Gulabkothari's Blog

मार्च 14, 2011

ऎषणा

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

चार सन्तों के साथ लंबे काल तक सम्पर्क में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। चारों के अपने-अपने सम्प्रदाय भी थे। सभी अपने-अपने शिष्यों के लिए श्रद्धा के पात्र थे। विद्वान थे, ऊर्जावान और प्रेरक भी थे। किसी ने भी जीवन से घबराकर दीक्षा नहीं ली थी। सबके धर्म की परिभाषा भिन्न-भिन्न ही थी। एक बात तो सामान्य रूप से सभी में थी कि सभी के बड़े-बड़े आश्रम थे। सभी के व्यक्तिगत प्रचार-प्रसार पर अपार धन खर्च होता था। अधिकांश संत अपने शिष्यों से पैर छुआने या उनके घर जाने, भोजन करने (उनके यहां) के लिए भी धन, दक्षिणा रूप में, अनिवार्य रूप से प्राप्त करते थे। विदेशी शिष्यों से यह राशि विदेशी मुद्रा में होती थी। जैन संत के अतिरिक्त सभी अपनी यात्रा में भी विभिन्न वाहनों का, वायुयान का प्रयोग करते थे। टीवी पर उनके प्रवचन आना भी स्वयं उनके अहंकार को स्फीत करता रहता था। भले ही वे शास्त्रों को पढ़कर सुनाते थे।

उनका स्वयं का ज्ञान बहुत ही अल्प था। उनका धर्म बाहरी विश्व की ओर दौड़ता था। मुक्ति का मार्ग कभी नहीं था। बन्धन, निषेध या अहंकार का पर्याय ही रहा। क्योंकि धर्म के नाम पर उन्होंने सम्प्रदाय को ही ओढ़ रखा था। अत: धर्म मार्ग न रहकर लक्ष्य रूप बन गया। एक धर्माचार्य (दिवंगत) से मैंने यह प्रश्A कर दिया था कि संसार के बन्धन तोड़कर आपने संन्यास लिया और अब (स्वयं को) संन्यास के बन्धनों में जकड़ रखा है। क्या अन्तर है दोनों बन्धनों में? क्या बन्धन भी अच्छा-बुरा हो सकता है? क्या मृत्यु पूर्व आपका सम्प्रदाय छूट जाएगा, धर्म का मार्ग पीछे रह जाएगा? अथवा सब साथ ही जाएगा? उन्होंने तुरन्त अपने सभी सन्तों को एकत्र होने का आदेश दिया और मेरा प्रश्A सभी के समक्ष रखकर कहा कि हमारे सिद्धान्तों एवं दृष्टिकोण में आज से यह बात भी जुड़ जानी चाहिए।

दो सन्त विदेशों में कार्यरत थे। योग के नाम से उनके सन्देश का प्रसार होता था। उनका अभ्यास भी अच्छा था। शिष्यों के मन में श्रद्धा भी खूब देखी। वैसी भारत में नहीं देखी। पर लोकेषणा से वे भी ग्रसित थे। आश्रम रूप में, सम्पत्ति के प्रति उनका मोह भी खूब था। साल भर का कलैण्डर बनाकर विश्व भ्रमण करते थे। धर्म वहां भी मुक्ति का कारक नहीं था।

धर्म के कुछ नियम-कायदे भी ऎसे हैं जो व्यक्ति को बांधने का कार्य करते हैं। जैसे ऋण मुक्ति। मरने से पहले व्यक्ति को तीन ऋणों से मुक्त हो जाना चाहिए-एक-ऋषि ऋण, दो-पितर ऋण और तीन, देव ऋण। तीनों सृष्टि के मूल प्राणों के नाम हैं, जिनसे मेरा शरीर भी बनता है, जीवन भी चलता है। एक भी संत इन प्राणों की व्याख्या करने में समर्थ नहीं नजर आया। उनके उदाहरणों में पुत्र-धन-यश की प्रबल इच्छा (ऎषणा) का ही विवेचन था। धन की इच्छा के रूप भी व्यापक थे। आश्रम तो प्रत्यक्ष स्वरूप था ही और वह भी हर बड़े शहर में एक तो अवश्य ही होना चाहिए। उसी के साथ शिष्यों की संख्या, दक्षिणा, उनके अहंकार के बड़े कारण थे। उनका विनम्रता का भाव भी इस दृष्टि से यथार्थ नहीं था। लोग जो उनकी सेवा में रहते थे, वे उनके क्रोध के साक्षी भी थे। बात-बात में उनके अहंकार को ठेस पहुंचती रहती थी।

प्रचार-प्रसार का उनका कोई साहित्य उठाकर देख ले। उनके किसी आयोजन की भव्यता को देख ले, तो इन्द्र की सभा का दृश्य आंखों के आगे आ जाएगा। उसमें भी ऎसे राजनेता भी हों, जिनके पीछे टीवी वाले भी भागते हैं। उनको टीवी पर पांव छूता दिखाया जाए। चारों ही संत इस बात पर एकमत भी थे कि राजनेता जो कुछ भी आश्वासन देकर जाते हैं, पूरा नहीं करते। अपनी वोट की राजनीति कर जाते हैं। अब तो संत स्वयं अपनी प्रचार सामग्री बांटते देखे जा सकते हैं। लोकेषणा का घुन उनके अन्तर्मन को बींध देता है। वे एक घायल पक्षी की तरह, लोकेषणा की मार से, गांव-गांव भटकते रहते हैं। मन तो तृप्त नहीं हो पाता।
योग और भोग के बीच भटकाव का यही यथार्थ है।

ईश्वर की शक्तियां प्राप्त करने निकाला हुआ व्यक्ति जब स्वयं को ईश्वर के समकक्ष मानने लगे, शक्तियां छीनने का (शक्ति न होने पर उसका प्रदर्शन करे) प्रयास करे, तब ईश्वर क्योंकर उसे नहीं मारेगा। छोटी-सी सिद्धि प्राप्त करके चमत्कार दिखाने में लग जाए, लोगों के भाग्य को बदलने का दुस्साहस करने लगे, मणि-मन्त्र के जाल में फंस जाए, शिष्यों को भी इसी जाल में फंसाने के प्रयास करे, तब वहां धर्म कहां। वहां धर्म के लिए आएगा कौन? सभी तो अपने-अपने कष्टों का इलाज कराने आएंगे। आप उनके लिए सन्त कम, चिकित्सक हो जाएंगे। स्वयं ऎसे संतों के गलों में लाखों रूपए की मणियां लटकती दिखाई देंगी। आज तो रूद्राक्ष भी 20-20 लाख के आते हैं। क्या यह संन्यास रूप है।

शास्त्र कहते हंै कि भगवान भी आसानी से अपनी शक्तियां किसी को क्यों दे देगा। उसके पास अनेक ऎसी शक्तियां रहती हैं जो अपने प्रभाव से व्यक्ति को आकर्षित करती रहती हैं। साधना के अनुरूप ही ये शक्तियां साधक को साधना से दूर खींचती रहती हैं। जैसे ही व्यक्ति उनमें भटकता है, वैसे ही ईश्वर अपनी नाराजगी प्रकट करने के लिए उनको इच्छित से अधिक यश, सम्पदा आदि देता जाता है। साधक ईश्वर से दूर होकर प्रतिबिम्ब पर आश्रित हो जाता है, जो ऎषणाओं के पार नहीं जा सकता। व्यक्ति स्वयं को मुक्त करने के बजाए बांधने में ही प्रसन्नता का अनुभव करता है। सुख को ही आनन्द मानता है।

चार में से किसी संत का ध्यान धर्म के मूल स्वरूप पर नहीं था। सम्प्रदाय के नाम पर निजता का विस्तार जान पड़ रहा था। एक साधारण गृहस्थ को भी अपना अर्जन बांटना पड़ता है। यहां समष्टि भाव के उद्घोष के बाद भी संत के व्यष्टि भाव का प्रभाव देख सकते हैं। तब लगने लगता है कि जन के सहारे निज की तुष्टि का यह उपक्रम भी हमारे संविधान की तरह धर्म निरपेक्ष होकर चल रहा है। इसमें तप, साधना, रूपान्तरण आदि शब्द समय की गति के साथ पीछे छूट गए हैं। क्या संन्यास आश्रम के इस ऎषणा रूप का पोषण समाज हित में है!

गुलाब कोठारी

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