Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 11, 2010

देर है, अंधेर नहीं

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

“सबको पता है कौन सा जज भ्रष्ट है और कौन नहीं। सभी जज भ्रष्ट नहीं होते। कोर्ट में अच्छे न्यायाधीश भी मौजूद हैं। यह समय प्रतिक्रिया व्यक्त करने का नहीं, आत्मविश्लेषण का है।”
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने भले ही यह तीखी टिप्पणियां इलाहाबाद हाईकोर्ट के मामले में की हों लेकिन सच यह है कि उसने देश के तमाम न्यायालयों और उनमें बैठे न्यायाधीशों को आईना दिखाया है। जिस तरह से हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय/ उच्च न्यायालयों के अनेक न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार और अनैतिकता के आरोप गूंजे हैं, यह टिप्पणियां उन्हें मर्यादा में रहने की ललकार भी है तो सुधरने की चुनौती भी। ऎसा नहीं है कि उसने केवल न्यायपालिका को ही फटकारा है। पिछले दिनों में उसने किसी को नहीं बख्शा। चाहे केन्द्र सरकार होे या मुख्य सतर्कता आयुक्त। इस नए स्वरूप की देशभर में वाह-वाह हो रही है। उनका न्यायपालिका में खोया हुआ विश्वास लौटता जान पड़ रहा है। अन्यथा सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के मुद्दों, विशेषकर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमण्डल खेलों के प्रकरण ने देशवासियों को निराश ही कर दिया था। सरकार और मंत्रिमण्डल के किसी सदस्य के चेहरे पर कोई शर्म या शिकन तक नहीं दिखाई दी। दूध के धुले मनमोहन, देश पर न्योछावर रतन टाटा, अम्बानी, राजा और न जाने कौन-कौन नाच रहे एक राडिया की अंगुली पर। मंत्री बनने के लिए मारन ने दिए 600 करोड़ रूपए करूणानिधि की पत्नी (कनिमौझी की मां) को। राडिया भी मंत्री पद दिलवाती थी, तो मनमोहन सिंह पर उसकी कौनसी ऎसी पकड़ थी। क्या ये सारे मुद्दे देश को बेचने जैसे नहीं लगते? अंतिम निर्णय जब आएगा तब आएगा, लेकिन शुरूआती सुनवाई में ही सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों ने भ्रष्ट गठजोड़ के नकाब उतार कर फेंक दिए।
ऎसा ही फैसला पिछले दिनों उसने सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में आरक्षण पर दिया है। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण का प्रावधान तो रखा लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि, संविधान लागू होने के दस वर्ष बाद हर तरह का आरक्षण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। ताकि आरक्षित वर्ग मुख्य धारा का अंग बना रहे। फिर भी हर बार इसकी समयावधि बढ़ती चली गई और आज तक जारी है। आरक्षण बढ़ाने तथा उसका उपयोग बदलने वाले मुद्दे पर तो भाजपा कांग्रेस से भी आगे निकल गई थी। भाजपा शासन में सर्वोच्च न्यायालय के आरक्षण सम्बंधी फैसले के विरूद्ध संसद ने कानून तक पास कर दिया था। तब हुए संविधान संशोधन के अनुसार पदोन्नति के बाद नए पद की नई वरिष्ठता सूची रहेगी और रिक्त पदों को भरने में 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा में बैकलॉग के पदों की संख्या शामिल नहीं होगी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में रि-गेनिंग रोकने सम्बन्धी दो अधिसूचनाओं को असंवैधानिक करार दे दिया। इसके कारण सन् 1998 से 2008 तक कोटे के लिए दोबारा चयन बोर्ड बनाना पड़ेगा। आरक्षण कोटे में की गई पदोन्नतियां इससे प्रभावित होंगी। राज्य ही क्या देश भर में हजारों लोग फिर से पुरानी तर्ज पर सूचीबद्ध होंगे। भले हर राज्य अपने-अपने लिए अलग-अलग फैसले का इंतजार करे। अब यही देखना है कि, भाजपा रि-गेनिंग के फैसले पर सरकार का साथ देती है अथवा देश का। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तो अति साहसपूर्ण, निष्पक्ष एवं निर्भीक ही माना जाएगा।
इस फैसले के साथ ही देश में राजनीतिक शक्तियों की गिरावट का दूसरा दौर भी शुरू हो सकता है। पदावनत होने वाले अधिकारी/ कर्मचारी राजनीतिक दलों पर दबाव बनाएंगे कि फैसले को किसी प्रकार प्रभावी न होने दिया जाए। राजनेता यदि देश के प्रति जरा भी संवेदनशील हैं और केशवानन्द भारती की नजीर को ध्यान में रखते हैं, तो फैसला देश हित में सही प्रमाणित होगा। अभी संसद में जो रूख विपक्ष ने दिखाया, वैसा ही इस फैसले के पक्ष में भी दिखाया तो विपक्षी दलों का सम्मान बढ़ेगा। नहीं तो बिकाऊ और स्वार्थी ही माने जाएंगे।
न्यायपालिका यदि इसी प्रकार दुर्गा बनकर मैदान में उतर जाती है तो विधायिका एवं कार्यपालिका को हर हाल में घुटने टेकने पड़ेंगे।
यदि न्यायपालिका स्वयं मुखौटा लगाकर सामने आती है तो लोकतंत्र लुट जाएगा।

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