Gulabkothari's Blog

नवम्बर 10, 2009

विष वृक्ष

महाराष्ट्र में एक विधायक को राष्ट्र भाषा में शपथ लेने के कारण पार्टी विशेष के विधायकों की आक्रामकता का शिकार होना पड़ा। पूरा सदन जैसे शिथिल होकर रह गया था। यह हमारे लोकतंत्र की पगड़ी उछालने जैसा ही मामला है। वह भी चुनौती देकर। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नियम तो दुर्याधन और कंस के राज में भी था। महाराष्ट्र विधानसभा में आज जो कुछ दुर्घटना हुई, उस पर तो पूरे देशवासियों का खून उबल जाना चाहिए था। क्षेत्रवाद का यह स्वरूप किसी जातिवाद और आतंकवाद से कम तो नहीं कहा जा सकता। भाषा की इस संकीर्णता में और कटट्रवाद में कहां अन्तर रह जाता है?

राज ठाकरे ने जब यह घोषणा की कि जो भी विधायक मराठी में शपथ नहीं लेगा, उसे सदन में ही देख लिया जाएगा, उसे तब ही गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। इससे बड़ा देशद्रोह और क्या हो सकता है। जिन-जिन प्रदेशों ने क्षेत्रीयता और भाषावाद का सहारा लिया है, उनके सम्बन्ध शेष राष्ट्र के साथ स्वत: ही बदलते चले गए हैं। महाराष्ट्र में जब छठ की पूजा को लेकर बिहार/यूपी के लोगों के विरूद्ध अभियान चला था, तब भी शिवसेना प्रमुख की देश भर में थू-थू हुई थी। इस बार भी उनका अहंकार चुनाव से पूर्व चरम पर था, जब उन्होंने कहा था कि राज कौन होता है मराठी की बात करने वाला। मैं सबका बाप हूं। यही अहंकार राज ठाकरे को भी विरासत में मिला है। इसी के कांटे उसको चुभ भी रहे हैं।

ईश्वर ने उसे आगे बढ़ने का साहस दिया है। साथ चलने को टीम में भरोसे के साथी भी दिए हैं। फिर उसे समाज के हित में कार्य क्यों नहीं करना चाहिए। केवल मराठी का संघर्ष तो आगे चलकर घाटे का सौदा ही रहेगा। बाल ठाकरे इसके उदाहरण हैं। उनके पास धनबल, भुजबल, सत्ता क्या नहीं है। पर क्या महाराष्ट्र के बाहर देशवासी उनका उतना ही सम्मान करते हैं, जितना महाराष्ट्र में करते हैं।

प्रश्न यह है कि सदन में राज ठाकरे की पार्टी के विधायकों ने जब संविधान और लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए अकेले विधायक पर आक्रमण कर दिया तब उन विधायकों को केवल चार साल के लिए निलम्बित करने का क्या औचित्य है? उनके लिए तो पूरे पांच साल के लिए सदन से निष्कासित किया जाना और जीवन में फिर कोई भी चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करना भी कम ही सजा होती। पुलिस में मामला भी दर्ज कराया जाता। चार साल का निलम्बन तो उनसे ज्यादा उनके चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को दण्डित करना है, जिनकी अब सदन में आवाज ही नहीं रहेगी।

महाराष्ट्र की इस दुर्घटना ने एक मौका दिया है सच्चाई के लिए संघर्ष करने का। यह संघर्ष खतरों से खेलना ही है। लोकतंत्र को प्रतिष्ठित रखना है तो सामंती/ अपराधी तत्वों से संघर्ष करना ही पड़ेगा। बल्कि यह संकल्प तो अब हर प्रान्त के सदन और संसद के शपथ-पत्र में जुड़ जाना चाहिए कि- “मैं संकल्प करता हूं कि मेरी उपस्थिति में यदि सदन में कोई लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ने का प्रयास करता है और सभापति भी कार्रवाई नहीं करता, तब मैं कानून की शरण लूंगा।”

महाराष्ट्र विधानसभा में भाषा के नाम पर आतंकित करना, मारपीट करना तो बलवे की परिभाषा में आता है। इसे किसी भी बहाने से, किसी भी समीकरण के बहाने ठण्डे बस्ते में नहीं डाला जाना चाहिए। यह अकेले महाराष्ट्र का नहीं देश का सवाल है। देशभर में इस दुर्घटना के विरोध में आवाजें उठनी चाहिएं। कैंसर प्रभावित अंग शरीर की शोभा नहीं बढ़ाता।

गुलाब कोठारी

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6 टिप्पणियाँ »

  1. through this article sir has very well descripted the narrow-mindedness of we Indians in respect of our respective languages.being emotional for our language is one thing but for that matter neglecting others or marginalising them is in no way tolerable.sir has truly said that when mr. thackeray is having such a committed force and he himself is powerful then why not he is using it in an affirmative sense.people should understand that promoting ones religion or language is fine but they dont have any right to criticise the other religions.mr.thackeray should be condemned and penalised for his shameful act.

    टिप्पणी द्वारा kanchan soni — नवम्बर 29, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. I totally agree with your views.Even after knowing that [being a political issue no action will be taken] you have done a remarkable job of expressing your views.Your views are the unexpressed voice of all the intellectuals in our country.I feel we need human beings of your calibre,strength,and intellect to represent us.

    Tarun chohda
    ahmedabad
    gujarat

    टिप्पणी द्वारा tarun chohda — नवम्बर 17, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. u have rightly said, sir.but what one can do in such situation?

    टिप्पणी द्वारा jayantijain — नवम्बर 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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