Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 5, 2009

षोडशी-2

षोडषी अथवा स्वीट सिक्सटीन की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद प्रतिवर्ष एक-एक कला का पूर्ण विकास होता है। सोलह वर्ष में सभी सोलह कलाएं पूर्ण विकास को प्राप्त कर लेती हैं। एक और तथ्य महžवपूर्ण है कि इस षोडषी पुरूष में तीन पुरूष रहते हैं- अव्यय, अक्षर और क्षर। इसमें अव्यय आलम्बन है, किसी कार्य-कारण भाव में नहीं आता। अक्षर निमित्त कारण है। अक्षर पुरूष स्वयं समष्टि रू प है। उसमें से व्यष्टि भाव में जीव और जड प्रादुर्भूत होते हैं। अत: अक्षर पुरूष ईश्वर कहलाता है। स्वयं अव्यक्त है, अदृश्य रहता है। ये अतिसूक्ष्म तत्व जब घनभाव में आता है तब यही व्यक्त होकर क्षर पुरूष कहलाता है। विश्व क्षर रू प है। इसको ये अक्षर गतिमान रखता है। क्षर पदार्थ के स्वरू प से जुडा हुआ समवायी कारण है।

जगत की सत्तारू प प्रतिष्ठा के प्रतिष्ठाता ब्रम्हा हैं। यज्ञादिष्ठाता विष्णु हैं। अग्नि स्थानीय ईंधन इन्द्र हैं। अग्नि का कार्य वस्तु को पैना करके उसके अवयवों को तोडकर तीखा बना देना है। सोम पदार्थ को स्निग्ध करता है। विरल अवयवों को संकोचन करके घन बनाता है। अव्यय की पांच कलाएं आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक् आमोद, प्रमोद, ज्ञान, विज्ञान, चेतना, शक्ति, प्राणों एवं वाणी के नियामक पंचकोश के रू प में स्थित रहती हैं।
पिप्पलाद ऋषि ने आत्मा को षोडषी कहा है यानी यह सोलह कलाओं वाली है। ये कलाएं हैं- प्राण, श्रद्धा, पृथ्वी, आप, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय, मन, अन्न, अन्न से उत्पन्न वीर्य, तप, मंत्र, लोक, नाम और कर्म। जैसे रथ के चक्र की नाभि में चारों ओर अरे जुडी रहती हैं वैसे ही इस पुरूष में ये 16 कलाएं चारों ओर ठहरी हुई हैं। ये कलाएं आत्मा में उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई, उसी आत्मा में लीन हो जाती हैं। जैसे कई नदियां समुद्र में लीन होकर अपना नाम-रू प खो देती हैं वैसे ही पुरूष में लीन होने पर इन सोलह कलाओं के नाम-रू प भी नष्ट हो जाते हैं। केवल यह शुद्ध आत्मा ही रह जाता है।

आधुनिक पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरीर में भी प्रमुखत: सोलह तत्व हैं- आक्सीजन, हाइड्रोजन (यद्रुजन यानी बहती हुई), नाइट्रोजन (नक्तद्रुजन या स्याही), कार्बन (अंगार या कोयला), सल्फर (गंधक), फास्फोरस (पस्पर्श), सोडियम, पोटेशियम, कैलशियम, मैग्नीशियम, लीथियम, फ्लोरीन, क्लोरीन, आयोडीन, सिलीकॉन (शिलाकण) और आयरन यानी लौह तत्व। शरीर में अस्थि, मांस, मज्जा, रक्त, त्वचा, वसा, शुक्र आदि पदार्थ इन्हीं 16 तत्वों के आवाप (कुछ मिलाना) और उद्वाप (कुछ निकालना) से बनते हैं।

आत्मा के दो भेद हैं- ईश्वर प्रजापति रू प और जीव प्रजापति रू प। षोडष कला युक्त जीव प्रजापति रू प आत्मा में 18 व्यावहारिक आत्मा होती हैं। इनमें तीन वर्ग अमृतात्मा, ब्रम्हात्मा और शुक्रात्मा हैं। अमृत वर्ग की चार, ब्ा्रह्म वर्ग की पांच और शुक्रवर्ग की 9 आत्मा समझनी चाहिए। अमृतात्मा में परात्पर विवर्त का भाव अभयात्मा कहलाता है। अव्यय का आलम्बनात्मा, अक्षर का नियन्तात्मा और क्षर का भाव परिणाम्यात्मा कहलाता है। ये पुरूष आत्मा अमृतमय हैं।

इसके आगे ब्रम्हा के विकास में आत्मा का विवर्त प्राण, आप, वाक्, अन्न और अन्नाद के रू प में होता है। आत्मा के भाव प्राण का शांतात्मा, आप का महानात्मा, वाक् का विज्ञानात्मा, अन्न का प्रज्ञानात्मा और अन्नाद का आत्म भाव प्राणात्मा कहलाता है।

तीसरे वर्ग शुक्रात्मा में शरीरात्मा साधारण अग्नि रू प में है। हंसात्मा वायुरू प में है। दिव्यात्मा इन्द्र है जो वैश्वानर कहलाता है, अग्नि है। चौथा दिव्यात्मा ही, इन्द्र ही तैजसात्मा वायुरू प में है। पांचवां प्राज्ञ इन्द्र कर्मात्मा के रू प में है। छठा चिदाभास ज्योतिर्मय है। सातवां चिदात्मा साक्षात है। यही इष्टदेव कहलाता है। यह चेतना ज्ञानमय तत्व है, उसी को विभूति कहते हैं, ब्ा्रह्म भाव में है। फिर आठ और नवां शुक्रात्मा है- श्री और ऊर्क यानी ऊर्जा। श्री विड् भाव में और उर्जा क्षत्र भाव है।

कर्मरू प आत्मा वासनामय है। इस 16 कलाओं वाले कर्म पुरूष के 16 गुण सुश्रुत शारारीक में बताए गए हैं। ये सोलह गुण हैं-सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन, संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय और विषय की उपलब्धि।

एक ही तत्व का 16 स्वरूप में बदलने का कार्य माया के द्वारा निष्पन्न होता है। माया का यह योग तीन प्रकार का होता है। इन्हें योग, बन्ध और विभूति कहते हैं। जहां भी रस (ब्रम्हा) अथवा अमृत की प्रधानता होती है, उसे विभूति संसर्ग कहते हैं। कर्म की प्रधानता होने पर यह बन्ध माना जाता है। विभूति और बन्ध की समता को योग कहते हैं। जहां दो के संयोग से तीसरा नया पैदा होता है और दोनों पुराने नहीं रहते, इसी का नाम बन्ध है। जल और वायु के संयोग होने पर न जल रहता है, न ही वायु। फेन बन जाता है।

तृण रूप घास खाने से गाय के शरीर में दूध बनता है। तृण दूध के भाव में बन्ध जाते हैं। गाय के शरीर की जठरागिA ने उन तृणों को दूध रूप में परिणत कर दिया। यह अगिA का विभूति सम्बन्ध है। इसी प्रकार आत्मा भिन्न-भिन्न विधाओं में भोक्ता बनता है। जो भोग्य पदार्थ आत्मा के लिए उपलब्ध होते हैं, वे वृत्तिता संसर्ग से होते हैं। ये भी अमृत एवं मृत्यु रूप तीन प्रकार के आसक्ति, उदार और समवाय रूप होते हैं। ये एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। परिवर्तन भी स्वाभाविक ही होता है। ब्रह्म के साथ जुडते ही बल/माया में असाधारणता आ जाती है। वायु की भिन्न-भिन्न गतिभाव के बाद भी आकाश तो निर्लेप ही रहता है। तीनों वृत्तिता संसर्ग कर्म सम्बद्ध आत्मा में कर्म रूप माया बल के कारण प्रवृत्त होते हैं।

अपने निज रूपेण रस रूप आत्मा और बल रूप शक्ति का एक रूप ही है। उन दोनों में भेद व्यवहार, रस के विभूति, बंध, योग सम्बन्ध से तथा बल के उदार, समवाय, आसक्ति संसर्ग से होता है। इसी कारण समस्त पदार्थो में भेद पैदा होता है। यह कैसे पैदा होता है और अन्त में कहां चला जाता है, यह नहीं जाना जा सकता। जो दिखाई पडे और जाना न जा सके उसी को संसार में माया कहते हैं। कार्य रूप में अचानक दिखाई पडे और उसका कारण समझ में नहीं आए। माया भी माया, महामाया और योग माया रूप में कार्य करती है।

रस और बल के परस्पर सम्बन्ध में जहां रस की प्रधानता हो, वहां तीन पुरूष (अव्यय, अक्षर, क्षर) का प्रादुर्भाव होता है। जहां बल या शक्ति की प्रधानता हो, वहां प्रकृति का प्रादुर्भाव होता है। पुरूष में मन-प्राण-वाक् मुख्य तत्व होते हैं। शक्ति स्वरूप में सत-रज-तम मुख्य तत्व रहते हैं। इनसे ही महत्, अहंकार और तन्मात्राएं पैदा होती हैं। इनमें एक-एक पुरूष का एक-एक शक्ति से सम्बन्ध रहता है। रस के व्यापक धर्म ज्योति, विधृति (धारण करना) और प्रतिष्ठा हैं। बल प्रधान शक्ति के तीन रूप हैं-अशनाया (भूख), विक्षेप और आवरण। प्रवाह रूप बल जब स्थिर-सा बन जाए, तब वह आवरण हो जाता है।

शैव शास्त्रों में जो माया का वर्णन है वह भी समान संकेत ही करता है। परमेश्वर की शक्ति को यहां स्वातं˜य शक्ति कहा है। इसके स्पन्दन पांच रूपों में होते रहते हैं। चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये ही परम ईश्वर के सर्वकतृüत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, और व्यापकत्व कहलाते हैं। परमेश्वर (अनुत्तर तत्व) इसी शक्ति पंचक के सहारे सृष्टि, स्थिति, संहार पिधान और अनुग्रह रूप कार्य हर क्षण करता रहता है। यही शक्ति पंचक आगे चलकर विद्या, कला, राग, काल और नियति रूप में बदल जाता है। माया तत्व के साथ मिलकर आत्मा का षट् कंचुक रूप आन्तरिक आवरण बनाता है। मोक्ष होने तक यह भी जन्म-जन्मान्तरों में आत्मा का अंग बना ही रहता है। देह, प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेन्द्रियो को बहिरंग आवरण या स्थूल शरीर कहते हैं। इस शरीर की आकृति, प्रकृति और अहंकृति षोडशी पुरूष के स्वरूप पर निर्भर करती है। सम्पूर्ण जगत यूं तो षोडशी है, किन्तु कर्म भेद के कारण भिन्नता लिए रहता है।

गुलाब कोठारी

5 टिप्पणियाँ »

  1. Comment by Dr V P Pandey ,Professor of Medicine in Medical College

    Res/Sir,
    It is my humble resquest /& comment on comment that in order to make your article easy in language, one should not kill the soul of matter/subjet.Weight of the subject can be explained only in PROPER TERMS.fro instance,
    “Daudna” & “Bhagna” (=run)are not the same.
    Let the reader uplift himself & enrich in terms of language.
    It is my humble submission

    टिप्पणी द्वारा Amitabh Shukla — मार्च 8, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Res/ Sir.
    I am regular reader of your “SPANDAN” IN Ptrika, Newspaper.
    your articles are extraoridary. Above par.

    My long awated search for Solid Knowledge & Substaintail Study ends in work.
    It shows how much depth is in our Sanskati. After reading your articles I am fully convienced that only Hindu Dharm(not culture) is the best in the world. Our Rishi had a wisdom to analyse beyound Phisical matters. They could see which couldn’t be seen. They can touch which is not there.
    Please , keep writing for the new generastion .

    Regards
    Amitabh Shukla

    टिप्पणी द्वारा Amitabh Shukla — मार्च 8, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. Respected Kothariji,
    I am a regular reader of Spandan and many of these collectible articles are with me , some I remember as quotes and some I try to follow and practice in life .
    My comment is about “Schodasi II ” article today in Patrika.
    If I read this article it seems that under the flow of Knowledge of this unknown word of “atma” and “Brahma” the language is so tough or Clistha that I could not understand paragraph number 1,2,6 and some more. It was impossible to grasp the sentence and proceed for next line —- failing which the whole article seems to be very difficult.
    I am a Professor of Medicine in Medical College and on such difficult times I consider myself representing more than 90% readers who will find it difficult to understand this article,
    Many of us will find it more useful if you can write simple hindi meaning below or at the same place to enjoy full masterpiece of knowledge and religion.
    Dr V P Pandey- Indore-9826032164

    टिप्पणी द्वारा Dr V P Pandey — अक्टूबर 7, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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