Gulabkothari's Blog

अप्रैल 19, 2010

बस भोगवाद

ऎसा क्यूं होता है कि, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली से जुड़े मुद्दों के खिलाफ “अघिकांश कानूनों” का निर्माण तभी हुआ जब-जब केन्द्र में कांग्रेस सत्ता में रही। इनमें से अघिकांश विदेशी संस्कृति अथवा शुद्ध वोटों की राजनीति पर आधारित थे। कांग्रेस नेतृत्व ने इसके लिए सदा अपने मंत्रिमण्डल की राय को माना। कभी जनभावनाओं को जानने अथवा उनका सम्मान करने की कोशिश नहीं की। यही कारण है कि देश में आज कितने ही कानून बन चुके जो देश की संस्कृति या ग्रामीण शैली के विरूद्ध हैं। इन कानूनों का सहारा लेकर शासन/प्रशासन के लोग जनजीवन में सुख के स्थान पर नया त्रास पैदा कर रहे हैं। न कानूनों के बारे में देश को शिक्षित किया जा रहा है, न ही परम्परा की कहीं सुनवाई होती दिखाई देती। ऎसा ताण्डव और लूट का नजारा तो न अंग्रेजों के राज में था, न ही मुगलों के काल में। आश्चर्य इस बात का है कि, जब-जब ऎसे कानून बने विपक्ष भी सरकार की हां में हां मिलाता नजर आया। आज तो लोकतंत्र के प्रतिनिघि ही सबसे बडे भक्षक हो रहे हैं। आई.पी.एल. जैसी व्यापारिक गतिविघि में केन्द्रीय मंत्रियों की भागीदारी लोकतंत्र के गाल पर तमाचा ही तो है। और ये लोग कैसे-कैसे संस्कृति विरोधी बयान दे रहे हैं।

पिछले सालों में जो कानून विकास के नाम पर बने या कानूनों में संशोधन हुआ, सारा ही देश के विखण्डन के काम आया। आज गांधी, नेहरू या अम्बेडकर जीवित होते तो रो रहे होते। देश की एकता, अखण्डता और संस्कृति का जितना नुकसान हमारे नेताओं ने किया है, उतना किसी ने नहीं। आश्चर्य यह भी है कि सब के सब इनको उपलब्घि मान रहे हैं। किसी कानून के मसौदे पर राष्ट्रीय बहस नहीं कराई जाती। किसी पुराने कानून की राष्ट्र के परिपे्रक्ष्य में समीक्षा नहीं होती। अहंकार इतना हावी रहता है कि बोलने वाला ही अपमानित होकर चला जाता है। संवेदना तो मर गई पूरी की पूरी। औरतों में भी नहीं दिखती, मर्दो में कहां से लाओगे। कानून भी ऎसे ही लोग बनाते हैं। आजकल “लिव इन रिलेशनशिप” का कानून चर्चा में है। बिना शादी रहने के लिए कानून क्यों चाहिए। वयस्क स्वमर्जी से रह ही सकते हैं। लेकिन कुछ लोग की इज्जत आबरू उछालकर उत्सव मनाते हैं। उन्होंने ही संस्कृति के विरूद्ध कानून बनवाने का वातावरण बनाया है। ये सब अंग्रेजीदां हैं। भारतीय जीवन शैली से इनका परिचय भी नहीं हैं। पर केन्द्र में इनकी प्रभावशीलता के कारण देशवासियों की आवाज दबकर रह जाती है। फिर कानूनों की पालना भी गरीब की ही जिम्मेदारी है। अमीरों तथा प्रभावी लोगों पर इसकी कोई पाबन्दी नहीं। गरीब को नोंच लिया जाता है। वे ही लोग नोंचते हैं जिनको आम आदमी स्वयं चुनकर भेजता है। यह एक आसुरी सत्य है। सारे अफसर अंग्रेजी मानसिकता वाले और नेता लूटने वाले। दोनों मिल जाएं तब? इन सबकी कृपा से हमारा संविधान पंगु हो गया। सम्प्रदायों के बीच सौहार्द समाप्त हो गया। जातियों के बंटवारे ने देश को खण्ड-खण्ड कर दिया। आरक्षित जातियों की नई पीढियों को इनकी सजा भोगनी पड़ेगी। इनके पुरखों का किया ये ही भोगेंगे।

देश में शारदा एक्ट से लेकर महिला आरक्षण, बेटी को बाप की सम्पत्ति में अघिकार, दहेज विरोधी कानून, बाल अपराध आदि कई कानून बन चुके। कागजों में क्या है, नहीं मालूम। समाज को तो राहत नहीं मिली। और अब दहेज कानून का संशोधन। इसमें हर प्रकार के उपहार को रजिस्टर कराए जाने का प्रावधान है। शादी के पहले भी एवं बाद में भी। इसमें भी आम आदमी को तंग करने का एक नया हथियार मिल जाएगा। बड़ी-बड़ी शादियों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता या आंखें मूंद लेते हैं। तब कानून बनते किसके लिए हैं? जो महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले ही दबा बैठा है। तब स्वत: ही एक प्रश्न उठता है कि यह सारा तंत्र लोक के लिए कार्य करता है या लोक के विरूद्ध? कानून बना “इण्डियन” रहे हैं और लागू भारत पर कर रहे हैं। लागू करने के स्तर पर अघिकांश कानून नीचे पहुंचते-पहुंचते जड़ अथवा संवेदनाशून्य हो जाते हैं क्योंकि वे मूल में इण्डियन हैं।

गुलाब कोठारी

14 टिप्पणियाँ »

  1. और एक स्वार्थी बात पूछना चाहता हूँ जी, अगर मैं पत्रिका के लिए लेख भेजूँ तो किस मेल पर भेजूँ, अगर प्रकाशित होने लायक हों तो जरूर प्रकाशित करें, वरना कूड़ादान तो कहीं गया नहीं। मैं बिल्कुल स्पष्टवादी हूँ, जिसके कारण मुझे बोलने और सुनने में कोई बुरा नहीं लगता, बस वो कहता हूँ, जो दिल को अच्छा लगता है।

    टिप्पणी द्वारा kulwant happy — मई 16, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. आज मध्य प्रदेश पत्रिका देखी, उसका नया रूप देखकर बहुत अच्छा लगा। आपको प्रतिक्रिया इसलिए भेज रहा हूँ, ताकि जो आप अपने हॉकरों की तरह इस मेहनती टीम का भी हौसला अफजाई करें। ताकि हम इससे भी बेहतर पत्रिका का आनंद उठा सके।

    टिप्पणी द्वारा kulwant happy — मई 16, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. bilkul sir indian kanoon banate hai aur bhartiya unhe follow karte hai,,hamari bhi majburi hai kyunki hum kanoon bana nahi sakti bus follow kar sakte hai

    टिप्पणी द्वारा amit yadav — मई 6, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. Dear Dr kotharisahib,
    Normally I get to know about your views through your articles in the Rajasthan Patrika which I have been subscribing to ever since we settled down in Jaipur. Your articles are very thought provoking, especially those on spiritualism. I am a Physicist and have developed great interest to look at the subject of consciousness and spirituality in terms of the laws of Nature and broadly in terms of Physics and Physicsal principles. I have written a couple of posts on several subjects and I invite you to glance through these in my blog: http://www.sumankumarsharma.wordpress.com
    Your father respected Shri Kulishji was a visionary and I had a chance to meet him once at the residence of respected Prof. Chand Mal Sharmaji and I remember the discussion about science of precious stones and their role in astrology. I was to go abroad at that time and could not get such an opportunity again for discussion on such abstract but very lively topics with him. I would say Rajasthan Patrika has grown and growing due to the immense literary and journalistic interests of not only those who are associated with it but also of its founders Resp. Shri Kulishji and you. I wish you all success in your mission. With kind regards,
    suman k sharma

    टिप्पणी द्वारा Dr. Suman Kumar Sharma — मई 4, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  5. Sir,
    I find it difficult to type in hindi, so writing in english.
    Since adolescence I am a regular reader of Patrika….it goes back to those days when “RAJASTHAN PATRIKA” heading used to be in saffron colour. Superb nostalgia of bygone days…
    Not only ‘bhogwaad…’ but your all such editorial articles are having ‘primetime’ worth. I think it is because of few underlined qualities – you never hesitate to write the truth, never compromise on what you want to express, have all depthful vision of Indian society & values and what ultimately we really require in this era of erosion in values. Aap sahi baat likhne main nhi hichakte that’s why everyone rushes on your frontpage editorials whenever these are written by you.
    Every aspect of life is under pressure & undergoing transitions. Values are finding their pseudo meanings as the people attain success through shortcuts. Honesty, integrity, respect for our values etc lagta hai outdated aspects ho gaye hai.
    Es changing scenario main aapki kalam jis sateekta aur nidarta se sachaai likhti hai, that needs all appreciations. Aise hi likhte rahiyega, sir.

    टिप्पणी द्वारा Dr SP Singh — अप्रैल 28, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  6. 1.Respected Gulab Kothari,

    This is a matter of national concern!. As a matter of fact, you have aptly detailed present status of indian polity.But the Million dollar question is whither system or people can bring about a change / betterment in the situation.
    Lot of discussion has been done right from the day of estt of constituent assly and the debate is going on till today. Things are getting worse day by day.Successive governments have neglected the core issues.
    Kindly show light,

    Thnx

    Anurag

    टिप्पणी द्वारा Smt.Anurag Gurjar — अप्रैल 21, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  7. In my opinion it doesn’t matter which political party is ruling the country. Whether it is BJP or congress because it is the people of the country who are electing them. People of country are whole and sole responsible for anything right or wrong the government is doing.
    We are lacking the sense of responsibility for nation. Public property should be considered as the property of every one but it is considered as property of no-one.
    Poor are exploited because they want to be exploited. I was managing a small branch of a company where my superior manager used to collect the salary of junior employees from the head office and distributed among them he forcefully take some money from the salary of junior employees by saying that I bring your salary you have to give me some part of it or I will not give you a single Rupee. Company took an action against it and sent salary with an employee from head office itself. They removed his role from distribution of salary.
    But what I saw in later months that junior employees were still paying some part of it to him and told him that “Sir I wish to go on a half day leave you just provide me or other ways in which you can help me and can have some share out of my earnings”
    This is just an example.
    What I am trying to say is things are not like what they appear to us superficially.
    If you want this nation to advance then there is one thing that can be done.
    Every citizen has to pledge that he/she will not use any kind of unfair means for gaining any kind of benefit.
    Media is itself a corrupt body just trying to manipulate happenings in order ti increase viewership and trps or its circulation. Big media person commits crimes and escape out of their jack and cheque. Or by the influence of the names of their brands, many tutors molest small girls in their tution centers but nothing comes in light because victim is afraid of earning bad name out of it.
    But don’t worry some honest people are their in pipeline who will very soon change the course of things

    टिप्पणी द्वारा aditya — अप्रैल 20, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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