Gulabkothari's Blog

मई 25, 2010

नकेल हाथ में लें

हमारा जीवन आशाओं, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ता है। जीवन किसी दर्शन के साथ लक्ष्य की ओर चले तो लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए जीना पशु भाव है। संवेदना, सह्वदयता एवं वसुधैव कुटम्बकम् की अवधारणा ही मनुष्य को बड़ा बनाती है तथा ऎसे समाज में सुख की प्रतिष्ठा रहती है। समष्टि भाव सभी शासन, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थानों आदि की एक अनिवार्यता है। समय के साथ यह संकुचित (व्यष्टि रूप) हो रही है। पिछले दो वर्षो में जो अनुभव हमको मध्यप्रदेश में हुआ, उसमें राजनीति का व्यष्टि भाव चरम पर दिखाई दिया। कुछ लोगों ने तो द्वापर में मथुरा के कंस की याद दिला दी, जो किसी के भी अधिकारों का अतिक्रमण कर लेते हैं। अहंकार के जीते-जागते पुतले हैं। उनके साथ जरासंध, शिशुपाल सब मिले हुए हैं। जनता को त्रस्त करने में ही इनका गौरव स्फीत होता है। सरकार किसी भी पार्टी की हो, कोई अन्तर नहीं पड़ता। अब अगले चुनावों से पड़ने लगेगा।
दूसरी ओर, जनता के हौसले बुलन्द हुए। उनके दुख-दर्दो की चर्चा होने लगी। पूरा मध्यप्रदेश आज एक सूत्र से जुड़ गया। सारी जानकारियां पूरे प्रदेश में एक साथ उपलब्ध होने लगीं। जिन मुद्दों पर जनता हथियार डाल चुकी थी, वे फिर से एक-एक करके उठने लगे। पिछले दो वर्षो में पत्रिका ने कई मुद्दों का निस्तारण करने में अपनी भूमिका निभाई। कुछ आसुरी शक्तियों के चेहरे भी उजागर किए। संवाद-सेतु कार्यक्रम के जरिए लोगों से सीधा जुड़ने का प्रयास किया। इसका परिणाम सुखद रहा। लोग हर मुद्दे पर साथ होने लगे। शासन, प्रशासन, न्यायपालिका और जनता को विश्वास हो गया कि पत्रिका अपने कर्म के प्रति गम्भीर भी है और समझौता भी नहीं करता। अनेक अवसरों पर इन्होंने भी आगे आकर सहयोग किया। जनता ने सार्वजनिक सरोकारों में मुक्त हस्त साथ दिया। आज दो साल की अल्प अवधि में ही पत्रिका मध्यप्रदेश की आवाज बन गया। जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। आभार! आज भी पत्रिका कुछ नेताओं का भ्रष्टाचार उजागर कर रहा है। तथ्य जनता के समक्ष रखे हैं। सरकार कार्यवाही नहीं कर रही है। “जमीन का दर्द” में आम आदमी/संस्थाओं के विरूद्ध तो कार्रवाई हुई, किन्तु जैसे ही बड़े नाम उजागर होने लगे, सरकार हाथ खींचती नजर आई। एक मामले की जांच लोकायुक्त कर रहे हैं। वह मामला पहले ही न्यायालय में चल रहा है। कई मामले अभी कार्यवाही का इन्तजार कर रहे हैं। पुरानी जांचों का कार्य अभी तक शुरू नहीं हुआ। राज्यपाल का संकेत बेकार गया। इन सारी बातों से सरकार की मंशा तो समझ में आ गई कि यह जनता के काम नहीं आएगी, किन्तु मतदाता अब पहले जैसे सोया हुआ भी नहीं है। प्रदेश के अन्य अखबारों ने जनता का साथ न देकर हमारा रास्ता भी आसान किया। इन अखबारों ने अपनी कमाई का कुछ अंश पत्रिका की प्रतियां खरीदने में किया और हमारा मनोबल बढ़ाया, हम उनके भी आभारी हैं।
पाठकों से एक निवेदन। हमें प्रतिदिन जाग्रत रहना है। लोकतंत्र की नकेल हाथ में लेनी है। जनता के द्वारा नियंत्रित होना चाहिए। इसी के साथ नई पीढ़ी का भविष्य जुड़ा है। युवाओं को सूचना के अधिकार का नियमित प्रयोग करना है। घोटाले पत्रिका भी उजागर करेगा, जनता उनसे जुड़े लोगों का बहिष्कार करना शुरू कर दे। बस, हम गांधीजी के अहिंसा मार्ग पर चलकर भी भ्रष्ट लोगों को घरों में समेट देंगे। चारों पायों की मरम्मत कर देंगे। आगे अभी पूरी उम्र पड़ी है। जनता का आशीर्वाद ही हमारे लिए पा†चजन्य का काम करेगा।
गुलाब कोठारी

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4 टिप्पणियाँ »

  1. माननीय गुलाब कोठारी साहब,
    सादर प्रणाम,
    बरसों से आपको पढ़ रहा हूँ और आपकी लेखनी का कायल हूँ. कई- बार सोचा कि अमुक आलेख पर अपनी टिपण्णी लिखूं लेकिन ‘तसल्ली से लिखूंगा’ सोचकर रुकता रहा और कभी लिख नहीं पाया. आपके आलेख ‘नकेल हाथ में लें’ को पढने के उपरांत सदा की भांति एक बार फिर से मन वैचारिक क्रांति को आतुर लेखक को नमन करने का हुआ और सौभाग्य से आज ही आपके ब्लॉग के माध्यम से सीधे आपसे संवाद का सुअवसर भी मिल गया. आलेख के अंत में आपकी इन पंक्तियों ‘….भ्रष्ट लोगों को घरों में समेट देंगे। चारों पायों की मरम्मत कर देंगे। आगे अभी पूरी उम्र पड़ी है।’ ने तो आपके आत्मविश्वाश का लोहा ही मनवा दिया. मुझे लगा कि आज यदि मैं आपकी प्रशंसा करने और आभार व्यक्त करने का अवसर खोता हूँ तो यह ईश्वर की दृष्टि में मेरे द्वारा किया गया अपराध होगा. समाज और राष्ट्र को जगाने में आपकी महती भूमिका के सामने एक आम आदमी के रूप में मेरी भूमिका उस गिलहरी जितनी तो हो ही सकती है जिसने रामसेतु के निर्माण में एक कंकर को समुद्र तक पहुँचाया था. आखिर एक निर्भीक लेखक को साधुवाद मिलना ही चाहिए ना. आप जैसे राष्ट्र प्रहरियों के रहते जनता-जनार्दन की आशा की किरणों पर तमस नहीं छा पायेगा.
    कुछ माह पूर्व प्रकाशित आपके एक आलेख की पंक्तियाँ भी मेरे मानस पटल पर स्थाईरूप से अंकित हो गयी हैं. आपने लिखा था क़ि “…….देश के सामने एक प्रश्न है। आजादी की जंग में कोई एक परिवार नहीं था। सरदार पटेल, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, भगत सिंह, सुभाष बोस जैसे भी सैकड़ों थे। किसी के परिजनों ने आज तक उनकी कुर्बानी की कीमत नहीं मांगी। केवल वे लोग ही पेंशन ले रहे हैं, जिनकी भूमिका पर जनता अंगुली उठाती रही है।”
    आप जैसे चिन्तक मनीषियों से इस देश के भविष्य को बहुत अपेक्षाएं हैं. आपके भागीरथी प्रयासों के लिए मै ह्रदय से शुभकामनाएं देता हूँ.
    सादर,
    आपका अपना,
    आर. के. सुतार

    टिप्पणी द्वारा R. K. Sutar — जून 6, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. आदरणीय भाई साहब,
    वंदे मातरम्। मध्यप्रदेश में सफलता के दो वर्ष पूर्ण करने और पाठकों की आवाज बनकर पत्रकारिता जगत पर छाने के लिए पूरे पत्रिका परिवार को हार्दिक-हार्दिक बधाई। आपके आव्हान पर सुधि पाठक भी लोकतंत्र की नकेल अपने हाथों में लेने के लिए तत्पर हैं। बस, जरूरत आपके इसी तरह सहयोग की है। बीते दो साल में पत्रिका ने राजधानी और महानगरीय स्तर पर जनता के अधिकारों पर अतिक्रमण से संबंधित कई मामले उठाए हैं, लेकिन जिला स्तर पर इस तरह के प्रयासों में कमी नजर आई है। मैं आपका ध्यान प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के गृह जिले विदिशा की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। यहां एक बड़ी समस्या कृषि उपज मंडी के स्थानांतरण से संबंधित है। जिसमें प्रदेश के वित्त मंत्री राघवजी बाधक बने हुए हैं। इसी तरह एक मामला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानि एएसआई की भेदभाव की नीति से जुड़ा है। एएसआई ने अपने संरक्षित स्मारकों के आसपास निर्माण करने या मकानों में तब्दीली करने वाले आम लोगों को नोटिस जारी कर कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन मुख्यमंत्री चौहान को छोड़ दिया। मुख्यमंत्री का वेयरहाउस विदिशा के एक महत्वपूर्ण स्मारक खामबाबा यानि हेलिओडोरस स्तंभ की प्रतिबंधित परिधि में आता है। एएसआई ने इस वेयरहाउस के विस्तार के लिए मुख्यमंत्री को एनओसी जारी कर दी, क्योंकि वे मुख्यमंत्री हैं। जबकि सांची के स्तूपों के पास से आम लोगों को अपने घर हटाने को कहा गया है। आपसे अपेक्षा है कि इन मसलों को प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे। हां, यदि आपका आदेश होगा तो मैं इन मामलों पर पूरी जानकारी आपके मेल पर दे दूंगा। पुनश्च: स्वर्णिम सफलता के लिए हार्दिक बधाई

    टिप्पणी द्वारा Dr. Aazad Singh — मई 25, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • क्या आप स्थानीय संपादक श्री विनोद पुरोहित से मिल सकेंगे? भोपाल में ।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — जून 3, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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