य
आगे से आगे,
हर मोड़ पर
मिलता है सोम
अगिA को
बढ़ जाता है
यज्ञ आगे
संकल्प से।
दो धाराएं
संकल्प की भी
युगल सृष्टि जैसे
देव भी-असुर भी
देश की सतियां
बनी सभी
संकल्प से
रहने को साथ
पति के
मरते दम तक,
आज की नारी
संकल्पित है
भारत की
जीने को
पति के घर में
मरते दम तक,
हर हाल में
क्योंकि
नर्क बना देता
विकल्प
जीवन को
सीमा नहीं कोई
विकल्प की,
नहीं दिशा कोई,
टूट जाता है
स्थायी भाव
जीवन का,
कहां रहती है
सुरक्षा
खतरों से,
असुरों से,
फिर रह जाता
मातृ गृह मात्र
आश्रय जीवन का,
वह भी तब
जब न हो
अन्य कोई
रहता वहां
पश्चिम की तरह,
बुढ़ापे में
अकेली नार
साथ उसके
अकेली पुत्री
और
नाती उसके
काटते भर हैं
उम्र के दिन
रीत जाता है
सुख
बिखर जाते हैं
सपने सारे,
संजोए हुए
अरमान
एक हठ से
अभिनिवेश से,
जो नहीं करती
स्वीकार
यथार्थ को,
देती है चुनौती
कुदरत को
ठुकराकर
सारा सम्मान
व्यवस्था का,
भूल जाती है
संकल्प अपना
समर्पण का,
भूल जाती है
आना-जाना
जीवन का
केवल नारी का,
नर नहीं जाता
नारी घर,
नहीं छोड़ता
अपना घर
किसी भी हाल में,
सृष्टि बस
भ्रमण है
नारी का, माया का
वही क्रिया है
वही शक्ति है
संकल्प है
विश्व सृजन का,
वही बनाती है
संस्कृति
इस धरती की
मानवता की,
वही लूटती है
भोग सारा
वही कुचलती है
अहंकार नर का,
बना दे संतान
असुर जैसी,
पशु भाव में,
वही लील जाएगी
सारी मानवता,
कर देगी शून्य
धरती को
मनुष्य योनि से,
अपने संकल्प से।
तभी पूजते हैं
नारी को
विश्व भर में
प्रसन्न रखते हैं
ताकि न डोले
उसका संकल्प
न बन जाए
दुर्गा कहीं,
फिर क्या बचेगा
किसी के लिए।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. I am regular reader of your spandan and for last two three articles were so touching that today i have gone through all of your articles , in one of article you have quoted” dukh me rote rote bhi hasi aa jati he ” . My god you have either observe the world a lot or you have reached your inner soul which have total knowledge of the globe for many many years. regards

    टिप्पणी द्वारा Surendra Rajpurohit — जनवरी 11, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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