Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 13, 2010

जुगाली राज

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00

केन्द्र सरकार की एक भारी विशेषता यह सामने आती जा रही है कि पहले वह अपराध देखकर अपराधी से समझौता करती है। दोनों एक थाली में खाते हैं। फिर सरकार अचानक अपराधी पर टूट पड़ती जान पड़ती है। खुद खाए हुए को पचाने के लिए जुगाली करने बैठ जाती है।

क्या हुआ राष्ट्रमण्डल खेलों में? सुरेश कलमाड़ी के खिलाफ जबरदस्त वातावरण बना। भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आंकड़े, खरीद के उदाहरण मीडिया में प्रकाशित हुए। शीला दीक्षित (दिल्ली की मुख्यमंत्री) के बारे में भी खूब छपा। सरकार ने क्या किया? पहले खेलों का आयोजन हो जाने दो, जिसको जो भी खाना है पेट भरकर खा ले। फिर सब जुगाली करते रहेंगे। कलमाड़ी को बलि का बकरा बना देंगे। वैसे भी कलमाड़ी का क्या बिगड़ा? इतना अवसर मिले तो हजारों लोग जेल जाने को तैयार हो जाएंगे।

इसी प्रकार 2-जी स्पेक्ट्रम को देख लो। खूब जमकर हाथ मारा। सबको मालूम था क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री जानते थे सारे घोटाले को। उनका यह तर्क सही नहीं है कि उनका निर्देश दरकिनार कर दिया गया। क्या वे कहना चाह रहे हैं कि उनकी हैसियत सारी गतिविधियों को रोकने लायक नहीं थी। देश लुटता रहे और प्रधानमंत्री लाचार। उसके बाद? राजा के साथ भी वैसा ही व्यवहार हुआ जैसा कलमाड़ी के साथ हुआ था। न राष्ट्रमण्डल की लूट सरकारी खजाने में वापस आई, न ही 2-जी स्पेक्ट्रम की। उसके अन्न की भी जुगाली चल रही है। शब्दकोष में सारे गरिमापूर्ण उपालंभ के शब्द इनके लिए कम पड़ रहे हैं।

और अब राडिया का साम्राज्य। जहां स्वयं मनमोहन सिंह का मंत्रिमण्डल, रतन टाटा, अम्बानी जैसे लोग जुड़े हों, तब वह किसी साम्राज्य से कम कैसे हो सकता है। बाकी सब तो उद्योगपति और नौकरशाह हंै, किन्तु प्रधानमंत्री का चाहे बिन चाहे इस प्रकार की गतिविधियों से जुड़ा होना देश के लिए अचरज की बात है। राडिया मंत्री पद और विभाग दिलाने में मदद करती थी। तब उसका 300 करोड़ का व्यापार तो पान खाने जैसा है।

एक मारन मंत्री पद के लिए 600 करोड़ की रिश्वत दे सकता है। वित्त विभाग बात को दूसरी ओर घुमाने की कोशिश कर रहा है। राडिया पर एक अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के एजेण्ट होने का आरोप लगा दिया। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त घोषित कर दिया। यानि अब तक उसके साथ देश के सारे देशभक्त जुड़े रहे। आदान-प्रदान होते रहे, मंत्री पद बंटे, उद्योगों को लाभ मिलते रहे और हमारी खुफिया एजेंसियों को यह पता भी नहीं चला कि जिस महिला के इशारों पर सरकार के बड़े-बड़े फैसले होते रहे, वह गुप्तचर एजेण्ट है। आज जब सारी सूचनाएं हाथ से निकल गई तो सबके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं। अभी तो 800 नए टेप जारी होने की बात और सामने आई है, उनमें भी कई नाम सामने आएंगे। बड़े-बड़े घोटालों में मीडिया से जुड़े लोगों के नाम तो सार्वजनिक किए जाने चाहिएं। साथ ही ऎसे लोगों को दिए गए राष्ट्रीय सम्मान भी वापस लेने चाहिएं।

अपना मुंह छिपाने के लिए भले ही राडिया को राष्ट्रद्रोही साबित कर दें, किन्तु सच तो यह है कि सभी दिग्गज जो इस राष्ट्रद्रोही (राडिया) के साथ जुड़े रहे, वे भी बराबर के गुनाहगार हैं। राडिया यदि सूचनाओं को खरीद रही थी, तो ये सारे सूचनाओं को बेच रहे थे। राडिया तो इन सबकी खरीद-बेच की दलाली ही खा रही थी। जब दलाली ही 300 करोड़ हो, तो मूल व्यापार का लेन-देन कितना होगा? हमारी एजेंसियां थूककर चाट लें कि उनको अब जाकर सचाई का पता लगा है। वरना प्रधानमंत्री को बहुत पहले आगाह कर ही देते।

सरकार की कार्यप्रणाली एक जैसी ही रहेगी। कागज के टुकड़ों पर यदि देश के आदर्श पुरूष्ा ईमान बेच सकते हैं, तो अकेली राडिया ने क्या अपराध कर लिया? विस्तृत रिपोर्ट जब सामने आएगी, तो बोफोर्स रिपोर्ट की तरह सदन के पटल पर कभी नहीं रखी जाएगी।

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