Gulabkothari's Blog

सितम्बर 2, 2009

सकारात्मक दृष्टि

जीवन में अच्छा या बुरा दृष्टि के आधार पर ही तय होता है। सृष्टि में सबका अर्थ समान है। सबकी बराबर उपयोगिता भी है, आधार भी है। सृष्टि में अर्थहीन कुछ भी नहीं है। हमारी अवधारणाएं, अनुभव एवं परिणाम की कल्पना ही अच्छा-बुरा तय करती हैं। जीवन में हमारे अध्यात्म-विकास का क्रम भी अच्छा-बुरा तय करने का कारण बनता है।
एक व्यक्ति जीवन में हत्याएं करता है। पशुओं को मारकर आजीविका कमाता है। बुरी बात है। किन्तु, व्यक्ति के पिछले कर्म, पशुओं के पिछले कर्म और उनको खाने वालों के कर्म मिलकर ही तो वह सब तय करते हैं। इसमें विशेष क्या है, एक-दूसरे के ऋणों का आदान-प्रदान ही तो है।
यदि इतना ही मान लें तो भी एक प्रश्न उठता है कि क्या नए कर्म भी उसी दिशा में बांधे जाएं क्या अनजाने में भी ऎसे ही कर्म करते रहें जीवन में ज्ञान की भूमिका, ज्ञानयुक्त कर्म की भूमिका और जीवन को लक्षित करने का महžव तभी समझ में आता है। और, इसके बाद क्यों विधायक भाव महžवपूर्ण है सकारात्मक दृष्टि की भूमिका जीवन को कैसे बदलती है नकारात्मक से बचने की जरूरत क्या है आदि प्रश्न स्वत: हल हो जाते हैं।
हमारे साथ सत, रज और तम जुड़े हुए हैं। द्वन्द्वात्मक दृष्टि जुड़ी है, कर्मो के बन्धन जुड़े हैं और भावी जीवन का (चाहे मोक्ष ही हो) लक्ष्य जुड़ा हुआ है। जब तक वर्तमान को नहीं समझेंगे, भविष्य समझ में नहीं आएगा। हमारा मन कहां-कहां अटकता है, भटकता है, चिपकता है, इसको समझना भी जरूरी है और अनावश्यक जगह नहीं चिपके, यह प्रयास करना भी जरूरी है।
इसका सरलतम उपाय है—सकारात्मक दृष्टि। जीवन में जागरूकता का भाव और सकारात्मक दृष्टि आपको हर कार्य में सार्थक भूमिका प्रदान करेगी। आपके आध्यात्मिक विकास का महžवपूर्ण सूत्र बनेगी। शारीरिक, बौद्धिक अथवा मानसिक धरातल पर सकारात्मकता का भाव वास्तविक धरातल से भी जोड़े रखेगा, साथ ही नकारात्मक भूमिका से भी बचाएगा। आपका जीवन व्यवहार सरल होगा। आप सृष्टि कर्म के साथ जुड़ेंगे, ऋणों के आदान-प्रदान की दृष्टि पैदा होगी और अनावश्यक प्रतिक्रियाओं से बच सकेंगे।
सकारात्मक भाव आपका मार्ग निश्चित लक्ष्य की ओर तय करेंगे। जैसे-जैसे आपकी शक्तियों का विकास होगा, प्रकृति आपकी परीक्षा भी लेती रहेगी। आपको हर अगले चरण में पहुंचने के लिए कोई न कोई कठिन परीक्षा पास करनी ही होगी। परीक्षा इस बात की सूचना भी है कि आपका विकास हो रहा है। आप एक धनी व्यक्ति हो गए, जीवन के सभी सुख आपके पास हैं, क्या आप इनको पचा सकते हैं अथवा भोग में लिप्त होकर अपना लक्ष्य भूल जाएंगे परीक्षा ही तो है। अनेक प्रकार की कठिनाइयों के दौर आपके समक्ष आएंगे, उनमें स्वयं को उत्तीर्ण भी होना है, जो आप सकारात्मकता के सहारे ही हो सकते हैं। समय लगेगा, धैर्य की परीक्षा होगी, विचलन का भाव भी आएगा। यदि आपकी आस्था अडिग है तो आपको अभय की प्रतीति बनी रहेगी। आपके बड़े व्यक्तित्व का निर्माण होगा, तब और भी बड़ी परीक्षा होगी।
सकारात्मक दृष्टिकोण मूलत: भावों पर आधारित होता है। बुद्धि भी उसी क्रम में कार्य करने लगती है। अनावश्यक शारीरिक क्रियाएं भी रूक जाती हैं। गम्भीरता और निर्मलता का अद्भुत संगम होता है। यही दृष्टि आगे चलकर अद्वैत की भूमिका में ले जाती है।
एक साधु कहता है कि मैं चरस इसलिए पीता हंू कि इससे मेरी एकाग्रता बढ़ती है, मैं स्वयं को शिव की टोली के साथ देख सकता हँू, शरीर की चुनौतियों का सामना करने का अवसर मिलता है मुझे। क्या शरीर मेरी एकाग्रता मेंं बाधक बन सकता है लगता है, वह सभी कुछ सकारात्मक कह रहा है। सच्चाई तो यह है कि जो सक्षम होते हैं वे ही सबसे पहले कृत्रिम नशे को छोड़ते हैं। उनको लगने लगता है कि शिव का ही स्वयं नशा इतना बड़ा है कि उसके आगे अन्य कोई नशा टिकता ही नहीं। शरीर का नशा भी उतर जाता है, बुद्धि अहं-विहीन सात्विक रूप ले लेती है।

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1 टिप्पणी »

  1. All living beings see the world through their own eyes and analyse trough their own brain. Resultant is the one world tranforms in to many worlds….equal to pair of eyes. Then again, the pair of eyes find that a powerful person/community/society/nation taking advantage/discrimanting against the powerless. Then this brain thinks that lets correct the situation and stands up against….
    What would you call “Phoolan Devi”? Guilty or Reformer?

    टिप्पणी द्वारा Vikas Awasthi — सितम्बर 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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