Gulabkothari's Blog

अगस्त 26, 2009

भागमभाग

जिस रंग का चश्मा
उस रंग का नजारा
पड़ोसन मेरी
बहुत सुंदर थी
आवाज भी सुरीली
लगता था
एक बार तो
दिखती रहे
दिन भर में
बहुत आकर्षण था
उसके रूप में।
पति बोले
एक दिन मुझसे
कैसे मिले शांति
उस कर्कशा से
कैसे छूटे पीछा
उस
भली मानस से
तंग आ गया
मैं तो
गलती भी तो है
मेरी ही
मैं ही
डालता था
डोरे
उसे रिझाने को
बहुत पीछा किया था
अब छटपटा रहा हूं
मैं ही
मुक्त होने को।
वो है कि
कसकर बांध दिया
मुझको
मैं अवाक था
मेरी अवधारणा
संुदरता की
हवा हो गई
वह तो चल पड़ी
किसी और के पीछे
छोड़कर सुख
बाल-बच्चों का
जो न हो सकी
अपने पति की
अपने बच्चों की
क्या होगी
किसी अन्य की ?
इस धरती पर
भोग में डूबी
आंखें
कैसे देखेंगी
धरातल
आत्मा का
नकली निकलता
24 कैरेट का
खरा सोना
18 का हो गया
14 कैरेट का
हो गया
क्या पता
मुलम्मा ही
निकले अंत में
फिर क्यों
भागता रहता है
इंसान
खोट भरने को
जीवन में
छोड़कर सुख
24 कैरेट का
प्रसाद
ईश्वर का
क्यों नहीं चाहता
भोगना
प्रारब्ध को ?
छूट नहीं सकता
भागने से
इसे तो
स्वीकारना होगा
भोगना होगा
यथार्थ मानकर
हंसते हुए।

गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. GULAB KOTHARI SAHEB AAPKI RACHNAYE EK SE BADKAR EK HAIN VO INSAN BAHUT KISMATWALA HAIN JISKO YE BLOG PADNE KOMELTA HAI BAHUT BAHUT BADHAIYA………….

    टिप्पणी द्वारा SUNIL MAHESHWARI — अगस्त 27, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. भागमभाग जिन्दगी का दुसरा पहलु है

    टिप्पणी द्वारा dhiraj shah — अगस्त 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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