Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 7, 2009

किसके साथ

पशुभाव है
कर्म
ज्ञान के बिना
ज्ञान भी
बन जाता है
विष
बिना उपयोग के।
पैदा किसने किया
अज्ञान को
कौन करता है
इसको विकसित
फिर भी होता है
बहुत बडा
ज्ञान से
असीम-अनंत।
सर्वाधिक त्रस्त
होते हैं ज्ञानी ही
अज्ञान से
ज्ञान के अहंकार से
दुत्कारते हैं
अपने ही कर्मोü को
आगे चलकर
साहस नहीं होता
स्वीकार करने का।
जैसे कि
मुझे पसंद आई
एक लडकी
प्यार हो गया
मन भी
तैयार हो गया
करने को शादी
लगने लगी
सबसे सुंदर
दुनिया भर में
भाती नहीं
कोई भी दूसरी
जवाब दे दिया
बुद्धि ने भी
हम मान गए।
मान गए
मां-बाप भी
दोनों के
वे तो
करते भी क्या
बस गया
घर हमारा
सुंदर-सा।
कुछ काल बाद
गूंजने लगी
किलकारियां
देर कहां लगती है
गुजर जाने में
अच्छे दिनों को,
और फिर
शुरू हो गए
विवाद-संवाद
नित नए तेवर
नित नए विषय
कभी पीहर
कभी ससुराल
कभी बच्चे
सूखने लगे कंठ
पछताने लगा मन।
सुना था
शादी के लaू
खाओ और पछताओ
नहीं खाओ
तो भी पछताओ।
पडने लगा भारी
हर दिन
कटती नहीं रातें
होने लगा
बीमार, शरीर भी
चिंतित हो उठे
परिजन-स्वजन
फिर एक दिन
तय कर लिया
अलग होना
दोनों ने।
लगा, मिल गया
मार्ग
सुखी रहने का।
पिताजी ने पूछा
विश्व सुंदरी
आज बन गई है
विष-कन्या
किसके साथ रहकर
वाह, रे ईश्वर
जड दिया
मेरे ही गाल पर
उठा,
लगा दिया सिंदूर
फिर से
पत्नी के भाल पर।

गुलाब कोठारी

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1 टिप्पणी »

  1. Respectable Sir..
    i have read your this social poem .
    its the system of our indian culture and its very old..you also live this system by yourself in your homeand in your life..you can’t leave that..ha.
    i have listen your criticle inner sound by you its very painfull for all and all are know your inner pain by this poem.
    but i think this condition is start by miss understanding in human life system all are live for self we are forget the care of others feeling and hopes we want just take and take we don’t want to give to all..ha.
    any way thanks for your truth full poem ..i find this link by your patrika sunday magazine with your article.
    regards
    yogendra kumar purohit
    M.F.A.
    BIKANER,INDIA

    टिप्पणी द्वारा yogendra kumar purohit — अक्टूबर 11, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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