Gulabkothari's Blog

अगस्त 4, 2009

मीडिया और संस्कृति

हमारा देश आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण ने एक ओर अमरीकी डालर का तथा दूसरी ओर अंग्रेजी भाषा का महत्व बढ़ा दिया है। चूंकि हमारी शिक्षा में मानसिक परिपक्वता को स्थान नहीं है, अत: हम एक प्रवाह में पड़ गए। आंखें मूंदकर चले ही जा रहे हैं। अच्छे-बुरे अथवा उपादेय एवं हेय का भेद करना भूल गए। शिक्षित समाज धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति से और स्वयं अपनी आत्मा से दूर होता जा रहा है। अभी इनकी संख्या बहुत कम है, किन्तु इनका झुकाव अंग्रेजी संस्कृति एवं जीवन दर्शन की ओर दिखाई पड़ता है। ये ही लोग देश के नीति-निर्माता भी हैं।

परिणाम यह होता है कि जब भी कोई नीति संस्कृति में बदलाव की बात कहती है, तब टकराव की एक स्थिति बन जाती है। अधिकांश देशवासी मूल अवधारणाओं में बदलाव नहीं चाहते। नई संस्कृति इन मर्यादाओं को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। जैसा कि आज संविधान की धारा 377 के मामले में होता दिखाई पड़ता है।
ऎसे हालात में मीडिया की भूमिका को भी इसी भाषाई परिपेक्ष में देखना चाहिए। अंग्रेजी मीडिया और टीवी नई विचारधारा के पोषक दिखाई पड़ते हैं। आम आदमी से दूर रहने के कारण भारतीय मानसिकता को गहराई से नहीं समझ पाते। भारतीय शब्दों को अंग्रेजी में अनुवाद करके ही समझते हैं। अत: विदेशी विचारधारा एवं तर्क देकर विषयों को प्रस्तुत करते रहते हैं। भाषाई समाचार-पत्र लोगों के नजदीक भी रहते हैं और सांस्कृतिक विषयों के साथ भी जुड़े होते हैं। वे मूल्यों पर किसी भी दबाव का विरोध करते हैं। हमारे नीति-निर्माता इसीलिए अंग्रेजी मीडिया तथा टीवी पर आश्रित रहते हैं। वहां टकराव भी नहीं है और उनके अहंकार की तुष्टि भी हो जाती है। चिन्तनधारा भी एक सी होती है। इस प्रकार मीडिया भी देशी एवं अंग्रेजी भेद से दो भागों में बंट गया।

अंग्रेजी का सर्वाधिक प्रभाव हमारे अधिकारी एवं न्यायिक वर्ग पर दिखाई पड़ता है। इनकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण दोनों ही अंग्रेजी में होते हैं। इनकी जीवनशैली भी वैसी ही रहती है। इनके मुकाबले नेता आम आदमी के ज्यादा नजदीक होते हैं, किन्तु दोनों का चोली-दामन का साथ रहता है। नीतियां तो अधिकारी बनाते हैं। आम आदमी से तो इनका नाता ही नहीं रहा। विदेशी कानूनों और विश्लेषणों के आधार पर यहां भी कानून बनाते रहते हैं। देश में एक नई संस्कृति पैदा की जाने लगी है। नए कानूनों के कारण जनजीवन भी अस्त-व्यस्त और त्रस्त होने लगा है। इस ओर कानूनविदों का या नेताओं का ध्यान कभी नहीं जाता। देश में शान्ति के स्थान पर अशान्ति की प्रतिष्ठा होती है। टकराव तो सरकार से किया नहीं जाता, भ्रष्टाचार को अवश्य बढ़ावा मिलता रहता है।

आवश्यक यह है कि हम किसी व्यवस्था अथवा जीवन की अवधारणा को अच्छा-बुरा तो नहीं कहें, किन्तु हर निर्णय का दूरगामी परिणाम तो निर्णय करने से पहले समझ लें। यही तो नहीं होता। जिन लोगों को ईश्वर ने देश चलाने के लिए संसद में बिठाया, वे भी यदि प्रवाह में बहने लगे, तब दोष हम किस को देंगे।
हमें न अंग्रेजी से विरोध है, न ही किसी अन्य भाषा से। भाषा तो माध्यम ही है। जब तक माध्यम रहती है, तब तक कोई हानि भी नहीं होती। हो क्या रहा है कि हमारे शब्दों के समकक्ष अंग्रेजी शब्द ढूंढ़कर दोनों के पूरक की तरह काम लेने लग गए हैं। इस दोष को यदि दूर कर लिया जाए, तो टकराव स्वत: ही रूक जाएगा। उदाहरण के लिए हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है। धर्म की परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो व्यक्तियों का धर्म एक नहीं हो सकता। हर व्यक्ति का अपना निजी धर्म होता है। धर्म को हम अंग्रेजी के रिलिजन में बदल दें तो वह साम्प्रदायिक/सामूहिक स्वरूप है। संविधान का सम्प्रदाय निरपेक्ष होना तो सही होगा। धर्मनिरपेक्ष अथवा अधर्मी होना वांछित नहीं है। धर्म की तरह शिक्षा भी एक अवधारणा है। बहुत बड़ी परिभाषा है इसकी और इसमें सम्पूर्ण जीवन का सर्वागीण विकास सम्मिलित है। एजुकेशन में व्यक्ति की तो कहीं चर्चा ही नहीं है। केवल विषय पढ़ाए जाते हैं। और इसका लक्ष्य केवल नौकरी देना रह गया। शेष जीवन से इसका लेना-देना ही नहीं है। शिक्षा नीति भले किसी भी भाषा में बने, उसकी मूल अवधारणा बनी रहनी चाहिए। आज शिक्षित व्यक्ति ही अधिक अपराध करता दिखाई पड़ता है। यह तो शिक्षा का अपमान ही कहा जाएगा। जब अरबों रूपए खर्च करके इसी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा तो एक संवेदनाविहीन मानव संस्कृति का ही निर्माण होगा। इसका विरोध करना ही यदि टकराव है, तो यह तो समय के साथ बढ़ता ही जाएगा। भले ही मीडिया का एक हिस्सा धन लेकर मौन हो जाए, देश की आत्मा तो मुक्ति के लिए छटपटाएगी।

(“राजनीतिक परिदृश्य पर सहमति और टकराव तथा इसमें मीडिया की भूमिका” विषय पर दिल्ली में आयोजित सेमिनार में पत्रिका समूह के सम्पादक गुलाब कोठारी द्वारा व्यक्त विचार)

4 टिप्पणियाँ »

  1. आदरणीय गुलाब जी सा,

    आपने कहा कि मीडिया दो भागों में बंट गया है. सही है लेकिन केंद्र में आमतौर पर यही धारणा है कि नीति बनाने वाले (अपवाद को छोड़कर) सिर्फ अंग्रेजी अखबार पढते हैं या अंग्रेजी चैनल देखते हैं. यही कारण है कि उनकी बनाई नीतियां प्राय: न तो आम लोगों के हित में होती हैं न ही देश की वास्‍तविकताओं के धरातल पर व्‍यावहारिक. भले ही भाषा एक माध्‍यम हो लेकिन यह आपसी संवाद का सेतु भी है. अगर प्रशासन और आम जनता की भाषा एक नहीं होगी या कोई मध्‍यस्‍थ नहीं होगा तो क्‍लेश अवश्‍यंभावी है. अंगीकार करना और थोपना, इसमें फर्क है. एक भाषा है जो हमसे छीनी जा रही है और एक भाषा है जो हमपे थोपी जा रही है. इस पर विचार होना चाहिए.

    टिप्पणी द्वारा prithvi — अगस्त 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • भाषा विचारों को प्रभावित करने का माध्यम न बनें, वहां तक हर भाषा अच्छी है।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. आज मीडिया अपनी राष्‍ट्रीय भूमिका को नहीं समझ रहा है, वे केवल व्‍यावसायिकता की भाषा को ही समझने में लगा है। हमारी संस्‍कृति का मूल मंत्र है चराचर जगत की रक्षा करना। पश्चिम की संस्‍कृति का मंत्र है कि जो शक्तिशाली होगा वो ही जीवित रहेगा। हम सब की सुरक्षा का जिम्‍मा लेते हैं और वे स्‍वयं को शक्तिशाली बनाने में जुटे हैं। यही कारण है कि यह टकराव बढता ही जा रहा है। हमारे जीवन से अनेकान्‍तवाद समाप्‍त हो गया है।

    टिप्पणी द्वारा ajit gupta — अगस्त 4, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • कभी दूष्टों पर दोष नहीं डाला जाता। स्वयं की भूमिका ही जीवन को अर्थ देती है।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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