Gulabkothari's Blog

अगस्त 3, 2009

शब्द-शक्ति

हमारे जीवन-व्यवहार का अभिन्न अंग है— शब्द। इसके बिना जीवन-व्यवहार का आदान-प्रदान बहुत सीमित हो जाता है। प्रश्न उठता है क्या शब्द की महता केवल सम्प्रेषण ही है, क्या व्यवहार बनाए रखने तक ही है आचार्यो ने जितना महत्व शब्द का बताया है, उससे कहीं बड़ा मौन का महत्व भी बताया है। क्या मौन में शब्द लुप्त हो जाते हैं हर देश की अपनी भाषा और हर भाषा की अपनी वर्णमाला होती है। क्या वर्णमाला का उद्देश्य मात्र भाषा का स्वरूप तय करना ही होता है जीवन में शब्द को ही मंत्र के रूप में पूजा जाता है। इनके पीछे कौन-सा सिद्धान्त है।
हमारी सृष्टि वाक्-सृष्टि है। अव्यय वाक् से यह सृष्टि पैदा होती है। अव्यय गो-लोक के अधिष्ठाता श्रीकृष्ण हैं। अव्यय का मन अथवा श्वोवसीयस मन इसके केन्द्र में है जो सब में है। स्मरण रहे कि वेद में मन शब्द का संकेत केवल अव्यय पुरूष की पांच कलाओं में ही आया है, अक्षर या क्षर पुरूष की कलाओं में मन का नाम नहीं है। इन दोनों पुरूष भावों में अव्यय पुरूष का मन ही प्रतिबिम्बित होता है। मन, प्राण, वाक् एक साथ रहते हैं। वाक् के दो रूप होते हैं—एक अर्थवाक्, जिसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी और दूसरा शब्दवाक्, जिसकी अधिष्ठात्री महासरस्वती हैं। वैदिक मंत्रों की सहायता से यज्ञ द्वारा इच्छित वस्तुएं प्राप्त करना हमारे पुराणों में बार-बार स्पष्ट किया गया है। आज भी इच्छापूर्ति के लिए मंत्र सिद्धि का प्रचलन उतना ही बड़ा है। चारों ओर इसे देखा जा सकता है। एक से दूसरे की प्राप्ति अथवा एक या दूसरे में रूपान्तरण हो सकता है। मूल में दोनों एक ही हैं।
सृष्टि की आदि में शब्द का मूल आधार नाद को माना गया है। वही ब्रह्म के रूप में स्थापित है। परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी ये चारों वाक् की स्थितियाँ अथवा स्वरूप हैं। हमारी भाषा, बोलचाल की भाषा वैखरी कहलाती है। वैखरी शब्द का स्थूल स्वरूप है जो लौकिक व्यवहार का कारण बनता है। स्थूल शब्द के भेदों को अनेक श्रेणियों में बांटा गया है। उदात्त, अनुदात्त और त्वरित भेदों से शब्द के उच्चारण को सात स्वरों में बांटा गया है।
शुद्ध सात्विक भाव का शब्द मंत्र कहलाता है। मनन करने से त्राण अथवा रक्षा करने वाले शब्द को मंत्र कहते हैं। मंत्र के अभ्यास से मलिनता से होने वाले दोषों से मुक्ति मिलती है और सात्विक भाव पैदा होते हैं। मंत्र के जप को उच्चारण के अनुसार वाचिक, उपांशु और मानस की तीन श्रेणियों में बांटा गया है। जिस जप में शब्द स्पष्ट उच्चारणपूर्वक ध्वनि के साथ सुनाई दे, उसे वाचिक कहते हैं। जिसमें शब्द तो सुनाई नहीं देता, किन्तु होठ हिलते हुए नजर आते हैं, उसे उपांशु कहते हैं और अर्थज्ञानपूर्वक मन से ही किया जाने वाला जप मानस जप कहलाता है।
जो कुछ सृष्टि में है वह सब हमारे शरीर में भी वैसा ही है। इसके अनुसार वाक् के चारों रूप—परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी हमारे शरीर के भीतर भी हैं। परा वाक् का स्थान मूलाधार है। हमारी सभी अभिव्यक्तियां मूलाधार से ही उठती हैं। सारे अनुभव हमारी स्मृति में मूलाधार से होकर अंकित होते हैं। शब्द की उत्पत्ति वर्णो से होती है। कुछ लोग वर्णो की संख्या तिरेसठ मानते हैं, कुछ चौंसठ; वर्ण की उत्पत्ति नाद से है। नाद अव्यक्त होता है जबकि वर्ण व्यक्त होता है। नाद ही प्रकाश पैदा करता है। इसी का नाम स्फोट है। आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थो को लेकर मन के साथ बोलने की इच्छा से युक्त होती है (परा वाक्)। मन शरीर की अग्नि में आघात करता है। यह आघात वायु को प्रेरित करता है (पश्यन्ति), इससे वक्षस्थल में स्वर की उत्पत्ति होती है (मध्यमा) और कण्ठ से वैखरी नामक शब्द प्रकट होता है।
इसी को विपरीत क्रम में देखें तो वाचिक, उपांशु और मानस जप कण्ठ से वक्षस्थल और वक्षस्थल से नाभि की ओर जाते प्रतीत होते हैं। यही अभ्यास क्रमश: व्यक्ति को मूलाधार में प्रवेश कराता है, जहां परावाक् का आसन है। इसी को कुण्डलिनी कहते हैं। ज्ञान, भक्ति, जप आदि किसी भी मार्ग से अभ्यास के द्वारा इस प्रकाश तक पहुंचा जा सकता है। शब्द सबसे सरल मार्ग प्रतीत होता है। मंत्र के अनुसार इसे साधा जा सकता है। उसे विशेष ज्ञान के चक्कर में पड़ने की आवश्यकता नहीं होती। केवल आस्था चाहिए। व्यक्ति मंत्रों द्वारा परावाक् का विकास करता है। जैसे-जैसे वाक् की सूक्ष्म अवस्था आती है, उसे नाद कहते हैं। यही नाद आगे स्थूल होकर शब्द बन जाता है। इसी क्रम में परावाक् भी आवृत होती चली जाती है। माया अथवा अज्ञान का तारतम्य बढ़ता जाता है।
जिस प्रकार घट, कलश और कुम्भ के अर्थ समान होते हैं, उसी प्रकार देवता, मंत्र और गुरू भी एक ही होते हैं। ये अभेद भी कहे गए हैं और नित्य भी। मंत्रों के उच्चारण से पूर्व ऋषि, छंद और मंत्र का देवता विनियोग में याद किया जाता है। अशुद्धि के कारण अनर्थ होना भी स्वाभाविक माना गया है। इसी प्रकार केवल सात्विक मंत्र ही साधना की सृष्टि से अथवा जीवन विकास के लिए उपयुक्त माने गए हैं। विशेष इच्छापूर्ति के लिए राजस और तामस मंत्रों का उपयोग परिस्थिति के अनुरूप किया तो जाता है, किन्तु उसको उचित नहीं माना जाता। ऎसे मंत्रों के उपयोग के साथ-साथ प्रायश्चित का भी विधान है।
शब्द कितना महत्वपूर्ण है यह मंत्र-शास्त्र से बहुत अच्छी तरह जाना जा सकता है। इसी से मितभाषी होने का प्रभाव भी समझ में आ जाता है। मितभाषण ही सत्य बोलने का आधार बनता है। शब्द के माध्यम से अनन्त ऊर्जाओं का क्षरण भी होता है। इस क्षरण को मितभाषण से बचाया जा सकता है। मंत्र में मूल रूप से छ: बातें देखने को मिलती हैं—मंत्र के उच्चारण की रीति छन्द से, मंत्र के आविष्कर्ता का परिचय ऋषि से तथा इष्ट फल देने वाले देवता का ज्ञान मंत्र एवं ध्यान से प्राप्त होता है। मंत्र का मूल तžव संक्षिप्त रूप से बीज में होता है। विरोधी प्रभावों को रोकने के लिए कीलक का प्रयोग होता है। अत: छन्द, ऋषि, देवता, बीज, कीलक और शक्ति मंत्रों के साथ होते हैं। चैतन्य शक्ति होकर ही मंत्र देवता का साक्षात्कार करवाता है।
शब्द-शक्ति का ज्ञान ही शब्द की शक्ति का सहचर है। ज्ञान का व्य†जक माना है—शब्द को। शब्द का अर्थ से सम्बन्ध है, अर्थ का ज्ञान से। ज्ञान से इच्छा और इच्छा से प्राण और प्राण की क्रिया शक्ति के द्वारा वाग्रूप आनन्द-भाव प्रकट करता है। इसीलिए हमारी वर्णमाला सृष्टि के साथ पूर्ण समन्वय रखने वाली, पूर्ण वैज्ञानिक वर्णमाला है। नाद से अक्षर, शब्द व मंत्र और मंत्र से नाद तथा नाद से लय तक शब्द ही कार्य करता है।

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5 टिप्पणियाँ »

  1. dhanyawad.aapki sabhi rachnaye our vichar bahut sudar labhprad he,jo apni bhartiya sansakruti our sabhyata ke pratik he,aajke samaya me bhi ye khubhi prasangik he our sadaahegi.kripya apna ye sahitya sastra ki adhyatma sewa banaye rakhege.

    टिप्पणी द्वारा goswami rajeshkumar — अगस्त 15, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. sirji
    wonderful information ,but all this has to be experienced at soul level ,otherwise itis just knowledge and not wisdom ! In kashi there are many pandits but thier personal experience with self-realisation and mantra shakti is zero! the practical use of these mnatras today for humanity is more important.There are thousands of yagyas performed in India and yet things dont improve becuse we have to change ourselves first! I still appreciate your efforts!

    swami avadhootananda

    टिप्पणी द्वारा wisdom9 — अगस्त 4, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. बढिया उपयोगी जानकारी से परिपूर्ण आलेख है। आभार।

    टिप्पणी द्वारा परमजीत बाली — अगस्त 3, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. मैं आपका पुराना प्रशंसक रहा हूँ ,जब मैं जोधपुर में ऍम बी ऍम कॉलेज में पठता था ,तबसे आपके आलेख चाव से देखा करता था .आज १५ साल बाद आपका आर्टिकल नजर आया ,दिल खुश हो गया . तहे दिल से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ !

    टिप्पणी द्वारा Dinesh Kumar Mali — अगस्त 3, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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