Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 13, 2010

इन्द्र-1

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

इसे शास्त्रों में देवताओं के राजा के रूप में जाना जाता है। इसके प्रतीकों में वाहन रूप ऎरावत हाथी एवं आयुध रूप में गदा दिखाई पड़ते हैं। अत: इन्द्र शक्ति के प्रतीक भी हैं और गति के भी। चूंकि देवता शब्द “प्राण” का पर्यायवाची है, अत: इन्द्र मुय प्राणों में, ह्वद् प्राणों में गिना जाता है। शिव को वैदिक परिभाषा के अनुसार “इन्द्र” नाम से कहा जाता है। अत: हमारे तीन मुय (ह्वद्) प्राण-ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र को ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते हैं। इनमें ब्रह्मा स्वयं भू लोक के, विष्णु परमेष्ठी लोक के तथा शिव सूर्य मण्डल (स्व:) के अधिष्ठाता हैं।

इन्द्र की शक्ति को शचि कहते हैं। ब्रह्मा हर आकृति के केन्द्र का नाम है। उसी को प्रतिष्ठा शब्द से कहा जाता है। जिसके केन्द्र नहीं होता उसे “ऋत्” कहते हैं। केन्द्र के कारण ऋत् ही सत्य कहलाता है। मन और प्राण दोनों ही ऋत् हैं। चूंकि वाक् में केन्द्र होता है अत: वाक् ही मन-प्राण की प्रतिष्ठा है।

इन्द्र का एक नाम है “श्वा”। आकाश रूपी शून्य स्थान में रहने वाले इन्द्र को श्वा कहते हैं। इसी को शुन भी कहते हैं। शुन के कारण ही शून्य शब्द का अर्थ जुड़ा है। इसी इन्द्र प्राण को ईथर कहा जाता है।

विष्णु प्राण का कार्य आदान और इन्द्र का कार्य है विक्षेपण। विष्णु सोम अर्थात अन्न लाते हैं, इन्द्र अगिA रूप में बाहर फैंकते हैं। “अगिAसोमात्मकम् जगत” कहा है। ये ही सृष्टि के मूल तत्व हैं। सौर प्राणों को ही इन्द्र कहते हैं, जो हमारी आत्मा के अधिष्ठाता प्राण हैं। विज्ञान आत्मा, प्रज्ञान आत्मा भी सौर प्राणों पर निर्भर करते हैं। प्रज्ञान आत्मा ही आंख-कान-नाक आदि से बाहर निकलकर विषयों को प्रकाशित करता है। अत: आंख-कान आदि को इन्द्रिय कहा जाता है। इन्द्र शब्द ईध से बना है। अत: ईधन की तरह अगिA रूप में प्रकाशित करता है। अत: इन्द्रियां जिसका पोषण करती हैं, वह “सत्येन्द्र” कहलाता है। वही देखता-सुनता है। इन्द्र का धर्म ही प्रकाश है, जैसे अगिA का धर्म ताप है। सूर्य से हमें ज्योति, आयु और गौ (मनोता) प्राप्त होते हैं। अत: इन्द्र ही ज्योति इन्द्र है, इन्द्र ही को “तं मामयुरमृतमित्युपास्व” कहा है। ज्योति के साथ-साथ गौ (विद्युत) भी इन्द्र प्राणों से ही उत्पन्न होती है। ज्योति के कारण ही रूप दिखाई पड़ता है। चूंकि मन ही रूप लेता है, मन को भी इन्द्र ही कहते हैं।

सृष्टि के प्रारंभ में जो रस रूप ब्रह्म आकाश मे था, वही माया बल से घिर कर “अव्यय पुरूष” कहलाया। चूंकि यहां एक ही माया है अत: इस अव्यय पुरूष की कोई कला नहीं है। यह निष्कल है। निष्कल को ही श्वोवसीयस ब्रह्म कहते हैं। यही मन का मूल स्वरूप है। बल के द्वारा सीमित होते ही ब्रह्म में केन्द्र बना, वही मन कहलाया। प्राण विहीन मन। प्राण के जुड़ने से असत् मन की सत् संज्ञा हो जाती है।

माया बल से निष्कल पुरूष बना। ह्वद् बल से सीमित हुआ और मन बना। मन का धर्म है इच्छा। धर्म और धर्मी साथ रहते हैं। अत: इच्छा भी मन के साथ ही प्रादुर्भूत होती है, पैदा नहीं होती। इच्छा बल को ही काम कहा है। ऋग्वेद में लिखा है-कामस्दग्रे समवर्तताधि मनसो रेत:प्रथमं यदासीत्। ऋक् 10/106/5 व्यापक ब्रह्म जब माया के द्वारा सीमित कर दिया गया, तब फिर से व्यापक होने की इच्छा पैदा हुई। इसका कारण माया का ही आवरण है। सीमितीकरण है। जो व्यापक तत्व है, वहां अभाव नहीं होता। इच्छा अभाव के साथ जुड़ी रहती है। माया से ढका रस ही अव्यय मन है। इच्छा के होते ही प्राण क्रियाशील हो जाते हैं। वाक् रूप नई वस्तु तैयार हो जाती है। अव्यय मन की इच्छा से प्राण द्वारा अक्षर सृष्टि होती है और वाक् द्वारा क्षर सृष्टि होती है। मन स्वयं अक्षर एवं क्षर बनता है। यह सारा कार्य योगमाया करती है। महामाया के द्वारा जो अव्यय पुरूष बनता है वह निष्कल होता है। योगमाया के द्वारा जो अव्यय पुरूष बनता है, वह पांच प्रकार की योगमाया के कारण पांच कलाओं वाला बनता है। कलाओं को अनुभूत किया जा सकता है। अत: ये “शुक्ल” कही जाती हैं। जो निष्कल अव्यय है, उसे कृष्ण कहते हैं।

रस की सूक्ष्मतम अवस्था ही मन है। वही मन बलों के सहयोग से प्राण बन जाता है। प्राण ही इच्छा है। माया बल के द्वारा उसी केन्द्र में अक्षर की कलाएं-ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अगिA-सोम उत्पन्न होते हैं। रस और बल साथ रहते हैं। जब बलों का आदान-विसर्ग होता है, तब बल भेद के कारण रस का भी नाम भेद हो जाता है। प्रतिष्ठित रस का नाम ही ब्रह्मा प्राण है। बल मिश्रित रस ही ब्रह्मा कहलाता है। केन्द्र के बाहर जाने वाले बल के साथ जो रस भाग बाहर जाता है उसी को इन्द्र कहते हैं। बल मिश्रित रस को, ऊपर उठने वाले अंश को, प्राण कहते हैं। बाहर से केन्द्र की ओर बल के साथ जो रस भाग आता है उसको विष्णु कहते हैं। विष्णु सौय प्राण है। इन्द्र आग्नेय प्राण है। अगिA-सोम बल भाग हैं।

जो शक्ति प्राण को शरीर से बाहर फैंकती है वही इन्द्र है। इस कमी को पूरा करने का काम विष्णु का है। कमी से ही क्षुधा बल जाग्रत होता है। इन्द्र को पुराणों में महादेव कहा है। अन्न को बाहर फैंकने के कारण इनको संहारकर्ता कहा है। इन्द्र तथा विष्णु प्रतिस्पर्द्धी हैं। रूद्र नामक अगिA प्राण को घोर तथा शिव नामों से जाना जाता है। सूर्य के नीचे का भाग घोर तथा ऊपर का शीतल भाग शिव है। एक ही रूद्र अगिA दो रूप ले लेती है। जिस प्रकार सोम पेट में जाकर अगिA बन जाता है और वही अगिA बाहर आकर सोम बन जाता है। विष्णु तथा इन्द्र की गति जिस स्थायी केन्द्र से जुड़कर कार्य करती है, उसी तत्व का नाम ब्रह्मा है। सृष्टि क्रम का उपादान कारण यही ब्रह्मा बनता है। एक तथ्य समझने का यह है कि विष्णु प्राण पोषण करता है और इन्द्र प्राण के कारण स्थायीभाव घटता है। इन्द्र प्राण जितना अधिक होगा वस्तु उतनी ही कम समय तक टिकेगी। जैसे कर्पूर जल्द उड़ जाता है। ठोस वस्तुएं लंबे समय तक प्रतिष्ठित रहती हैं।

इन्द्र प्राण अथवा महेश को त्रिनेत्र भी कहते हैं। विष्णु एवं ब्रह्मा प्राण स्वयं में एकल प्राण हैं। शिव/सूर्य में ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र तीनों सम्मिलित रहते हैं। अत: महेश्वर हैं। शेष दोनों की ईश्वर संज्ञा है। पुराण कथाओं का जब इस प्रकार विश्लेषण करते हैं, तब सृष्टि के अनेक सिद्धान्त समझ में आने लगते हैं। सोम तो अन्न को केन्द्र तक लाता है। कहां से? जहां जहां तक इन्द्र रूप में यह बाहर फैंकने जाता है। केन्द्र से यहां तक की दूरी को साम या महिमा कहा जाता है। मूलत: साम की केन्द्र की दूरी का सूत्र 33 स्तोम है।

वस्तु की अगिA-सोम रूप महिमा 33 स्तोम तक जाती है। पृथ्वी की उष्मा/ अगिA मार्ग पर 21 स्तोम पर सूर्य की स्थिति है और अगिA 33 स्तोम तक जाती है। इस से ही इन्द्र की भूमिका समझ में आ सकती है। स्वयंभू लोक की स्थिति 48 स्तोम तक जाती है। यह 33 प्राणों/ देवताओं का स्वरूप है। आठ वसु (पृथ्वी के), ग्यारह रूद्र अन्तरिक्ष में और बारह आदित्य सूर्य मण्डल में। दो अश्वनी कुमार मध्य केन्द्र (17 वें स्तोम पर) होते हैं। आगे चलकर यह ही 33 कोटि करोड़ कहलाने लगते हैं। इसमें सोम रूद्र से, वरूण आदित्यों से, इन्द्र मरूतगणों से जुड़ा है।

इन्द्र तीन अगिA तत्वों का सम्मिलित रूप है- त्रिदेव है। यही भूत प्राणियों का आत्मा बनता है। सारे लोक अगिA के 33 रूपों से बनते हैं। सोम इस अगिA के गर्भ में रहता है। वायु-अगिA, सोमागिA, आदित्य अगिA, अगिA देव अगिA इसी एक अगिA के भेद हैं। इन्द्र ही सारी त्रिलोकी के अधिष्ठाता हैं। ऋग्वेद में कहा है-“द्युलोक और पृथ्वी इन दोनों से जुड़े हुए हे वज्रिन! आप पूर्ण भाव में सूर्य से संपृक्त होते हुए इस आठ प्रकार की रौदसी में व्याप्त हो रहे हो।”

यजुर्वेद कह रहा है-“तुहारे भीतर ही द्युलोक और पृथ्वी व्याप्त हो रहे हैं। तुम हमारे भीतर भी प्रविष्ठ हो रहे हो और अन्तरिक्ष के भीतर भी व्याप्त हैं। देवताओं से मिलकर (प्राण रूप) अन्तर्याम रूप में जितना व्यापक तत्व है, उस सब को ग्रहण करते हुए, हे इन्द्र ! आप सोम के द्वारा मद वाले बनो। आपका मद बढ़े।” यहां सूर्य को ही इन्द्र कहा जा रहा है। प्राण रूप देवता ही प्राकृतिक सोम का पान करके आगे की सृष्टि का निर्माण कर रहे हैं। इन्द्र ही महेश्वर रूप में आठ प्रकार से कार्य करता है। ईशान, सर्व, कृतुध्वन्सी, सर्वज्ञ, भूतपति, पशुपति, महादेव और त्रिनेत्र।

इन्द्र विक्षेपण वीर्य होने से पिण्ड के धातुओं को अलग-अलग करके बाहर फैंकता रहता है। प्रजापति के शरीर को तोड़ता रहता है। जीर्ण करता रहता है। इन्द्र प्रधान महेश्वर विग्रह-अनुग्रह के द्वारा संहारक बनता है। इन्द्र द्वारा इन्द्रियों का संचालन होता है। ये ही इच्छाओं को पैदा करने का माध्यम भी बनती हैं। ईध/ दीप्ति से ही इच्छाओं को रोकने का कार्य भी करता है। यदि इन्द्र जाग्रत है तो संयत भाव बना रहेगा। यदि विष्णु शिथिल हो जाए तब इन्द्र का विक्षेपण तेज हो जाएगा। शक्ति का क्षय होगा। कुछ विश्राम के बाद विष्णु से ही यह शक्ति पूरी होती है। क्षरण-पोषण का यह क्रम ही जीवन है। उम्र के साथ इन्द्र की प्रधानता होती जाती है। इन्द्र रूप सूर्य से ही आयु प्राप्त होती है। वही आयु को स्वयं में लौटा भी लेता है।

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