Gulabkothari's Blog

अगस्त 8, 2009

कर्म-दो

कर्म के बारे में भारतीय ग्रंथों में अनेक सिद्धान्त एवं अवधारणाएं निरूपित हैं। मानव जीवन को कर्म-प्रधान माना गया है। कविराज गोपीनाथ जी ने देवलोक आदि शेष भूमियों को भोगभूमि मात्र की उपाधि दी है।
कर्म के बारे में अनेक मत भी हमारे यहां मौजूद हैं। गीता में कर्मप्रधान उपदेश-“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” जन-जन की जुबान पर है। जीवन को भी कर्म की दृष्टि से चार भागों में बांटा गया है। व्यक्तिगत कर्म विन्यास की दृष्टि से चार आश्रम—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास हैं, तो सामाजिक दृष्टि से चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की व्यवस्था सम्मिलित होकर समाज-यज्ञ का संचालन करती है। चार पुरूषार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का आधार भी कर्म ही है। कर्म ही श्रम, दान, तप और यज्ञ के रूप में स्थापित होता है जो कि वर्णव्यवस्था पर ही आधारित है। सत्व, रज और तम की शोधन रूप प्रतिष्ठा भी कर्म से ही होती है। कहने का अर्थ है कि जहां मानव जीवन है वहां कर्म है। यहां तक कि संन्यास भी निवृति-कर्म-प्रधान ही होता है।
आखिर कर्म में ऎसा क्या है क्या महत्व है इसका जीवन में जब जीने का हर क्षण ही कर्म है तो उसे इतनी परिभाषाओं में बांटने का अर्थ क्या है कर्म अच्छा भी है, बुरा भी है। प्रधानत: कर्म तो बन्धक है। अच्छा कर्म भी सीमा-बन्धक है। प्रश्न उठते हैं— किसके साथ बांधता है इससे बाहर निकलने का मार्ग क्या हो सकता है क्या जन-साधारण के लिए कर्म को इस दृष्टि से समझने की वस्तुत: कोई आवश्यकता है यदि वे नहीं समझें तो
इसका रहस्य श्री कृष्ण ने गीता में स्पष्ट किया है। उन्होंने कर्म की गति को बहुत गहन बताया है, क्योंकि कर्म, अकर्म और विकर्म, इन तीन स्थितियों में से कर्म को छांटना पड़ता है। भगवान् ने कहा है कि कर्म को समझना चाहिए, विरूद्ध कर्म को समझना चाहिए और अकर्म को भी समझना चाहिए। उन सब में से कर्माश को निकालकर उपयोग में लेना चाहिए। उदाहरण के लिए संन्यासी के लिए काष्ठ की स्त्री का स्पर्श भी वर्जित कहा गया है, किन्तु नदी किनारे बैठा हुआ संन्यासी, जो कि तैरना जानता है, उसके सामने यदि कोई स्त्री नदी में डूब रही है और रक्षा के लिए चिल्ला रही है तो क्या संन्यासी उस शास्त्रीय वचन से बद्ध होकर उस स्त्री को बचाने के लिए नदी में प्रविष्ट नहीं होगा यदि नहीं होगा तो निश्चित रूप से ही वह पातकी माना जाएगा। उचित यह है कि इस विरूद्ध कर्म में भी स्त्री की जीवन-रक्षा रूप जो कर्म है उसको ही प्रधानता दी जाए, स्पर्श आदि अन्य दोषों को ध्यान में नहीं लाया जाए। इस तरह से विरूद्ध कर्म में भी कर्माश को छांटकर निकालना होगा। भगवान् ने कहा है—
“”कर्मण्यकर्म य: पश्चेदकर्मणि च कर्म य:।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु सयुक्त: स युक्त: कृत्स्त्रकर्मकृत् H””
– कर्म में जो अकर्म को देखे और अकर्म में जो कर्म को देखे, उसको बुद्धिमान कह रहे हैं भगवान्। अकर्म नाम ब्रह्म का है, कर्म नाम माया का है। ज्ञान के आधार पर माया रूप कर्म चल रहा है। यह दृष्टि ही कर्म-बन्ध से छुड़ाने वाली होती है। यहां प्रस्तुत श्लोक ही “कर्मण्येवाधिकारस्ते …” का स्पष्टीकरण है जिसको ईशावास्य के मंत्र के आधार पर भगवान् ने यहां स्पष्ट किया है:
“अन्धं तम: प्रविशन्ति येùविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रता: ।।”
अर्थात् जो अविद्या रूप कर्म में ही रात-दिन लगे रहते हैं, ब्रह्म भाव और भगवान् भाव जिनके चित में कभी आता ही नहीं, उनके लिए कहा जा रहा है कि वे अंधकार रूप तम में डूब जाते हैं। आगे कहा गया है कि जो केवल ब्रह्म भाव रूप भगवान् भाव में ही लगे रहते हैं, कर्म का सर्वथा परित्याग कर देते हैं, वे और भी गहरे अंधकार रूप नरक में डूब जाते हैं।
भगवान किसी भी भाव में रत रूप अनुरक्ति के सर्वथा विरूद्ध हैं। फलत: ब्रह्मभाव और कर्मभाव दोनों को जीवन में आधा-आधा बांटकर रखना पड़ेगा, तभी कर्म-बन्ध से विमुक्ति सम्भव हो पाएगी। वास्तव में यह बात सत्य है कि कर्म चाहे पुण्यमय हो अथवा पापमय, बन्धन ही करता है। शास्त्र में पुण्य रूप कर्म क्षीण हो जाने पर स्वर्ग से विच्युति बतायी गयी है—”क्षीणे पुण्येमत्र्यलोके विशन्ति।” इसलिए पुण्यकाल भी एक सीमा में ही बंधा हुआ रहता है। पुण्य रूप कर्म से लौकिक वैभव की तो खूब वृद्धि हो जाती है, किन्तु क्षुधा व पिपासा का शमन नहीं होता। तथापि बुद्धियोग के सहारे वह हो जाता है। वास्तव में इस तथ्य का आधार हमारा पुनर्जन्म का सिद्धान्त है; क्योंकि पुनर्जन्म न मानने पर तो सर्वादि सृष्टि की मृत्यु रूप समाप्ति के आगे का सृष्टि-क्रम ही बाधित हो जाएगा।
पिछले जन्मों के कर्म व्यक्ति की आत्मा के वासना-संस्कार के रूप में जुड़े रहते हैं। नए जन्म में भी समय-समय पर और व्यक्ति विशेष के साथ जुड़े होने वाले व्यवहार का आधार ये कर्म ही बनते हैं। इस प्रक्रिया मेंं इस जन्म के कर्म जोड़ भी सकते हैं और जुड़ने से रोक भी सकते हैं। रोकने से कर्म का खाता घटता जाएगा और एक समय आएगा, जब आपको किसी का कुछ भी नहीं चुकाना पड़ेगा। सभी कर्मो का विपाक हो चुका होगा। कर्म विपाक का यह क्रम बहुत लम्बा है।
जो भी कर्म वासना रूप में आपकी स्मृति में रह जाता है, वही तो बन्धन है। कर्म तो क्षणिक होता है, चाहे पुण्य हो चाहे पाप हो। वह क्षण भर की क्रिया है। कर्म तो समाप्त हो गया, फिर बन्धन कौन करता है कर्म तो समाप्त हो गया किन्तु अपना संस्कार छोड़ गया जो वासना रूप में चित में प्रतिष्ठित हो गया। वही आगे काम करा रहा है और वही आगे बन्धक हो रहा है। आप उस कर्म की वासना से बंधे हुए हैं। कई बार तो यह स्मृति ही हमें व्यस्त रख लेती है। कई बार यह हमारी कल्पना का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार यह स्मृति अच्छी भी होती है, बुरी भी।
यही स्मृति हमारे वर्तमान जीवन में व्यवहार का कारण बनती है। हमारे व्यक्तित्व निर्माण के मूल में भी यह स्मृति प्रमुख होती है। पिछले कर्म के संस्कार भी स्मृति रूप में जीवन से जुड़े रहते हैं। जो वहां से आगे चलते हुए शरीर या वाणी के माध्यम से व्यक्त होते हैं।
आधुनिक मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि पिछले जन्म की स्मृतियाँ व्यक्ति के जन्म के साथ ही उससे जुड़ी रहती हैं। उसी आधार पर वर्तमान स्वरूप (जन्म) का निर्माण होता है। व्यक्ति जीवन-व्यवहार के सभी ऋण लेता-देता है। हिसाब चुकाता है। इसी प्रकार उसका जीवन-चक्र जीवन-मृत्यु के बीच में चलता रहता है।
कर्म से फल की इच्छा निकालने का अर्थ यही है कि स्वयं को फलरूप परिणाम से न जोड़ा जाए। कर्म को कर्म रूप में ही किया जाए। यही गीता का बुद्धियोग है।
कर्म दो प्रकार के होते हैं-एक प्राकृतिक कर्म और एक मनुष्यकृत कर्म। कर्म के ये जितने भी उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं, वे सब प्राकृतिक कर्म हैं। जिस प्रकार सुबह स्नान करते ही अन्य कार्य में लग जाते हैं, स्नान याद नहीं रहता। फिर खाना खाने बैठे तो पिछला कार्य भी भूल गए। किन्तु, मनुष्यकृत कर्म में कर्म-व्यवस्था देखी जाती है। कैसे व्यवहार करना, कैसे बोलना, यह सब मनुष्यकृत कर्म मेंं आता है। युद्ध के तरीकों को छोड़कर युद्ध करना तो उचित नहीं माना जा सकता। प्राकृतिक कर्म में भी कर्म व्यवस्था नहीं देखी जाती। आहार, निद्रा, भय, मैथुन— ये सब प्राकृतिक कर्म माने जाते हैं, जो मनुष्य और पशु में न्यूनाधिक समान रहते हैं।
भीतर झांकने का जो हमारा दर्शन है वह पिछले संस्कारों को जानने तथा परिष्कृत करने के लिए है। यह हर व्यक्ति के जीवन में उपयोगी है। जीवन-चक्र से तो सभी मुक्त होना चाहते हैं, किन्तु कर्तव्य भाव से कर्म-प्रवृति ही इसका एक मात्र उपाय है।

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