Gulabkothari's Blog

मार्च 10, 2010

पुनरागमन

पूरब की दुल्हन
पश्चिम का दूल्हा
मिल गए
न जाने कैसे
मानते थे
भीतर से तो हैं
सभी बराबर
सभी एक से,
यह भरम
टूट गया
कुछ सालों में
विचारों का भेद
मिलने नहीं देता
दोनों को
अहंकार तैयार नहीं
झुकने को।
पहले घायल हुई
दुल्हन
चली गई साथ
पूरबिया के
छोड़कर
अपनी लाड़ली को
बाप के भरोसे।
होश उड़ गए
बाप के भी
कहां सोचा था
यह हो जाएगा
कैसे पालूंगा
इस नन्ही परी को
वह भी चल दिया
पश्चिम में
जा बसा
अमरीका में
भर्ती कराकर
बच्ची को
किसी छात्रावास में।
इस बीच
तड़प उठी मां
रो पड़ा
उसका कलेजा
धिक्कारने लगी
खुद को
कैसे जाए
इतनी दूर
कैसे मुंह देखे
दिल के टुकड़े का
पढ़ाई भी
इतनी महंगी
अमरीका में
बाप को करनी पड़ी
दो-दो नौकरियां
बच्ची की खातिर
बेहाल था
खुद का तो।
घर-बेघर सा
मारा-मारा
थकने लगा था
जीवन से।
क्या भूल हुई
उससे
क्यों दिया अभिशाप
ईश्वर ने
वह तो आस्तिक था
क्या हुआ जो नहीं गया
मंदिर
या गिरिजाघर,
भूल यही थी
बस
उसको मान लिया
अपने जैसा
संस्कृतियां
मिल नहीं सकतीं
शिक्षा के भरोसे
बुद्धि के बल पर
वहां तो होता है
बस अपमान
एक दूजे का
खोखले दिखते हैं
नारे सत्यता के
भौतिक विकास के
दिल तो सब में
एक-सा होता है
उस धरातल पर
कौन जीता है
मां समझती है
सबसे पहले
इसीलिए
लौट आई
दुल्हन
फिर से पश्चिम में
करके प्रायश्चित
पिछले कर्मों का
रहने लगे फिर से
साथ-साथ।

गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. great composition sir….so much relevant today vn the young generation really underestimates the importance of the background and the culture, one has been brought up in…u so well portrayed the repercussions of the mistake done under the influence of impulses….ur words always sound like soul of humanity

    टिप्पणी द्वारा monisha — मार्च 23, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. GOOD EXPRESSION.

    टिप्पणी द्वारा DR DEEPAK SAHU — मार्च 11, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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