Gulabkothari's Blog

अगस्त 3, 2009

क्लेश

कष्ट को ही क्लेश कहते हैं। जीव, अविद्या और क्लेश पर्यायवाची हैं। ईश्वर विद्या रूप है। वहां क्लेश होते ही नहीं हैं। जीव ही अविद्या का पर्याय है। मन-प्राण और वाक् आत्मा के रूप हैं। जीवन चूंकि कर्मो के फल भोगने के लिए मिलता है, अत: इसमेे सुख और दु:ख दोनों साथ-साथ चलते हैं। सुख का मार्ग विद्या को बताया गया है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऎश्वर्य को विद्या कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश को पंच क्लेश या अविद्या रूप कहा है। ये पांचों ही जीवन में कष्ट पैदा करने वाले तत्व हैं। तम रूप हैं। अविद्या का मूल अर्थ है-यथार्थ को नहीं समझ पाना। उसकी अपनी समझ या ज्ञान के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ लगाना।

रजोगुण और तमोगुण द्वारा ज्ञान और कर्ममय ऎसे दोष उत्पन्न हो जाते हैं जो आत्म विद्या अथवा वास्तविक ज्ञान को ढंककर आत्मा में तमोगुण का विस्तार कर देते हैं। आत्म ज्योति आवृत्त हो जाती है। इनमें सम्मोहन रूप अज्ञान है। अभिनिवेश हठ रूप है। व्यक्ति के मन के अनिष्ट का भय बना रहता है। उसी डर से वह एक तरह से मोर्चा बनाकर खड़ा हो जाता है। राग-द्वेष नाम आसक्ति का है। जो सुखदायक लगे, उसके साथ चिपकना और दुखदायी लगे, उसे दूर रखने का प्रयास करना ही राग-द्वेष है। ममकार भी राग का ही रूप है, जिसमें व्यक्ति अपनों से आसक्त बना रहता है। व्यक्ति के सारे निर्णय इससे प्रभावित हो जाते हैं। प्रिय व्यक्ति में दोष दिखाई नहीं देता। अप्रिय में अच्छाई नजर नहीं आती। दोनों ही जगह हम गलत निर्णय कर बैठते हैं। मूल में व्यक्ति न अच्छा होता है, न ही बुरा। नित्य बदलता भी रहता है। हमारा पूर्वाग्रह ही उसे अच्छा-बुरा मानता है। और वह भी पुराने अनुभवों के कारण।
अस्मिता अहंकार की जनक मानी गई है। ये सब विद्या क्षेत्र को ढंक लेते हैं। कृष्ण कहते हैं कि अव्यय ब्रह्म के धातु रूप ज्ञान और कर्म को समान अवस्था में रखना चाहिए। इसको कृष्ण ने साम्यवाद कहा है।

ये क्लेश भी कम और अघिक होते रहते हैं। जब ये पूर्ण रूप में कार्य करते हैं, बन्धन शक्तिशाली हो जाता है। इस अवस्था को उदार कहा जाता है। इसका ही विपरीत स्वरूप शिथिल होता है, जब ये निर्बल होते हैं। कई बार किसी प्रबल कर्म के दबाव में आ जाते हैं। यह तनु अवस्था है। कभी-कभी दबाव में प्रसुप्त भी हो जाते हैं और दबाव हटते ही फिर उभर जाते हैं। यदि ज्ञान की अघिकता से या कर्म के भोग से ये सर्वथा नष्ट हो जाएं तो इनका स्वरूप छिन्न कहलाता है।

इन क्लेशों के कारण सत, रज, तम के स्वरूप बदल जाते हैं। उसी प्रकार के कारण बनते हैं। वैसे ही कर्म होते हैं। इस प्रकार एक कर्म से नए कर्म का मार्ग प्रशस्त होता है अथवा कर्म क्षय का द्वार खुलता जाता है। कर्म और विपाक के बीच ही मन पर क्लेश छाते रहते हैं। जब तक अविद्या का प्रभाव रहता है, ये क्लेश बने रहते हैं। वैसे विद्या और अविद्या दोनों ही ज्ञान के अंश हैं। विद्या शुद्ध और अखण्ड होती है, अविद्या मलिन और सखण्ड होती है। अविद्या में काम (इच्छा), कर्म और शुक्र (क्लेश) जुड़े होते हैं। अविद्या के कारण ही इनकी उत्पत्ति, स्थिति और बन्धन का क्रम चलता रहता है। विद्या के प्रभाव से प्रवृत्ति और निवृत्ति साथ बने रहते हैं। अविद्या के कारण ही जन्म, मृत्यु, आदान-विसर्ग और सुख-दु:ख पैदा होते हैं।

मन में कामना उठी, बुद्धि ने कहा कि पूरी करना है, प्राण गतिमान हुए। वाक् के एक-एक परमाणु का स्थान नए परमाणु लेने लगते हैं। अथवा एक परमाणु पर दूसरा परमाणु प्राणों के योग से बंधता है। इसी को चिति कहा जाता है। एक परमाणु पर दूसरे परमाणु की चिनाई होती है। वाक् का स्वरूप बदल जाता है। क्रिया से कर्म बदला, कर्म से परिणाम और परिणाम फिर नए कर्मो का मार्ग प्रशस्त करता है।

अज्ञान से तमोगुण उत्पन्न होता है। सबको यही मोह जाल में डालता है। प्रमाद, आलस्य, निद्रा आदि के द्वारा बन्धन में डालता है। राग मन को बांधने वाला है। द्वेष विज्ञान तत्व का आवरण करने वाला है। गीता में इसी को रजो रागात्मकम् विद्धि कहा गया। प्रकृति के तीनों गुणों में रजोगुण रागरूप होता है। वह पदार्थ की तृष्णा रूप आसक्ति से पैदा होता है। यही राग कर्म की आसक्ति से आत्मा का बन्धन करता है। काम की आसक्ति से किया गया कर्म आत्मा में अपूर्व वासना नाम का संस्कार पैदा कर देता है, जो विज्ञान रूप प्रकाश को ढक देता है।
अपेक्षा और उपेक्षा दो मूल वृत्तियां जीवन में बनी रहती हैं। अपेक्षा वृत्ति को प्रवृत्ति और उपेक्षा वृत्ति को निवृत्ति स्वरूप कहा गया है। इसमें लौकिक भावों की ओर उपेक्षा और आत्मा की ओर अपेक्षा के भाव को वैराग्य कहा गया है। उपेक्षा भाव विद्या मार्ग है और अभेद रहता है। अपेक्षा भाव अविद्या मार्ग है और अनन्त है। हमारे सारे कर्म विद्या-अविद्या से मिश्रित होते हैं। क्योंकि दोनों ही आत्मा से जुड़े होते हैं। यह कम-ज्यादा होते रहते हैं। शुद्ध विद्या में कर्म होता ही नहीं। जैसे-जैसे अविद्या बढ़ती जाती है, वैसे ही कामना और कर्म बढ़ते जाते हैं। ये ही आत्मा की गति के कारण हैं। गति टूटना एक बात है और आत्मा के आवरण हटना दूसरी बात। ये कार्य तो विद्या भाव से ही संभव है।

अविद्या के संयोग से विद्या (अखण्ड) भी खण्ड-खण्ड हो जाती है। इन खण्डों को ही मन कहा जाता है। यह अविद्या का पहला आवरण है। मन पर अविद्या का आघात होता है, जिससे उसका प्रकाश कम होता जाता है। शान्त मन अशान्त हो जाता है। गतिशीलता के कारण अब इसी मन की प्राण संज्ञा हो जाती है। जब इस प्राण की चेष्टा पूर्ण हो जाती है, तब स्वत: शान्त हो जाता है। इसी को वाक् कहते हैं। एक व्यापक आत्मा अविद्या के कारण खण्ड-खण्ड होकर मन-प्राण-वाक् बन गई। स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने लिखा है कि इस कारण अविद्या के भी तीन रूप बन जाते हैं। मन के साथ जुड़ने वाली अविद्या को काम, प्राण के साथ संसर्ग से कर्म और वाक् के संयोग से उसी को क्लेश कहते हैं। क्लेश और शुक्र पर्यायवाची भी हैं।

विद्या में भी तीन ही भाव उत्पन्न होते हैं। आत्मा के वाक् भाग में मन के प्रभाव से इच्छा, प्राण के प्रभाव को तप कहते हैं। इच्छा और तप के कारण वाक् का जो नया स्वरूप बनता है, उसे श्रम कहते हैं। इन तीनों के बिना कुछ नहीं होता। मन में इच्छा के कारण प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणुओं पर आक्रमण करता है। संघर्ष पैदा करता है। इस कारण परमाणु गर्म हो जाते हैं। इसी को तप कहते हैं। इसी से नए स्वरूप का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को श्रम कहते हैं। इसी प्रकार इच्छाएं उठती रहती हैं, तपन का क्रम चलता रहता है और भिन्न-भिन्न रूप में सृष्टि आगे बढ़ती जाती है।

हम यह जानते हैं कि सृष्टि अव्यय पुरूष से शुरू होती है। उसकी पांच कलाओं आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् में से मन का प्राण-वाक् की ओर गति करना ही अविद्या अथवा कर्म कहा गया है। हमारे पंचकोश का निर्माण भी इसी क्रम में होता है। अन्तिम वांग्मय कोश को ही स्थूल शरीर कहा गया है। अव्यय की यही वाक्, स्वरूप लेते-लेते स्थूल रूप ग्रहण करती है। हमारी जीवन यात्रा भी अविद्या को हटाते-हटाते स्थूल शरीर से शुरू होकर प्राण-मन और विज्ञान (प्रज्ञा) के सहारे आनन्द तक पहुंचती है। यही ज्ञान की भूमिका है, जिससे अविद्या के आवरण दूर करते-करते विद्या में आत्मा को प्रतिष्ठित किया जाता है। शुद्ध विद्या को ही ईश्वर कहते हैं। वहां कोई कर्म नहीं रहता। कोई कामना नहीं होती। ईशावास्य उपनिषद् में कहा है कि-

अंधम् तम: प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायांरता:।।
जो ज्ञान अंश को छोड़कर नितान्त कर्म के उपासक हैं, वे घोर अंधकार में डूब जाते हैं। जो कर्म मार्ग का परित्याग करके केवल ज्ञान की खोज में व्यसनी हो जाते हैं, वे इनसे भी गहरे अंधकार में डूबे हैं।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. sir,
    your articals[spandan] is very nice.I am really very inspire with you.
    HARIOM!

    टिप्पणी द्वारा sonal chaturvedi — अगस्त 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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