Gulabkothari's Blog

सितम्बर 7, 2009

ज्ञान-कर्म-1

वेवेद शब्द विद् धातु से बना है। इसका अर्थ है ज्ञान अथवा लाभ। ज्ञान का स्वरूप निर्घारण करने से पहले ज्ञाता और ज्ञेय का निर्घारण करना पड़ता है। सम्पूर्ण विश्व ज्ञान का विषय होने से ज्ञेय कहलाता है। उसे जानने वाले को ज्ञाता कहते हैं। ज्ञाता और ज्ञेय के स्वरूप का यथावत् प्रतिपादन करने वाले साहित्य को वेद कहते हैं। वेद में सृष्टि का मूल कारण, सृष्टि प्रक्रिया तथा उसे जानने वाले का स्वरूप विवेचन मिलता है। ज्ञान के स्वरूप का निर्घारण पश्चिम में भी खूब हुआ है। वहां ज्ञेय पदार्थो का विश्लेषण, परिगणन, वर्गीकरण आदि करके जो निष्कर्ष निकाला जाता है, उसी को विज्ञान कहा जाता है। उन्होंने जिस प्राकृतिक विज्ञान का विकास किया है, उसमें सम्पूर्ण प्रकृति को विषय रूप में ग्रहीत किया गया है। ज्ञाता को विचार का विषय बनाने की आवश्यकता का अनुभव ही नहीं किया गया। ज्ञान का विशुद्ध रूप जानने के लिए ज्ञाता का स्वरूप निर्घारण भी आवश्यक है। वेद में विश्व एवं मनुष्य के यथार्थ स्वरूप को समझ पाने की क्षमता है। वेद ज्ञान देह है। ज्ञेय-ज्ञाता दोनों की बात करता है। व्यक्त-अव्यक्त, चर-अचर रूप में सारे प्राणी-पदार्थ ज्ञेय हैं।

वैदिक परम्परा में ज्ञान का अर्थ यह जानना है कि, सम्पूर्ण सृष्टि के भीतर एक ही तत्व निहित है। एक से अनेक रूप में कैसे विस्तार पाता है, इसको बताने वाला विज्ञान अथवा विशिष्ट ज्ञान कहा गया है। एको ज्ञानं ज्ञानं, विविधं ज्ञानं विज्ञानम्। ईश्वरादि किसी पुरूष विशेष से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि ज्ञानाधीन है। ज्ञान की सिद्धि ईश्वर अधीन नहीं है। क्योंकि ज्ञान तत्व-विषयक नहीं होता, तत्व रूप होता है। साधन नहीं बनता, स्वयं साध्य ही होता है। कृष्ण ने गीता में ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञान गम्य के लिए कहा है कि तीनों सबके ह्वदय में सदा बने रहते हैं-

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं ह्वदि सर्वस्य विशिष्ठतम् । गीता 13-17
ज्ञान की उपादेयता बताते हुए मुण्डकोपनिषत् (2.2.5)
बताता है-
यस्मिन्द्यौ: पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन: सह प्राणेp सर्वे:।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुंचथ अमृतस्यैष सेतु:।।

इसका अर्थ है-जिसमें द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष (तीनों लोक) तथा प्राण रूप सब इन्द्रियों के साथ मन भी पिरोया हुआ है, उस एक आत्मा को ही जानो। अन्य सारी बातें छोड़ो। क्योंकि अमरता प्राप्त कराने वाला सेतु यही है।

हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं। विज्ञान का अर्थ है सृष्टि विकास का ज्ञान। बाहरी विश्व का ज्ञान। ज्ञान जुड़ा है प्रति सृष्टि से, अदृश्य क्षेत्र से। ज्ञान का माध्यम व्यक्ति स्वयं होता है। भीतर में देखता है। बाहर को जानने में उपकरण काम आते हैं। ज्ञाता का जुड़ा होना अनिवार्य नहीं होता। हमारी गतिविघियों में भीतर-बाहर दोनों ही सम्मिलित रहते हैं। मन-प्राण-वाक् बाहर से जुड़े रहते हैं। क्रियात्मक होते हैं। इनकी क्रिया का आधार अविद्या अथवा कर्म कहलाता है। आनन्द- विज्ञान-मन भीतर के ज्ञान का अंश है। इसे विद्या या ब्रह्म के नाम से कहा गया है। गीता में कृष्ण ने जीवन को ज्ञान और कर्म का संतुलन कहा है। यही जीवन के द्वन्द्व का कारण भी है। मन कभी विद्या की ओर उठता है, फिर प्रारब्ध और कर्म-फल के प्रभाव से अविद्या की ओर जाता है। विद्या का आधार धर्म है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य को विद्या कहा है। पुरूषार्थ भी धर्म आधारित ही है (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष)।

अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश को अविद्या कहते हैं। अविद्या ही माया का पर्याय है। अक्षर संस्था तक तो केवल विद्या भाव ही रहता है। अक्षर के ब्रह्मा प्राण से ही विष्णु और इन्द्र प्राण का रूप बनता है। शेष्ा दो प्राण अग्नि-सोम सूत्रात्मा कहलाते हैं। इनसे ही क्षर सृष्टि का तन्मात्राओं और महाभूत का निर्माण होता है। माया ही प्रकृति रूप में सृष्टि को बढ़ाती है। इसी से विश्व के भिन्न-भिन्न शरीरों का निर्माण होता है। बुद्धि और मन की अवस्थाएं बदलती हैं। मूल में सारा विकास एक ही तत्व का होता है। अहं ब्रह्मास्मि। व्यक्ति स्वयं ब्रह्म है। वही ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय है। सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान उसके भीतर है। जिस प्रकार बीज में सम्पूर्ण वृक्ष के अंग रहते हैं। हमारे पास जितना ज्ञान है, हम उतना ही सोच सकते हैं, उतना ही कर सकते है। “एकोहं बहुस्याम” ही कर्म की कारक कामना है। इसके बाद क्रिया(कर्म) और कत्ताü, इन तीन प्रकारों के योग से कर्म की प्रवृत्ति होती है। बिना कर्ता के कर्म नहीं हो सकता।
कर्म और ज्ञान के मध्य एक कड़ी है- इच्छा। यह इच्छा ही माया है। माया ही कला रूप में आदान-प्रदान का कारण बनती है। विद्या रूप में बुद्धि को विवेचना करने का सीमित अघिकार देती है। मन में राग-द्वेष पेदा करती है। काल गणना में बांधती है। नियति रूप कार्य-कारण भाव सुदृढ़ता तय करती है। यह आत्मा के मूल प्रथम आवरण (कंचुक) कहलाते हैं। देह-प्राण-इन्द्रियां बाहरी आवरण हैं। हमारा ज्ञान-क्रिया का संसार इन्हीं से ढका रहता है। अपने-अपने ग्राह्य विष्ायों को ग्रहण करते समय इन्द्रियों की ओर उन्मुख होने की अवस्था को प्रवृत्ति कहते हैं। विष्ाय को ग्रहण करके कुछ समय उसके साथ रहना “स्थिति” कहा जाता है। विष्ाय से हटकर अन्य विष्ाय की ओर चले जाना “संहार” कहलाता है। क्रिया ज्ञान की ही पल्लवित अवस्था है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्व रूप है। अभेद ज्ञान में भेद पैदा करने वाली शक्ति को माया कहते हैं। प्रत्येक क्रिया को सिद्ध करने की क्षमता रखने वाले तथा शाश्वत रूप में स्वयं वर्तमान रहने वाले स्वतंत्र (ब्रह्म) कर्तृत्व की भाव संज्ञा है। क्रिया ही वर्तमानता है। परिणाम भाव पर निर्भर करते हैं और प्रारब्ध पर भी। इसीलिए कृष्ण कहते हैं कि कर्म फल की प्रतीक्षा मत करो। मुझे अर्पण करके आगे बढ़ते जाओ। ईश्वर की काल गणना हमसे भिन्न है।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. sir gulab kothari is a adhyatm and “tatva” gyani
    i always read him, i seen a shedow of aacharya mahapragya ji in gulab kothari, i wish him always. thanks.

    टिप्पणी द्वारा ranjeet singh — अप्रैल 26, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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