Gulabkothari's Blog

मई 24, 2010

भूषण

भूषण, आभूषण, अलंकरण, प्रसाधन, परिष्कार आदि शब्द एक ही परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। भ+उ+ष+ण। प्रभावशाली, शक्तिशाली अभिव्यक्ति अथवा विषय का प्रकाशन करना। इसमें व्यक्ति एवं विषय दोनों समाहित हंै। समाज भूषण, देश भूषण जैसे पर्याय भी हैं। आभूषण शब्द व्यवहार में शरीर के साथ जुड़ा है। यह पूर्ण रूप से देश-काल से जुड़ा रहता है। श्ृंगार का अंग भी होता है। और अहंकार का भी। जबकि भूषण तपस्या का परिणाम होता है। आभूषण बनने के लिए तो चोटें भी सहन करनी पड़ती हैं। सोने के टुकड़े को कोई गले में लटकाकर नहीं चलेगा। भूषण हर परिवार में समाज की आवश्यकता है। अर्थात जीवन तपस्या पूर्ण होना चाहिए। सुविधापूर्ण नहीं।<br/><br/>तपस्या ही सुन्दरता का मूल है। आभूषण का यह सर्वोत्तम संदेश है। सुन्दरता मोह अथवा आकर्षण का भी कारण होती है। माया रूप है। माया का नया आवरण पैदा कर दिया जाता है। व्यक्ति अपने गले में सोने के इस आभूषण को डालकर बंध जाता है। यह बन्धन उसकी प्रसन्नता का कारक है। बिना विचार किए स्वयं को जड़ पदार्थ से बांधते जाना ही पशुभाव है। भूष्ाण भी दो श्रेणी के होते हैं। बाहरी दुनिया के और शाश्वत आत्मा के। आत्मा के भूषण संस्कारों से जुड़े होते हैं। प्रारब्ध से जुड़े होते हैं। वे मृत्यु के बाद भी आत्मा से जुड़े रहते हैं। व्यक्ति की प्रज्ञा भी इनके कारण ही प्रकट होती है। सम्यक् ज्ञान और सम्यक् दर्शन की आचरण में अभिव्यक्ति से ही व्यक्ति “भूषण” दिखाई पड़ता है।<br/><br/>हर देश का एक दर्शन होता है। लोकजीवन होता है। परम्पराएं होती हैं। इस जीवनशैली का कुछ अंश भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ा रहता है, कुछ इतिहास से तथा कुछ साम्प्रदायिक विचारों से। हम अपनी जीवनशैली में भी आभूष्ाणों की, श्ृंगार की, प्रसाधनों की भूमिका को नित्य देखते हैं। यह भी तथ्य हमारे सामने है कि यह परम्परा समय के साथ घट रही है। देवी-देवता हमें इसीलिए अच्छे लगते हैं कि वे आभूषणों से लदे रहते हैं। उनके तो अस्त्र-शस्त्र भी आभूषणों का ही कार्य करते हैं। त्रेता, द्वापर, कलयुग में लोगों की वेश भूषा का अभिन्न अंग रहे हैं आभूषण। शायद शुरू में फूलों और पत्तों के ही आभूषण बनते रहे होंगे। जैसा कि कालीदास की शकुन्तला पहनती थी। धातु युग के पहले। धीरे-धीरे विकास हुआ होगा। किन्तु एक काल ऎसा भी आया होगा, जब आभूषणों पर शरीर की दृष्टि से शोध हुआ होगा। समय के साथ आभूषण सम्पत्ति के रूप में भी उभर कर आए और समाज की स्थिति के मापदण्ड के रूप में भी। समय के साथ जीवन शैली के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ गए। स्त्री-पुरूष दोनों के लिए ही समान रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। आज जरूर शिक्षा और शहरीकरण ने इनको एक तरफ धकेलने का प्रयास किया है। शहरी पुरूष तो अब अंगूठी/चेन के अलावा कोई आभूषण पहनता दिखाई ही नहीं देता। शहरी, शिक्षित लड़कियां भी नाम-मात्र के गहने ही पहनती हैं। शादी के बाद भी त्यौहारों तक सीमित रह गए।<br/><br/>नई पीढ़ी में सुन्दरता का बोध तो उतना ही है किन्तु वह प्रसाधनों को अघिक महत्व देती है। केश विन्यास, उबटन, लिपस्टिक, आदि मुख्य प्रसाधन बन गए हैं। इनके बारे में सूचनाएं-विज्ञापन भी खूब होते हैं। मानस पटल पर छाए ही रहते हैं। फिर एक आधार विकसित देशों की नकल भी है। इससे अहं की तुष्टि होती है। भूषण शब्द ही खो गया। फूलों के गहने तो दिखाई ही नहीं पड़ते।<br/><br/>यही हाल विभिन्न समाजों का भी होता जा रहा है। हर समाज में पुराने कुछ लोग रह गए हैं, जिन्हे भूषण कह सकते हैं। जिस कारण समाज गौरवान्वित रहता है। उनके नाम से समाज का सम्मान होता है। आभूषणों का प्रत्यक्ष रूप भी होता है और परोक्ष स्वरूप भी। यह बात केवल भारतीय जीवनशैली से ही समझी जा सकती है। हमारे यहां आभूषणों की कई श्रेणियां बनी हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कर्म के अनुसार। रोग के अनुसार। कुमारी अथवा विवाहिता के लिए भी कुछ निषेध/ स्वीकृति है। इसी तरह वैधव्य में भी कुछ आभूषण उतरवा दिए जाते हैं। खेतों और जंगलों में कार्य करने वालों के गहने, धूप-छांव में रहने वालों के लिए, अत्यघिक ताप में कार्य करने वालों (भट्टी जैसे) के लिए, अमीर/गरीब लोगों के लिए आदि-आदि श्रेणियां बनी हुई हैं। इसका एक स्पष्ट अर्थ है कि आभूषण केवल सौन्दर्य की आवश्यकता ही नहीं है। शरीर की अनिवार्यता भी है। सम्पत्ति और दिखावा इनका नकारात्मक भाव हो सकता है, किन्तु इनका महत्व बहुत प्रकार से समझा जा सकता है। एक तो धातु, दूसरे मणिए-पत्थर तथा अन्य पदार्थ जिनसे भी आभूषण बनते हैं। यह सारा रूप शरीर के साथ-साथ भीतर भी प्रभाव तो डालता ही है। तभी तो ज्योतिषी कहता है कि अमुक पत्थर पहन लो। अमुक अंगुली में पहन लो। इनका सम्बन्ध भी सभी नौ ग्रहों के साथ समझाया जाता है।<br/><br/>सृष्टि के हर रूप में चार वर्ण होते हैं। पत्थर और धातुओं में भी होते हैं। तभी आपने देखा होगा कि कभी-कभी कोई पत्थर व्यक्ति को सहज नहीं होता। माफिक नहीं होता। किसी ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति को (जन्म से होना आवश्यक नहीं है) क्षत्रिय वर्ण का पत्थर कैसे माफिक आ सकता है। हर पत्थर का एक ग्रह स्वामी है। राहू-केतु के अलावा सात ग्रह हैं। शरीर के सात धातु हैं। हर एक पत्थर, शरीर के धातु का एक-एक ग्रह स्वामी होता है। शरीर के किसी भी धात में जब कोई रोग होता है, तब उसकी चिकित्सा उसके स्वामी ग्रह के पत्थरों से या औषघियों से ही की जाती है। यह भारतीय क्रम हैं। इसी प्रकार चीन में एक्यूप्रेशर/ पंचर चिकित्सा भी मेरिडियन आधारित होती है। रोग के अनुसार भिन्न मेरिडियन के बिन्दुओं को दबाव अथवा सुई से प्रभावित किया जाता है। हम इस चार्ट का भी यदि अध्ययन करें तो समझ जाएंगे कि हमारे सारे आभूषण किसी न किसी मेरिडियन पर निरन्तर दबाव बनाए रखते हैं। शरीर को प्रतिदिन स्वस्थ रखते हैं। तब हमें हमारे ऋषियों के ज्ञान की गहनता पर गर्व होता है। भूषण/ आभूषण बाहर/ भीतर की सुन्दरता, आभामण्डल तथा रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाने का अचूक उपक्रम है।<br/><br/>गुलाब कोठारी

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3 टिप्पणियाँ »

  1. And People are busy writing on blogs

    टिप्पणी द्वारा a simple human — मई 25, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. In department of Income Tax. corruption is not a new thing. 10% of TDS amount is requested ad bribe via media C.A. filing return.
    The constables of CID and Police threatening common mass.
    General Public being raped by those who were appointed to protect it.

    टिप्पणी द्वारा a simple human — मई 25, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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