Gulabkothari's Blog

सितम्बर 21, 2009

ज्ञान-कर्म-3

जीवन में व्यवहार के दो धरातल हैं। एक ज्ञान प्रधान और दो, क्रिया प्रधान। ज्ञान प्रधानता में- संकल्प, निpय, अभिमान(मन, बुद्धि और अहंकार) तथा श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, आस्वादन और जिघ्रण (संूघना)-पांच ज्ञानेन्द्रियों- इन आठ इन्द्रियों के कार्य शामिल रहते हैं। क्रिया की प्रधानता में पांच कर्मेद्रियां-पाद, हस्त, जिह्वा, पायु और उपस्थ होती हैं। ये सभी 13 इन्द्रियां स्वयं में अचेतन हैं। माया शक्ति के स्पन्दन ही इनकी चेतना बनते हैं। माया ही इन्द्रियों को विष्ायों की ओर मोडती है तथा माया ही कार्य करने की स्वंतत्रता देती है। माया किसको कह रहे हैं। ब्रह्म उस पदार्थ का नाम है जो आकाश में उपलब्ध है। उसकी शक्ति जो अखण्डता को खण्ड-खण्ड करके विभिन्न स्वरूप बनाती है, उसे माया कहते हैं। ब्रह्म के शरीर में होने वाले सूक्ष्म स्पन्दन ही माया हैं। स्पन्दन में दोनों ओर गति होती है-भीतर भी और बाहर भी। इसी को प्रसार-संकोच अथवा अहं-विमर्श भी कहते हैं। ब्रह्म को अहं और विमर्श रूप विश्व को इदं कहा है। माया ही ब्रह्म से बिन्दु,नाद,भुवन,भाव आदि का निर्माण करती है। पदार्थ रूप में अव्यय, अक्षर, क्षर और पंच महाभूतों की जनक है। शब्द रूप में स्वर, व्यंजन, पद आदि बनाती है। सारी क्रियाएं स्पन्दन रूप में चलती हैं। हमारे शरीर का निर्माण, बुद्धि और मन की क्रियाएं सभी इसी स्पन्दन से चलती हैं। अत: बाहर हम भिन्न-भिन्न होकर भी भीतर एक ही हैं।
ध्वनि की एक अन्य विशेष्ाता है कि यह वर्तुलाकार आगे बढती है। आपके मुंह से निकला हुआ शब्द हर व्यक्ति और पदार्थ से गुजरता है। उसको प्रभावित करता है। आप भी हर ध्वनि से प्रभावित होते हैं। कोई भी इसके प्रभाव रूप से बच नहीं पाता। मान लीजिए, आप किसी का अहित करने की सोचकर कोई कार्य करते हैं। इसमें आप और आपकी इच्छा, क्रिया और भाव जुडे हैं। उनके स्पन्दन बाहर निकलते हैं। जब यह उस व्यक्ति के पास पहुंचेंगे, तब उसके स्पन्दन इनका विरोध भी करेंगे। यदि उसके प्रारब्ध में अहित नहीं लिखा है, तब यह स्पन्दन उससे टकराकर आपके पास ही लौटेंगे। विशेष कर जब वह व्यक्ति आपका अहित न चाहता हो। आपके स्पन्दन और कर्म से जुडे भाव नए स्पन्दनों का, नए भावों का निर्माण करेंगे। आपका ज्ञान क्या मार्ग पकडता है, आपके मन का संकल्प किस दिशा में जाना चाहता है, आपका अपनी प्रतिक्रियाओं पर कितना नियंत्रण है(चित्त निरोध), उसी के अनुरूप मन में इच्छा पैदा होगी। जो कर्म अहित करने के लिए आप कर चुके, वे आपका भी उतना ही अहित, उसी दिशा में करेंगे। ‘ताको फूल के फूल हैं, वाको है त्रिशूल’ ही चरितार्थ होता है। हितकारी स्पन्दन व्यक्ति के मन को छू लेते हैं। उसके भाव स्वत: ही आपके प्रति आकर्षण पैदा करते हैं। आप किसी अपरिचित शिशु के पास खडे होकर उसके प्रति स्त्रेह के भाव सम्प्रेषित करें। कुछ ही देर में वह आपको अपना लगने लगेगा। आपके साथ खेलने लगेगा। उसका शरीर भले छोटा है, किन्तु आत्मा वैसी ही है जैसी आपकी है। आप उसको देव मानकर पूजा करके देखिए। आपका स्वयं का मन देव तुल्य हो जाएगा। बच्चों के परिवर्तन तुरन्त दिखाई पडते हैं। बडों के परिवर्तन कभी सही होते हैं, कभी झूठे निकल जाते हैं। आप कुछ कहना चाहते हैं। कहने से पहले भीतर की प्रक्रियाओं को देखिए। कहने की इच्छा का और कहने के प्रभावों का आकलन करके देखिए। कैसे इच्छा से प्राणों में हरकत आती है, कैसे प्राण नाभि से ऊपर उठकर शब्द बनते हैं, कैसे श्वास भीतर पहंुचकर दिशा बदलती है, कैसे ध्वनि निकलती है यह सारा परिवर्तन कैसे आपके मनोभावों के साथ बदलता है। भाव हमारे कर्मो का बीज है। वैसा ही हम वृक्ष लगाते हैं। फल भी उसी अनुरूप लगते हैं। बीज कडवा या विषैला है तो दूसरों का भी अहित करते हैं और कर्म फल के रूप में अपनी जमीन को भी विषाक्त करके उजाडने का उपक्रम करते हैं। विद्या ही इस अज्ञान अथवा अविद्या के प्रभाव को निरस्त करके हमारे कर्मो को पवित्र करती है। जहां भी कर्म के साथ विद्या का योग रहता है, वहीं बुद्धियोग रहता है।
इस विश्व में केवल माया ही कर्ता रूप है। उसकी स्वतंत्रता को कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। उसका नाम ही स्वतंत्र कर्तृत्व है। वही हर कर्ता की वर्तमानता है। यही शक्ति रूप भाव विश्व के अणु-अणु को सत्ता प्रदान करने वाला चैतन्य है। प्रत्येक जड और अजड भावों का ह्वदय है। इसका कार्य रूप तो त्रिगुणात्मक प्रकृति है। सत-रज-तम से मन-बुद्धि-अहंकार बनते हैं। यही हमारी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था है। हमारा अन्त:करण (मन-बुद्धि-अहंकार) ही चित्त रूप है। इसके साथ पांच तन्मात्राएं जुडकर सूक्ष्म शरीर का निर्माण करती हैं। यह भाव रूप है। पांच तन्मात्राएं – शब्द, रस, गंध, तेज और स्पर्श। इसी के भीतर कारण शरीर होता है, जिसके ह्वदय रूप ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र अक्षर प्राण होते हैं। सूक्ष्म और कारण शरीर सदा साथ रहते हैं, मुक्ति तक। माया के कारण ही तन्मात्राएं ज्ञानेन्द्रियों से जुडती हैं। पांचों कर्मेन्द्रियों से जुडती हैं। तन्मात्राएं ही स्थूल पांच महाभूत बनती हैं। त्रिगुण के कारण मन में भी संकल्प-विकल्प उठते रहते हैं। मन का सुख, बुद्धि का दु:ख और अहंकार की मूढता भी माया के स्पन्दनों से ही प्रकट होती है। अत: सुख-दु:ख पैदा करना और उनको भोगना दोनों ही कार्य माया के ही हैं। कार्यता और कतृüत्व, भोग्य और भोक्ता। अस्तित्व रूप में भाव कार्य करते हैं।
आत्म उन्नति के मार्ग में विकल्प संस्कार अर्थात् अपनी भावनाओं का परिष्कार करना ही मूल प्रयत्न है। प्रतिकूल दिशा में प्रवाहमान विकल्पों को परम्परा का मार्ग बदलकर बलपूवर्क, स्वरूप चिन्तन की अनुकूल दिशा में लगाने से स्वयं ही विकल्पों का संस्कार हो जाता है। यही चित्त निरोध है। इसके लिए संकल्प की दृढता, सद्विचार, अटल श्रृद्धा और आत्म शक्ति की तीव्रता चाहिए। माया के स्पन्दन ज्ञान रूप में अन्त:करण में कार्यरत रहते हैं और क्रिया रूप में पांच स्थूल प्राणों (प्राण-अपान, उदान, समान और व्यान) के रूप में। प्रत्येक मंत्र इन्हीं प्राणों के सहारे उस स्पन्दन रूप आत्मबल से तादात्म्य प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। जिस प्रकार इन्द्रियां संकल्प मात्र से अपने-अपने कार्यो को सिद्ध कर लेती हैं उसी प्रकार मंत्र भी मन चाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने में प्रवृत्त होते हैं। सृष्टि का विस्तार शब्द के साथ ही चलता है। आन्तर शब्दना को परा-वाणी कहते हैं। इसी में स्थूल वाचक और वाच्य शब्द राशि गर्भ में रहती है। वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठ भूमि में भी वही आन्तर विमर्श ही कार्य करता है। अत: मुख से उच्चारित ध्वनियां विचित्र प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। मायाशक्ति के कारण ही साधारण वर्ण भी कल्पनातीत हलचल पैदा कर सकता है। फिर मंत्र क्यों नहीं कर सकता मंत्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित रहता है। पहले चित्त को निर्मल करना मौलिक आवश्यकता है।
विकल्पों का संस्कार करने से भावनाएं निर्मल होती हैं। मन में ‘शुद्ध विद्या’ का उदय होता है। यह शुद्ध विद्या तत्व ईश्वर से नीचे और माया से ऊपर एक अन्तरावर्ती तत्व है। वह यहां अभिप्रेत नहीं है। विद् लाभे, विद् ज्ञाने, विद्-विचारार्थक। विद्या। विद्या से शिव धर्मो का लाभ, विचार पैदा होना कि मैं अनादि धर्मा हूं, मैं स्वयं ही शक्ति केन्द्र शिव हूं। यही उन्मना(उन्मेष) अवस्था है। यही कारण है कि मंत्र का उच्चारण करते ही चित्त, मंत्र और मंत्र के देवता की सघन एकाकारता हो जाती है। तब वह वर्ण न रहकर एक अमोघ शक्ति बन जाता है। शरीर में कार्यरत सभी विषय या तो भूतात्मक होते हैं अथवा भावात्मक। भूतात्मक सारे विषय पंच महाभूतों से बने होते हैं। भावात्मक विषय आकार रहित संवेदनात्मक हैं- सुख, दु:ख, धर्म आदि। (समाप्त)
गुलाब कोठारी

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