Gulabkothari's Blog

मार्च 7, 2011

सम्प्रेषण और रूपान्तरण

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

सम्प्रेषण की सफलता इसी में है कि वह स्थूल भाषा से निकल कर सूक्ष्म धरातल को तरंगित करे। भावों के ये स्पन्दन मन और आत्मा तक पहुंच कर मानसिक-आत्मिक उत्थान का काम कर डाले। राजस्थान पत्रिका यह कार्य एक संकल्प के रूप में कर रहा है। उद्देश्य है- मूल्य परक समाज, संस्कारवान समाज की रचना। “पत्रिका” के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने हर जिले में संवाद-सेतु आयोजनों में इस संकल्प को सबके बीच निरन्तर व्यक्त भी किया है। जनसंचार माध्यम के रूप में पत्रिका की विकास यात्रा को राज्य के विकास की गति के साथ देख सकते हैं। लेकिन यह सब तो भौतिक उपलब्घियों का ही अंकेक्षण होगा। सम्प्रेष्ाण के चेतन प्रमाणों को समझने के लिए भावनात्मक धरातल को देखना होगा। इस आत्मिक यज्ञ के परिणाम कैसे सामाजिक रूपान्तरण के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं, इसका एक उदाहरण यहां प्रस्तुत है। इसे समझने पर आपको भी स्पष्ट हो जाएगा कि राजस्थान पत्रिका को “अ न्यूज पेपर विद सोल” क्यों कहते हैं। पत्रिका में लिखी बात से नित्य करीब दो करोड़ पाठक रू-बरू होते हैं। देश के सभी संचार माध्यम भी यदि इसी धरातल पर कार्य करने लगें, तो समूचे जनमानस के रूपान्तरण में अधिक समय नहीं लगने वाला।- सं.

जीवन का निर्माण होता है मन के स्पन्दनों से। रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं स्पन्दनों से। रूपान्तरण होता है स्पन्दनों से। क्योंकि इस सृष्टि के निर्माण का आधार “नाद” है। नाद के स्पन्दन है। स्पन्दन का कारक है भाषा। भाषा के स्पन्दन दोनों ओर प्रभावशाली होते हैं- कहने वाले पर ग्रहणकर्ता पर। पवित्र तथा सद्भाव युक्त स्पन्दन दोनों के जीवन में सुगंध भर देते हैं। वातावरण में हवा के साथ-साथ सौरभ फैलती है। भावों में गहनता बढ़ती है। मन विस्तार पाता है। बुद्धि मन का अनुसरण करने लगती है। अहंकार गलने लगता है। नकारात्मक सप्रेषण करने वाले माध्यम जीवन को विषैला बना देते हैं। कट्टरवाद इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। नित्य पूजा-प्रार्थना करने वाले का चित्त प्रसन्न रहता है। नियमित एक ही दिशा में होने वाला सम्प्रेषण ग्रहणकर्ता का रूपान्तरण करता है। प्रवचन एवं सत्संग का यही प्रयोजन रहा है। इसमें स्कूली शिक्षा के स्थान पर विश्वास, आस्था, श्रद्धा की आवश्यकता है।
हाल ही राजस्थान पत्रिका की एक पाठक से प्राप्त पत्र नीचे उद्धृत कर रहा हूं। अपने आप बोल देगा। कहना यही है कि जीवन में श्रद्धा अटूट हो और भूल कर भी खोटे का जीवन में प्रवेश न हो। चाहे मीडिया हो, चाहे रिश्तेदार।

सन् 2005
आदरणीय गुलाब कोठारी जी,
नमस्ते!
अणुव्रत समारोह में आपके दिए गए भाष्ाण की रिपोर्टिग पढ़ी। आपने नारी को केवल घर के लिए बनी बताया है। अगर नारी को घर पर ही रहना है तो ये सब पढ़ाई लिखाई क्यों। क्यों उसे स्कूल-कॉलेज भेज कर ऊंचे सपने दिखाए जाएं। ये समाज की विरोधाभासी गतिविधियां हैं कि एक ओर नारी को पढ़ाने की, उसे जागरूक करने की मुहिम है तो दूसरी ओर उसे केवल और केवल घर में रहने की अनुशंसा भी।
बस इतना ही……

सन् 2011
आदरणीय गुलाब कोठारी जी,
चरणों में नमन, ह्वदय के गहनतम तल से मेरा अभिवादन स्वीकार करें।
यह पत्र बहुत दिनों के चिन्तन-मनन के बाद बहुत हिमत जुटाते हुए आपको लिख रही हूं। पिछले दो वर्ष के दौरान तो कई बार पैन और कागज हाथ में लेकर भी मैं पत्र लिखने का साहस नहीं कर पाई। सोचती कि इतनी बड़ी हस्ती को कैसे पत्र लिखूं। कभी सोचा फोन पर बात करूं तो कभी सोचा ई-मेल ही कर दूं। पर किसी भी काम में साहस नहीं दिखा पाई। पिछले साढ़े तीन वर्ष से तो मेरी शिड्यूल डायरी में “गुलाब जी को पत्र” शीर्षक से एक काम लिखा रहता। हर 15-20 दिन में उस शिड्यूल के सभी काम हो जाते पर “गुलाब जी को पत्र” हर बार अगले शिड्यूल में केरी फारवर्ड हो जाता। इसके पीछे न तो मेरा आलस्य था, ना ही लापरवाही बल्कि साहस की कमी थी। इतने सालों में मेरे लेटर पैड भी बदलते गए और गनीमत है कि मेरे विचार भी बदलते गए। आज बहुत हिमत के साथ, दिल और दिमाग की सारी शक्तियां, पुरानी स्मृतियो को संजोने की कवायद और मन की सारी बातों को आपको कह देने की जुगत करते हुए आपको यह पत्र लिख रही हूं। आशा ही नहीं आज पूर्ण विश्वास हो गया है कि आप मेरी किसी भी गलती को माफ करेंगे।
श्रद्धेय गुलाब जी, मुझे याद है कि सन् 2005 में आप किसी अणुव्रत समारोह में बोल रहे थे जिसकी रिपोर्ट मैंने पढ़ी थी। नारी को घर में ही रहने की अनुशंसा मुझे रास नहीं आई थी। उसके बाद आपके कुछ और आलेख भी पढ़े जिसमें स्त्री की घर की देहरी से बाहर की जिन्दगी पर आपने आलोचना ही की थी। तब से आपके हर लेख हर कविता, हर रचना, हर टिप्पणी, हर वक्तव्य पर नजर पड़ने लगी। शनै: शनै: मेरे विचारों में परिवर्तन आने लगा जब आपकी कुछ कविताओं में नारी को सपूर्ण जगत की जननी-सा महिमामयी बताया।

कुछ कविताओं में मायके का मोह न छोड़ पाने वाली तो कहीं मन भटकाने वाली नारी का चित्रण था। उन कविताओं ने मेरे मन में गहरी घुसपैठ की। तब तक आपका जीवन-दर्शन वाला कॉलम शुरू नहीं हुआ था। फिर आपके इस कॉलम से रूबरू हुई। शायद सन् 2007-08 था। गहरे जीवन दर्शन की कुछ बातें समझ में नहीं आती थी फिर कुछ बातें बहुत अच्छी तरह समझ आने लगी। फिर तो आपका कॉलम मेरी रविवार की दिनचर्या में शामिल हो गया जिसकी चर्चा मैं अपने बौद्धिक मित्रों से इस तरह करने लगी -“पढ़ा आपने ! गुलाब जी ने क्या लिखा है।” उन बौद्धिक मित्रों में मेरी मां भी शामिल रही जो मुझसे अक्सर फोन पर कहती गुलाब जी का कॉलम पढ़ा। अब मेरी मां इस दुनिया में नहीं है। आपके इस कॉलम के कुछ विषय मुझे याद है- ईष्र्या, घृणा, मृत्यु, स्पन्दन, विवाह, मन..। कुछ विषय तो मैं अपने बच्चों और पति को भी पढ़ाती। एक विषय जो विवाह के दो परिवारों के मिलन और दुल्हन के संस्कारों के विषय में था मैंने परिवार के बीच पढ़कर सुनाया था।

सन् 2008 में मुझे एक बार पुन: मां बनने का अवसर मिला। पूरा परिवार विरोध में था जिसका कारण था मैं पहले ही दो बेटियों की मां थी और बेटियां भी काफी बड़ी हो गई थी पर न जाने कौनसे छिपे हुए कारण थे कि मैं यह सृजन पूरा करना चाहती थी चाहे बेटा हो या बेटी। सच कहूं! गुलाब जी! 2007 में आपकी लिखी हुई उस कविता के सहारे मैंने परिवार के कड़े और बेहद कड़े विरोध के बाद समय पार किया। आपकी वो कविता जिसमें स्त्री को धात्री बताते हुए कहा है कि वो एक कण लेकर भी सृष्टि का निर्माण कर लेती है। वो कविता मेरी फाइल में अब भी पड़ी है।

अब एक और रूचिकर बात बताना चाहूंगी अगस्त 2008 में बेटा पैदा हुआ तो सारे विरोध गल गए। अबोध शिशु के सामने सबकी नाराजगी पिघल गई। फिर उसके नामकरण का मामला आया तो बड़ी बेटी सृष्टि ने कहा कि नाम वही रखेगी। असने नाम ढूंढ़ा “स्पन्दन” पर घर में किसी को पसन्द नहीं आया ना ही मुझे। सच बताऊं तो मुझे आपके कॉलम के नाम की खबर नहीं थी। फिर एक दिन आपके कॉलम में स्पन्दन की चर्चा थी-जो मुझे शब्दश: याद है-“जब ब्रह्माण्ड में ना आकाश था, ना धरती, तब केवल स्पन्दन था” उसी दिन मैंने कॉलम पर नजर की तो कॉलम का नाम भी स्पन्दन था। मैं आpüचकित थी कि जो नाम हम अपने बेटे का रख चुके हैं वो आपके कॉलम का है। उस दिन मेरी खुशी का पारावार न था क्योंकि मेरे बेटे का नाम स्पन्दन रखा गया। मुझे अब ये नाम बहुत अच्छा लगने लगा है। मैं अपने ब्लॉग का नाम भी स्पन्दन रख चुकी थी ये जांचे बगैर कि आपके कॉलम का नाम स्पन्दन है।
आज आपका कॉलम “स्पन्दन” मेरा सबसे प्रिय कॉलम बन गया है। रविवार को सबसे पहले पढ़ने वाली रचना स्पन्दन ही होती है। आपका काव्य संग्रह आद्या आया तो मैं आpर्यचकित रह गई। किस तरह आपने अपनी पौत्री के माध्यम से जीवन के रहस्यों को खंगाल डाला।
बंद है कली/कौन जाने/क्या है अन्दर/उसके/ यही जिज्ञासा लिए कली/ के अन्दर छिपे/ अपने गुलाब को ही/ ढूंढ लेता हूं/ मैं भीतर हूं/तुम्हारे और तुम/ मेरे भीतर।

या वो कविता अंश-
जैसे ही आई/ वो/ मेरी गोद में/ लगा जैसे/ हो गया हूं/ आवृत्त पूरा/ उसके आभामण्डल से।
फिर कविता दर कविता राजस्थान पत्रिका के माध्यम से पढ़ती गई। उतरती गई पूरे एक संसार में जो गुलाब कोठारी द्वारा निर्मित है।
आपके हर आलेख, हर कविता के प्रकाशन पर संकल्प लेती कि आपको पत्र अवश्य लिखूंगी। पर लिखने से पहले “कुछ किन्तु ” “कुछ परन्तु” मुझे लिखने न देते। इस बार आपकी आद्या-2 के विमोचन पर फिर मन हर्षित हुआ और सोचा कि इस वर्ष 2011 में तो पत्र लिख ही डालूं। आशा है आद्या-2 की कविताएं और शीघ्र ही पढ़ने को मिलेगी।

इस पत्र के साथ मैंने प्रतीकात्मक रूप से पिछले वर्षो के लेटर पैड पर पुराने विचार संक्षिप्त में लिखे हैं जो यह दर्शाते हैं कि साल-दर-साल मेरे लेटर पैड बदलते गए और मेरे विचार भी। कृपया इन्हें इगAोर करें।
मैं मेरी दो बेटियों के नाम सृष्टि और आस्था है जो आपके विषय रहे हैं और अब बेटा भी स्पन्दन है। आज का दिन मेरे लिए शुभ है कि मैं मन की सब दीवारों को पार करके आपको पत्र लिख पाई हूं और अपने मन के विचार आपको बता पाई हूं। आपके सब विचारों से मेरी सहमति ही नहीं बल्कि गहरी अनुभूति भी है। मन करता है कि आपके सामने बैठ कर आपसे कुछ अनसुलझे सवालों के जवाब पूछूं। आपसे प्रश्A प्रति प्रश्A करूं। हां! पिछले माह जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में लेखक पाठक-संवाद में आप थे। तब भी खबर पढ़ कर मैंने सोचा था कि मैं वहां होती! काश! ऎसा कभी हो।

मैंने अगर भावनावश कुछ अधिक लिख दिया हो तो कृपया मुझे अपनी पुत्री मानकर क्षमा करें। मैं यह भी नहीं जानती कि मुझे पत्र लिखना चाहिए या नहीं। मैं यह भी नहीं जानती कि मुझे आपसे अपने मन के विचार बांटने भी चाहिए या नहीं। फिर भी आपको पत्र लिखा जो क्षणिक भावावेश में कतई नहीं लिखा गया है बल्कि पिछले 6 वर्षो में पल-पल आपकी रचनाओं पर मनन और चिन्तन करते हुए, कल्पना के बाद पत्र को व्यवहारिक रूप में लाकर लिखा गया है।
आप इस पत्र के बदले में मुझे कुछ न दें फिर भी मन के एक कोने में दबी इच्छा यह है कि आप अपने हस्ताक्षर में दो पंक्ति का पत्र लिख देंगे तो वह मेरे जीवन की अमूल्य निधि बन जाएगा।

आपके उत्तर, स्वास्थ्य और उज्वल भविष्य की शुभकामना के साथ-
आशीर्वाद पाने की इच्छा में
आपकी अनुजा
संगीता सेठी
प्रत्युत्तर
स्वात्म स्पन्दित संगीता जी,
सस्नेह प्रणाम!
“आस्था” के “स्पन्दन” ही “सृष्टि” का “संगीत” है। जहां ये सब हैं, वही श्रेष्ठी है। इन्हीं तरंगों के पावन तीर्थ में आज मुझे भी डुबकी लगाने का अवसर दिया, आभार!
स्त्री-पुरूष दोनों ही शब्द देह से जुड़े नहीं है। प्रकृति से जुड़े हैं। देह मां-बाप देते हैं। अत: सम्बन्ध भी देह से जुड़े हैं। जीव (सन्तान) के हम मालिक नहीं होते, माली होते हंै। मौसम हमारे हाथ नहीं होता।

मैं भाग्यशाली हूं कि आपने मेरे विकास के हर सोपान को गौर से देखा, आकलन किया और अपने वात्सल्य से सींचा। आपके शुरू के पत्र बुद्धि के तर्क पर आधारित हैं। बाद के पत्र का धरातल मन भी है, उसमें बुद्धि का अंश भी है, माधुर्य है। मन की यह पारदर्शिता ऋषि तुल्य है। दुर्लभ है। आप जिस कला को छू लेंगी, पारंगत हो जाएंगी।

मेरी दृष्टि में नारी पुरूष से अधिक क्षमतावान है। अज्ञानवश पुरूष की नकल करके क्षमताओं का ह्रास कर रही है। खूब पढ़े, खूब आगे बढ़े, किन्तु स्त्री रहकर। तभी ऊपर उठ सकती है। आगे रह सकती है। उसे तो जीवन के उत्तरार्द्ध काल में पुरूष को भी स्त्रैण बनाना होता है।
अपने भाग्यशाली स्वजनों, परिजनों को प्रणाम कहिएगा। वे तो मन की गहराईयां छूना सीख ही गए होंगे। आपके संस्कारों की गहनता देश की संस्कृति को गौरवान्वित करती रहे। यही ईश्वर से प्रार्थना है।

अच्छा लगा, हाथ से लिखा पत्र पढ़कर। जिसने भी पढ़ा भाव-विभोर था। यही मेरी “आद्या” का स्वरूप भी है। स्वयं को स्त्रैणभाव में रूपान्तरित करने का लघु प्रयास है। सब पाठकों का आशीर्वाद रहेगा, तो निश्चित रूप से सफल होकर सृष्टि के एकमात्र पुरूष तक पहुंच सकूंगा।
पुन: साधुवाद एवं मंगलकामना!

गुलाब कोठारी

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