Gulabkothari's Blog

अगस्त 10, 2009

वेद

हमारे शास्त्रों को केवल रटा और रटाया जाता है। इसी कारण न वेद समझ पाए हैं, न वेद का ज्ञान व्यवस्थित रूप से हमको पढ़ने को मिलता है। सब भ्रमित लगते हैं। अपने-अपने अनुमान से अर्थ लगाते रहते हैं। एक ही बात दर्जनों स्वरूपों में सुनाई देती है। समझता कोई कुछ नहीं। यही कारण है कि वेद केवल पढ़ने-पढ़ाने के विषय बनकर रह गए और जीवन में उनकी भूमिका खो गई। हमारे अनेक वेद मंत्र और अध्याय नित्य क्रम से जुडे तो दिखाई देते हैं, किन्तु एक परम्परा की तरह। अनेक परिभाषाएं, पुराण कथाएं सुनी जाती हैं। केवल कहानियों की तरह। उनमें मर्म क्या छिपा हुआ है, कोई बताने वाला नहीं।

यहां तक कि देवी-देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, वाहन, स्वरूप जीवन के किन सिद्धान्तों से जुड़े हैं, नहीं मालूम।
वेदों को समझने के लिए भाषा का अध्ययन, शब्द, अर्थ, प्रत्यय की जानकारी, ध्वनि और स्पन्दन का स्वयं का अनुभव होना आवश्यक है। वेद के अनेक विषय न देखे जा सकते, न उनको प्रयोग के जरिए प्रयोगशालाओं में कहीं समझा जा सकता है। हां, जिनको “निदान” विद्या आती है, वे भूत पदार्थो के माध्यम से सृष्टि के सिद्धान्त समझ सकते हैं। वे कमल का (पद्म) अध्ययन करके ब्रह्मा प्राण को अथवा मूषक का अध्ययन करके गणपति प्राण को समझ सकते हैं। वेद की भाषा भी छन्दबद्ध है। सृष्टि का निर्माण भी छन्दों से ही हुआ है और छन्द ही उसके नियामक भी हैं। सूर्य को समझने के लिए बृहति छन्द को अथवा पृथ्वी को समझने के लिए अनुष्टुप को समझना पड़ेगा। अर्थ और शब्द वाक् के सिद्धान्त एक ही हैं। एक दूसरे के सहारे इनको समझा जा सकता है। व्यवहार में इस प्रकार का कोई प्रयास दिखाई नहीं पड़ता और वेद शब्द बनकर रह जाते हैं।

एक छोटा सा उदाहरण : –
जब कुछ नहीं था, आकाश था। उसकी तन्मात्रा नाद थी। हवा थी, उसकी तन्मात्रा स्पर्श थी। प्राण थे – ऋषि प्राण (आग्नेय) थे। जल मात्रा (सोम) प्रबल थी, अग्नि दुर्बल थी, अत: स्वरूप कोई नहीं था। परन्तु स्पन्दन थे। ये स्पन्दन ही माया कहलाते हैं। इनका स्वरूप ही संकोच और विकास है। आकाश में फै ला सारा पदार्थ ब्रह्म है और उसकी शक्ति स्पन्दन रूप माया है। स्पन्दन से ही ब्रह्म का अंश बिन्दु भाव में आता है। बिन्दु का केन्द्र ऋक है, परिघि साम है, बीच का क्षेत्र यजु है। यही वेद है। बिन्दु ही प्राणों द्वारा की गई प्रथम वाक् सृष्टि है। इस स्वयंभू लोक से बिन्दु नीचे बढ़ता है, परमेष्ठी लोक में। यहां सोम रूप पितर प्राण हैं। भू, भुव, स्व, मह, जन:, तप: और सत्यम् सात लोक हैं। स्वयंभू को सत्यम् कहा है। परमेष्ठी को जन:। दोनो के मध्य में तप: लोक है। अन्तरिक्ष है। चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता है, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और सूर्य परमेष्ठी का उपग्रह है। तप:लोक में परिक्रमा करता है।

जहां सूर्य है, वहीं उसके उपग्रह भी हैं। वे भी सूर्य के साथ परमेष्ठी मण्डल के चक्कर लगाते हैं। तब भू, भुव, स्व और मह चारों लोकों की क्या स्थिति बनी आकाश में क्या दिखाई पड़ रहा है ऊपर सत्यम् (स्वयंभू) बीच में तप:(अन्तरिक्ष) और नीचे परमेष्ठी (जन:) लोक । दोनों लोकों के मध्य का अन्तरिक्ष भी इन लोकों से भिन्न दिखाई नहीं पड़ता। वेद वाक्य है कि सूर्य तप: लोक में तपता है।

अब एक और सिद्धान्त भी है कि परमेष्ठी मण्डल भी स्वयंभू लोक की परिक्रमा करता है। इसका अर्थ हुआ कि परमेष्ठी लोक को स्वयंभू लोक के बाहर होना चाहिए। तब यह सिद्ध हुआ कि भीतर का लोक सत्यम् और बाहर जन:। बीच में तप: लोक। तब जाकर केन्द्र से शुरू होकर अमृत सृष्टि सूर्य में पंहुचेगी और फिर सूर्य के द्वारा मत्र्य सृष्टि केन्द्र से दूर-दूर होती चली जाएगी। एक ही अंतरिक्ष भिन्न-भिन्न लोकों के मध्य भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाएगा।

स्वयंभू का ब्रह्म तप: लोक में ही अपना स्वरूप ग्रहण करता हुआ परमेष्ठी तक पहुंचता है। यह बिन्दु यहां अव्यय पुरूष कहलाता है। स्पन्दनों से ही इसका निर्माण हुआ है। यही बिन्दु इन्हीं स्पन्दनों के द्वारा स्वरूप बदलता हुआ आगे बढ़ता जाता है। यही अक्षर, क्षर और स्थूल (महाभूत) भाव तक पहुंचता है। स्पन्दनों के कारण ही प्राण भी स्वरूप बदलकर ऋषि से पितृ, देव, गन्धर्व, पशु आदि बनते हैं। परमेष्ठी में ही भृगु-अंगिरा का स्थान है। यही गो(विद्युत)लोक भी कहलाता है। इसी को शेष्ाशायी विष्णु का क्षीर सागर भी कहते हैं।
स्पन्दन का मूल स्वरूप नहीं बदलता। इसके कारण अन्य सारे स्वरूप बनते हैं और लीन भी हो जाते हैं। सातों लोकों को एक साथ देखें तो एक आकाश दिखाई पड़ता है और एक ही सूर्य। वेद की सारी व्याख्याओं को अलग-अलग धरातल पर समझने पर इन्हीं में सातों लोक स्पष्ट हो जाते हैं। इसी सिद्धान्त पर आत्मा और शरीर को देखा और समझा जा सकता है।

गुलाब कोठारी

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6 टिप्पणियाँ »

  1. वेद को समझने में समस्या का कारण अर्थ करने में अपनी विचारधारा थोपने की कोशिश रही है. भाष्यकार मन्त्रों के शब्दों से अधिक शब्द अपनी ओर से जोड़कर मनमाना अर्थ करते हैं. यदि धातुज अर्थ सिद्धान्त के अनुसार निष्पक्षता से शब्दार्थ करें और फिर उसके अनुसार शब्दानुवाद कर लें तो वेदमन्त्रों का सही अर्थ हो सकता है. इस तरह अर्थ किसी ने किया नहीं है. हमने वेद सूक्तायन में चारो वेदों के चुने हुए पन्द्रह सूक्तों का अर्थ इसी तरह किया है, पूरा यजुर्वेद कर रहे हैं. इस कार्य में आपके सहयोग की अपेक्षा है.

    टिप्पणी द्वारा स्वामी शरण — अप्रैल 13, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • हाजिर हैं! आप श्री दयानंद भार्गव से तुरन्त संपर्क कर लें। मोबाइल फोन- 09352565007

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — मई 20, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. It is absolutely right that people are making their own perception but not only for Veda but also every thing of this beautiful world. Hence once should understand the importance of the authority of the message. It should come from the parmpara. For example we believes in the messages about the science from the well-known universities not just for anybody than why to follow just anybody as far as Veda are concern. More importantly to understand the spiritual things first be spiritual have a connection with God and rest will be fine..

    टिप्पणी द्वारा Mukesh Sharma — अगस्त 13, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. समुद्र में डूबने पर ही रत्‍न निकाल पाना संभव है .. बिना गहराई में गए समुद्र को सिर्फ खारे पानी का ही स्रोत समझा जा सकता है .. ऐसा ही होता आया है आजतक !!

    टिप्पणी द्वारा संगीता पुरी — अगस्त 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • पहले आवश्यक है कि हर तरह के पानी में तैरना सीख लिया जाये।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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