Gulabkothari's Blog

अगस्त 13, 2009

सूक्ष्मभाव

हमारा शरीर स्थूल और भौतिक है। हम इसके प्रत्येक अंग को, कार्य को देख सकते हैं। आकलन कर सकते हैं, ऎसा हमारा मानना है। किन्तु, वास्तविकता यह है कि इसका संचालन हमारी बुद्धि करती है, हमारा भाव तन्त्र करता है जिसको हम न देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। शरीर में तो यंत्रवत् केवल प्राकृतिक क्रियाएं ही हो सकती हैं, अन्य कुछ नहीं।
कोई व्यक्ति बिना भाव के नहीं जी सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी तो भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रियाएं होती हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही इनका आधार तय करता है। प्रश्न उठता है—भाव कहां से आते हैं? भाव हमारे अनुभव और दृष्टिकोण का मिश्रण कहे जा सकते हैं। ये अनुभव चेतनागत होते हैं। जिस प्रकार हमारे मन में इच्छा स्वत: उठती है, उसी प्रकार हमारे भाव भी स्वयं-स्फूर्त होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि इच्छा का स्वरूप स्वतंत्र होता है और भावना हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ढली होती है।
भावना हमारे सूक्ष्म और कारण शरीर से जुड़ी होती है, क्योंकि वह स्वयं सूक्ष्म होती है। इसका प्रतिबिम्ब होता है हमारा आभा-मंडल। इसको हमारा भावनात्मक शरीर भी कह सकते हैं। दिनभर हमारे भावों के साथ आभा-मंडल में भी परिवर्तन होते रहते हैं। आभा-मंडल का आकलन और विश्लेषण करने के लिए विश्व स्तर पर अनेक संस्थाएं कार्य कर रही हैं। आभा-मंडल में दो प्रकार के परिवर्तन होते हैं—रंगों के रूप में और तरंगों के रूप में। इनका विश्लेषण कर व्यक्ति के भावों का आकलन किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति का सारा खेल ऊर्जा और पदार्थ के एक-दूसरे में परिवर्तित होने के सिद्धांत पर चलता है। इनको देखना, समझना और मापना संभव है। जब भावनाओं के द्वारा हमारे मन और शरीर में विभिन्न क्रियाओं का संचालन होता है तो निश्चित है कि वहां ऊर्जा है, शक्ति है। सृष्टि की समस्त ऊर्जा सामग्री का सम्बन्ध पदार्थ से होता है। यह भी सत्य है कि यह ऊर्जा अति सूक्ष्म है। इसी कारण यह वैश्विक अंतरिक्षीय ऊर्जा का अंग है और उसी के साथ एक जीव होकर कार्य करती है। एक ही प्रकार के सिद्धांत दोनों ऊर्जाओं पर लागू होते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हम सीधे प्रकृति से जुड़े हैं और हमारे कार्यकलापों का नियमन भी प्रकृति ही करती है। हमारा आभा-मंडल पृथ्वी के आभा-मंडल से सीधा जुड़ा रहता है। हमारा जीवन पृथ्वी पर निर्भर करता है। पृथ्वी सूर्य-चन्द्रमा आदि से जुड़ी है।
जहां भावों की तरंगों का आभा-मंडल होता है, वहां हमारी बौद्धिक तरंगों का आभा-मंडल भी होता है। हर आभा-मंडल अपने आप में स्वतंत्र होता है और एक-दूसरे को सदा प्रभावित करता रहता है। वह शरीर के साथ भी जुड़ा रहता है। इसी कारण हमारे आभा-मंडल के भी अनेक स्तर होते हैं, अनेक रूप और रंग होते हैं।
संसार में समस्त जड़ और चेतन पदार्थो में आभा-मंडल विद्यमान रहता है। जड़ पदार्थो का आभा-मंडल स्थिर दिखाई पड़ता है, क्योंकि इनमें क्रियाकलाप नहीं होते। इसके विपरीत चेतन पदार्थो का आभा-मंडल परिवर्तनशील नजर आता है। अपने आप में स्वतंत्र रहते हुए भी सब पृथ्वी की सीमा में रहते हैं। इन सभी के केन्द्र में जीव होता है, आत्मा होती है या कारण शरीर रहता है। इसके बिना न क्रिया हो सकती है और न ही अभिव्यक्ति। हमारा शरीर और हमारी आकृति ही हमारी अहंकृति का स्थूल रूप “सोम” है, अभिव्यक्ति है। और, हमारी प्रकृति इसका व्यक्तित्व प्रकट करती है। हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है।
हमारे विचार और भाव आते-जाते रहते हैं, किन्तु यह केन्द्रस्थ “अहं” (ह्यeद्यद्घ) अथवा “मैं” स्थायी बना रहता है। इसी के कारण शरीर की आस्था है। जीवन के सारे ज्ञान और अनुभवों का आधार यही है। अनुभवजनित यही ज्ञान सृष्टि-विकास का आधार बनता है। कौन सीखता है और कौन ज्ञान का उपयोग करता है, इसका उत्तर “अहं” है। ज्ञान और अनुभव ही हमारी भावभूमि का निर्माण करते हैं। यह कार्य मन के स्तर पर होते हैं। ज्ञान के संस्कार को भावना का भाव कहते हैं, कर्म के संस्कार को वासना कहते हैं।
अनुभव निरन्तर होते रहते हैं, रूकते नहीं। भाव भी नहीं रूकते हैं। हमारा आभा-मंडल एक ओर हमारे व्यक्तित्व के आधार पर बदलता रहता है तो दूसरी ओर पृथ्वी के आभा-मंडल के प्रभाव से बदलता रहता है, अत: सृष्टि और शरीर का संचालन एक ही सिद्धान्त पर आधारित है। “यथा अण्डे तथा पिण्डे” का भी यही तात्पर्य है।
जो कुछ हमारे जीवन में घटित होता है, उसका भावनात्मक प्रारूप आभा-मंडल के रूप में विद्यमान रहता है। सूक्ष्म स्तर पर भी यह वैसा ही बना रहता है। चूंकि स्थूल के परिवर्तन धीरे होते हैं, अत: ये समय के साथ ही परिलक्षित होते हैं। सूक्ष्म का परिवर्तन निरन्तर गतिमान बना रहता है। अति सूक्ष्म तक इसका विस्तार होता है। हर प्राणी और पदार्थ का आभा-मंडल सृष्टि से जुड़ा है, जो दूर-दूर तक सूक्ष्म रूप से व्याप्त है। अत:, हर एक प्राणी एक-दूसरे से अवश्य प्रभावित होता है चाहे वह चुपचाप पास ही क्यों न बैठा रहे।
ऊर्जा का आदान-प्रदान तो वहां भी होता रहता है। भावनाओं को प्रभावित करने का क्रम भी बना रहता है। चीनी दार्शनिक ने लिखा है “परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सृष्टि और प्रकृति के इस आदेश को नकारा नहीं जा सकता। इसी में सृष्टि के विकास का बीज छिपा हुआ है।”
यह परिवर्तन हम सब मिलकर लाते हैं। हमारी ऊर्जाओं का आदान-प्रदान ही परिवर्तन का मूल कारण है। हम भावनाओं को भले ही निजी सम्पत्ति मानें, किन्तु यह सत्य है कि हमारी भावनाओं को हमारा सम्पूर्ण वातावरण, जड़-चेतन प्रभावित करता है। सब मिलकर एक-दूसरे को परिवर्तित करते हैं। इसीलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा का सही तात्पर्य समझ में आना आवश्यक है। हमें आयु सूर्य से मिलती है। अन्न चन्द्रमा से मिलता है। सोम की कमी चन्द्रमा पूर्ण करता है। हमारा मन परमेष्टि लोक से आया हुआ है अर्थात् हमारे जीवन में इन सबका नित्य जुड़ाव है, प्रभाव है। हमारी इच्छा, कामना, भावना इसी का अंग है। जैसे-जैसे हम ऊपरी स्तरों पर देखते हैं, इनका स्वरूप अति सूक्ष्म होता चला जाता है, गतिमान होता चला जाता है।
हमारे भावों की तरंगें अंतरिक्ष में रहती हैं। जब सभी प्राणियों के भावों की तरंगें अंतरिक्ष में होंगी तो अंतरिक्ष इन तरंगों का समुद्र जैसा दिखाई पड़ेगा। ये मिश्रित तरंगें सबको प्रभावित करेंगी और सब मिलकर इन तरंगों के मिश्रण को प्रभावित करेंगे। इस बात से किसी भी देश अथवा भू-भाग की संस्कृति का महत्व समझा जा सकता है। एक व्यक्ति को आने वाला क्रोध दूसरे व्यक्ति के क्रोध की तरंगों को बढ़ा देता है, जो उनके आपसी व्यवहार का निर्धारण करता है। यही प्रभाव सद्भाव की तरंगों का होता है। ऋषि-मुनियों के समीप सभी शांत क्यों दिखाई पड़ते हैं—यह हम सहज ही समझ सकते हैं। यही कारण है कि रोगी को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण स्थान पर रहने की सलाह दी जाती है। प्रकृति की इस अद्भुत उपचार-क्षमता का कारण भी सूक्ष्म-भाव-तरंगें ही हैं। वन्यजीव, पशु-पक्षी, पर्वत, नदी-नाले, पेड़-पौधे आदि सभी की भाव-तरंगों का मिश्रण हमें प्रसन्न एवं निरोगी बनाए रखता है।

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4 टिप्पणियाँ »

  1. got a wonderful lesson of life . I pray to god for giving me opportunity to spent time with you in learning and enjoying eternal anand .In living legend , i can say , you are blessed with complete truth. Naman

    टिप्पणी द्वारा Surendra Rajpurohit — जनवरी 11, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. मुझे आपके इस सुन्‍दर से ब्‍लाग को देखने का अवसर मिला, नाम के अनुरूप बहुत ही खूबसूरती के साथ आपने इन्‍हें प्रस्‍तुत किया आभार् !!

    टिप्पणी द्वारा RAJIV MAHESHWARI — अगस्त 13, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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