Gulabkothari's Blog

सितम्बर 12, 2009

सकारात्मक सोच

सकारात्मक होना या नकारात्मक होना केवल अभ्यास की बात है। जीवन में संस्कारों को तो आसानी से नहीं बदला जा सकता; किन्तु आदत, व्यवहार और परम्पराओं को हम सहज ही विचार करके बदल सकते हैं। भावभूमि कुछ तो व्यक्ति को आनुवांशिक तौर पर प्राप्त होती है और कुछ जीवन के अनुभवों से। किन्तु, यह एक साथ नहीं होता। समय के साथ अनेक प्रकार के अनुभव एक-दूसरे के साथ जुड़कर भावनात्मक गठन तैयार करते हैं, अत: इनका बदलना भी सहज नहीं होता। फिर, भाव तो मन की दुनिया की बात है। इनका धरातल शरीर और बुद्धि से भी गहरा है। मन के साथ आत्मा के धरातल पर भाव पैदा होते हैं।
मन के भाव ही व्यक्ति को चलाते हैं। मन की इच्छापूर्ति के लिए ही शरीर और बुद्धि कार्य करते हैं। हमारा कार्य अच्छा हो, हम अपने कार्यो में सदा सफल हों, इसके लिए आवश्यक है कि हमारे भाव भी सरल हों। इससे हमारी क्रियाएं भी सरल होंगी, व्यवहार भी सरल होगा। अवरोध कम आएंगे। दूसरी बात है कि भाव खुद दृढ़ हों। बिना दृढ़ता के आप लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकते हैं भटकाव आने के कई कारण बन सकते हैं। सकारात्मक भाव स्थूल भी होते हैं और दृढ़ भी। ये व्यक्ति में साहस जगाते हैं। विकट परिस्थितियों में संघर्ष करने की क्षमता भी देते हैं। उसे सदा स्फूर्त रखते हैं।
नकारात्मक भाव व्यक्ति की ऊर्जा को क्षीण करते हैं। उसका ओज ही समाप्तप्राय: हो जाता है, और साहस तो उसके कोष से विदा ही हो जाता है। आज तो वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि सकारात्मक व्यक्तित्व सामने वाले नकारात्मक व्यक्तित्व का, बाली की तरह, आधा बल खींच लेता है। नकारात्मक व्यक्ति तो उस स्थिति में स्वयं को हारा हुआ ही मानता है। अच्छी से अच्छी अनुकूल परिस्थिति में भी पहले उसकी दृष्टि अपने नकारात्मक पहलू पर ही पड़ती है और वह सकारात्मक पहलू पर ध्यान जाने से पूर्व ही निस्तेज हो जाता है।
इसके विपरीत, सकारात्मक भाव उसकी आत्मा के मूल अंक से जोड़ने का कार्य करते हैं। वह अपनी आत्मा की शक्तियों को पहचानने एवं उनके उपयोग के लिए प्रेरित रहता है। उसकी आत्मा में छिपे सभी सृजनात्मक पहलू प्रकट में आ जाते हैं। हर विषय को वह आगे बढ़ने के लिए ही देखता है। हर अवरोध को चुनौती के रूप में स्वीकार करता है, तभी उसके जीवन में आनन्द बरसता है। चुनौतियां पार कर अपने लक्ष्य तक पहुंचने का सुख केवल सकारात्मक भाव के साथ ही मिल सकता है।
नकारात्मक भाव व्यक्ति को पहले ही अधमरा कर देते हैं। उसे परास्त करने के लिए किसी अन्य उपाय की जरूरत ही नहीं पड़ती। सुख मिलना इतना कठिन नहीं है, जितना कि सुख को भोग लेना। धन, वैभव मिलना तो फिर भी पुरूषार्थ से सम्भव है, किन्तु इसे भोगने के लिए अनुकूल स्वभाव चाहिए। आपको अनेक लोग मिलेंगे, जिनके पास अथाह सम्पत्ति है, किन्तु वे सुखी नहीं हैं। उनके भरा-पूरा परिवार भी है, किन्तु सुख नहीं है। क्या केवल कर्मो का फल ही इसका कारण है
व्यक्ति का दृष्टिकोण विशेष महžवपूर्ण होता है। उसके सुख की परिभाषा भी महžवपूर्ण है। व्यक्ति यदि सकारात्मक भाव नहीं रखता, तो वह मन की गहराइयों तक नहीं पहुंच सकता। अन्य व्यक्तियों के प्रति वह सम्मानजनक हो ही नहीं सकता। तब सुख कहाँ से आएगा सुख को बांटने के लिए भी हमें लोगों की जरूरत पड़ती है। दु:ख को बांटने के लिए भी लोगों की जरूरत पड़ती है। नकारात्मक दृष्टि से आलोचना का भाव बढ़ता है, वह व्यक्ति को मुख्य धारा से दूर कर देता है।
आप कितने ही बड़े हों, कितने ही धनी हों, आपको अन्य प्राणियों का सम्मान करना आना ही चाहिए। “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सहारे ही आप सकारात्मक जीवनधारा में जी सकते हैं। अपनी-अपनी जगह सभी महžवपूर्ण हैं। सबको गलतियां करने का अधिकार भी अपनी-अपनी समझ के अनुसार है। वे उनके परिणाम भी स्वयं ही भोग लेंगे। फिर, आप क्यों आलोचना का मार्ग पकड़कर अपनी बुद्धि पर आवरण डालते हैं उसका कुछ बिगड़े या नहीं, किन्तु आपका सुख तो चला गया। आप अपने सुख का ध्यान रखें, उसकी वह जाने।

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5 टिप्पणियाँ »

  1. sukh ka koi ant nahi koi padav nahi guruji.jiwan k iss jaal mein inssan khud hi fasna chahta hai..kyonki kamnaye inssan ko jiwan skati pradan karti hai.aur kaamnaye usko apna dass bana leti hai…har karam mein..koi na koi kamna toh hoti hi hai..guruji.kya mere vichar sahi hai gurudev….

    टिप्पणी द्वारा rajesh — अक्टूबर 5, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. great analysis

    टिप्पणी द्वारा jayantijain — सितम्बर 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. sakaratmakta ke bare me vishad vivarn. isme safalta ke sutra chipen hai.

    टिप्पणी द्वारा pankaj vyas — सितम्बर 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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