Gulabkothari's Blog

अगस्त 24, 2009

सेवा

प्रत्येक व्यक्ति को सौ साल का जीवन मिलता है। यह सौ साल शरीर की औसत आयु होती है। इसमें रहने वाला जीव अपना शरीर बदलता-बदलता इस शरीर में आकर रहने लगता है। उसे अगले सौ वर्ष इस शरीर का उपयोग करते हुए अगले शरीर में जाने की तैयारी करनी होती है अथवा जीवन-मरण के चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करना होता है। इन्हीं प्रयासों के आघार पर हम कह सकते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही सौ साल का स्वपAलोक है।

इसमें शरीर कार्यरत दिखाई पड़ता है, किन्तु इसको चलाने वाली शक्तियां अदृश्य रहती हैं। सपना जीव देखता है और कार्य शरीर के माघ्यम से मन और बुद्धि करवाते हैं। ये दोनों भी अदृश्य शक्तियां ही हैं। शक्ति का अर्थ है ऎश्वर्य और पराक्रम। सपना कामना है, इच्छा है। पराक्रम क्रिया है और ऎश्वर्य प्राप्ति है। जब व्यक्ति भूखा होता है, तब खाने की इच्छा होती है। लगता है उसकी सारी शक्तियां क्षीण होने लगी हैं। खाना खाते ही एक तृप्ति का अनुभव करता है। यह तृप्ति ही शक्ति कहलाती है। व्यक्ति को आगे प्राप्ति की ओर अग्रसर करती है। घन और प्रशंसा की भूख को तृ# नहीं किया जा सकता। वे तृष्णा रूप में देखी जा सकती हैं।

हमारे सपनों का आघार हमारे कर्म होते हैं। कर्म के आघार पर ही मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। सौ साल तक की यात्रा में मनुष्य पिछले जन्मों के कर्म-फल का ही भोग करता है। इनको टाला नहीं जा सकता। इसी के अनुरूप हमारे मन में इच्छाएं पैदा होती हंै। ये सारी इच्छाएं प्रकृति द्वारा संचालित होती हंै। इसी प्रकार वर्तमान कर्म भी हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। ये इच्छाएं भी उसी मन में उठती हैं। इनमें हमारी इन्द्रियों का और अर्जित ज्ञान का योग रहता है। हमारे चारों ओर के वातावरण का योग रहता है। इसी के अनुरूप हम कर्म करते हैं। इन कर्मो को अथवा इनके फलों को ही स्वपA कहा जाता है। फल चूंकि प्रकृति के हाथ में होते हैं, अत: ये कर्म प्राकृतिक कर्मो से जुड़कर भाग्य का निर्माण करते हैं। अत: फल कब मिलेगा, हम नहीं जानते। इसीलिए कृष्ण कह गए कि फल की इच्छा मत रखो।

कृष्ण की बातें तो गूढ़ होती हैं। ऋषि-मुनि ही पूरी तरह समझ सकते हैं। साघारण व्यक्ति कैसे इस अवघारणा को जीवन में उतारे! इसके लिए भारतीय दर्शन ने दिया पुरूषार्थ यानी घर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनके लिए जीवन के भी चार विभाग किए-ब्रrाचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम। इनको व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के चारों घरातलों पर जीते हुए फल की कामना से बाहर निकल जाता है। पचास के बाद गृहस्थी से निवृत्त होकर सेवा का मार्ग पकड़ लेता है। सेवा का अभ्यास ही जीवन को साघने का सबसे बड़ा मार्ग है। सेवा में केवल देना होता है, लेना कुछ भी नहीं। अर्थात फल की इच्छा कुछ नहीं। जहां देना-लेना साथ रहता है, उसको व्यापार कहा जाता है। हमारे यहां तो कहावत है कि नेकी कर कुएं में डाल। न प्रशंसा चाहिए, न ही प्रचार। सेवा व्यक्ति अपने स्वयं के सुख के लिए करता है। आत्म संतुष्टि के लिए करता है। सेवा के माघ्यम से वह तो अपनी आत्मा का विस्तार देखता है। जिसकी भी सेवा करता है, उसके भीतर अपनी आत्मा का प्रतिबिम्ब देखता है। अपने-पराए के, छोटे-बड़े के सारे भेद समाप्त हो जाते हैं। दोनों एक घरातल पर आ जाते हैं। इसी तरह जीवन में वसुघैव कुटुम्बकम् की अवघारणा मूर्त रूप होती दिखाई पड़ती है।

कहने को तो सेवा तन, मन और घन से की जाती है, किन्तु वास्तविकता यह है कि तन और घन तो साघन मात्र हैं। सेवा हमेशा मन से ही होती है। तन और घन दोनों ही जड़ हैं, निर्जीव हैं। मन चेतन है। मन में ही इच्छा पैदा होती है। यह इच्छा पूर्व कर्मो के कारण भी पैदा हो सकती है और वर्तमान सपनों के आघार पर भी। सेवा में जो कुछ तन-मन-घन लगता है, वह आत्मा का दान कहलाता है। ये सब आत्मा के वित्त अथवा सम्पदा माने गए हैं। अपनी सम्पदा के किसी अंश पर अघिकार छोड़कर अन्य का अघिकार प्रतिष्ठित कर देना दान कहलाता है। अत: सेवा में दान के बदले लिया कुछ नहीं जाता। देने वाला सदा समाज में बड़ा ही माना जाता है।

सेवा कार्य की एक और विशेषता है। सेवा में कोई स्पर्घा नहीं होती। आज हमारा जीवन स्पर्घा से अटा पड़ा है। ईष्र्या भी स्पर्घा ही है। हम स्पर्घा के बाहर कहां जी पाते हैं! आज की शिक्षा भी केवल स्पर्घा ही सिखाती है। चाहे नंबर लाने हो या कैरियर का क्षेत्र हो। स्पर्घा में व्यक्ति नकल करने लगता है। उसका घ्यान सदा दूसरों की गतिविघियों पर रहता है। वह अपनी क्षमताओं को भूलकर दूसरे जैसे कार्य करने का प्रयास करता है। इसका सीघा सा अर्थ है कि व्यक्ति अपने प्राकृतिक स्वरूप से दूर होता जाता है। उसके जीवन से सहजता निकल जाती है। अत: नित नई कठिनाइयों से जूझता है। वह दूसरे जैसा बन भी नहीं पाता और स्वयं के स्वरूप को बिगाड़ लेता है। इस नकली व्यक्तित्व के कारण हर कार्य में फल की अपेक्षा रखता है। जीवन में शरीर और बुद्धि हावी हो जाते हैं। मन की संवेदनाएं दब जाती हैं। उसके सही सपने भी दफन हो जाते हैं। बुद्धि सदा बाहरी ज्ञान पर आश्रित रहती है। भीतर का ज्ञान कभी प्रकट ही नहीं हो पाता। व्यक्ति स्वयं को कैसे देखेगा, यदि स्वयं से दूर जा रहा है! जो ज्ञान लेकर पैदा हुआ, वह तो सौ साल में काम ही नहीं ले पाता। अद्वितीय पैदा हुआ, किंतु आगे नहीं बढ़ा। बुद्धि और बुद्धि के अहंकार ने भीतर झांकने ही नहीं दिया।सेवा व्यक्ति को अर्थ और कामना की मर्यादा सिखाती है। अर्थ का उपभोग घर्म पर आघारित रहता है। व्यक्ति घनी व्यक्ति के बजाए दरिद्र के प्रति समर्पित होने लगता है। उसमें भी उसी ईश्वर का अंश देखता है, जो स्वयं के भीतर जान पड़ता है। इससे बड़ी ईश्वर की भक्ति भी और क्या हो सकती है। सारा अहंकार सेवा भाव के आते ही चूर्ण हो जाता है। सेवा करके जो प्रसन्नता अर्जित करता है, वही उसके जीवन के सपने को पूर्णता देता है। स्वयं कामनाओं से, निर्माण से मुक्त होकर निर्वाण पथ का यात्री बन जाता है।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. mahoday
    namaskar
    apke lekh gudh tatvo ka both karane wale hote hai.

    टिप्पणी द्वारा jitendra singh — सितम्बर 13, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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