Gulabkothari's Blog

मार्च 15, 2011

क्रोध

Filed under: Manas-1 — gulabkothari @ 7:00

किसी भी व्यक्ति के स्वभाव का एक प्राकृतिक भाव है- क्रोध। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि क्रोध की भी अपनी अहम् भूमिका रही है। अनेक अवसरों पर क्रोध ने इतिहास को नए मोड़ दिए हैं। क्रोध को शारीरिक शक्ति और अहंकार का सूचक भी माना गया है। भय पैदा करने में भी क्रोध की अपनी भूमिका रही है। क्रोध ने बडे-बड़े ऋषियों को शाप देने जैसी नकारात्मक भूमिका में डाला है। दुर्वासा और लक्ष्मण के व्यक्तित्व क्रोध के ही पर्याय भी बने।

कौन व्यक्ति होगा इस पृथ्वी पर जिसे क्रोध नहीं आता? क्रोध अनेक प्रकार के आवेशों और आवेगों का निमित्त बनता है। अपराधों का मूल निमित्त क्रोध को ही माना जाता है। यही कारण है कि क्रोध अपनी अतुल शक्ति के उपरान्त भी अवांछनीय माना जाता है। क्रोध को उपशान्त करने के बारे में लगभग सभी धर्म-ग्रंथ एकमत हैं। हर व्यक्ति अपने क्रोध को दबाना चाहता है। शांत और निर्मल प्रकृति का दिखाई देना चाहता है। क्रोध को जीवन में किसी भी प्रकार का सम्मान प्राप्त नहीं है।

हमारा जीवन प्राण और ऊर्जा के सहारे चलता है। मन, बुद्धि, शरीर आदि सभी का संचालन प्राण और ऊर्जाओं से होता है। हम पार्थिव प्राणी हैं, अत: हमारा मूल शक्ति-स्त्रोत पृथ्वी है। हम गुरूत्वाकर्षण द्वारा पृथ्वी-केन्द्र से आबद्ध होते हैं। यहीं से हमारी मूल ऊर्जा आती है। ऋषि, पितृ और देव-प्राण हमें अंतरिक्ष से प्राप्त होते हैं।

व्यक्तित्व के अनुसार ऊर्जा शक्तियों की अभिव्यक्ति होती है। क्रोध भी एक अभिव्यक्ति है। मूलाधार चूंकि शारीरिक शक्तियों की भौतिक अभिव्यक्ति का स्थान है, अत: यहां एकत्र ऊजाएं क्रोध, कामना, इन्द्रिय सुख, कला, कृतित्व, शक्ति, वैभव आदि विषयों से जुड़ी होती हैं। एक भाव को रोकने का प्रयास करें तो दूसरी अभिव्यक्ति होने लगेगी। क्रोध भी इसी प्रकार स्वयं में कुछ नहीं है। एक अभिव्यक्ति मात्र है, जिसकी नकारात्मक भूमिका होने के कारण उसको उत्तम नहीं कहा जाता।

आप क्रोध आने पर क्या करेंगे, इसका आकलन करें। क्या-क्या करेंगे, यह क्रम देखें तो इसकी परिणति का अनुमान भी होगा। भाव-परिवर्तन के साथ आप क्रोध के आवेग की दिशा बदल सकते हैं। आपने भी अनेक बार अनुभव किया होगा कि कुछ विचार करने के बाद जब क्रोध शान्त होता प्रतीत होता है तो अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति की अभिलाषा तुरन्त मन में उठने लगती है। यह अभिव्यक्ति भी जीवन-शक्ति की तरह दिखाई देती है, जो उतनी ही गहन होती है जितना कि क्रोध, अर्थात- क्रोध भी एक जीवन-शक्ति है, ऊर्जा से ओत-प्रोत है। मात्र इसको दिशा देने की जरूरत है।

क्रोध आने का अर्थ यह भी है कि मूलाधार में ऊर्जा गतिमान है। जीवन के भौतिक सुखों की अभिलाषाएं इसी कारण उठती हैं। यदि इस ऊर्जा का पूरा उपयोग नहीं किया जाए तो क्या होगा? ऊर्जा घटकर वहीं समाप्त हो जाएगी। “करो या मरो” वाली बात है। आप या तो ऊर्जा का उपयोग कर लें, अन्यथा यह व्यर्थ जाएगी। उपयोग भी सकारात्मक होना चाहिए, तभी विकास हो सकता है।

जब तक मूलाधार में ऊर्जा क्रियाशील रहती है, तब तक ही व्यक्ति भी कार्य कर सकता है। उसका शरीर स्वस्थ रह सकता है। इस शक्ति का शान्त होना ही मृत्यु है। सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो क्रोध जीवनसूचक है। मूलाधार को गतिमान रखता है। मूलाधार के अनेक अवरोध क्रोध के कारण हटते भी हैं। मात्र भावनात्मक धरातल पर कार्यरत होने की जरूरत है।

इसके विपरीत होता यह है कि क्रोध को सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाता है। व्यक्ति इसे दबाने का प्रयास करता है। इसके परिणाम अधिक भयावह होते हैं। इसका पहला प्रभाव है- जीवन शक्ति को विकसित होने से रोकना। इसकी अभिव्यक्ति तथा अभिव्यक्ति के परिवर्तन को रोकना। न आप क्रोध दिखा पा रहे हैं, न ही इसका अन्य क्षेत्रों में उपयोग कर पा रहे हैं। यानी- इसकी नकारात्मक दिशा को बढ़ावा दे रहे हैं।

जीवन-शक्ति को मूलाधार से ऊपर की ओर ऊज्र्वस्वित करना इसकी सकारात्मक दिशा है। यह शक्ति भावनात्मक धरातल से जुड़ते ही अपना स्वरूप बदल देती है। मूलाधार के ऊपर स्वाधिष्ठान इसका स्थान है। क्रोध को दबाने से इसकी ऊर्जा की गति अधोगामी हो जाती है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव शरीर के निचले अंगों पर दिखाई देने लगता है। अत्यन्त क्रोध की अवस्था में सारा शरीर कम्पित होने लगता है। जोड़ों का दर्द इसकी प्रथम सूचना देता है, जो आगे चलकर गठिया में परिवर्तित हो जाता है और एक असाध्य रोग का रूप ग्रहण कर लेता है। जैसे-जैसे मूलाधार की शक्ति क्षीण होगी, गठिया बढ़ता जाएगा। ऊर्जा की कमी से बढ़ते इस रोग का इलाज नहीं हो सकता। शरीर अपना प्रयास भी करता है, किंतु आरोग्य प्राप्त नहीं होता। सूजन आने का अर्थ भी यही है कि शरीर अपनी ऊर्जाओं को वहां पहुंचा तो रहा है, किन्तु पर्याप्त मात्रा में नहीं। ऊर्जा का सही स्थान तो मूलाधार ही है।

आप फिर से मूलाधार की ऊर्जाओं पर ध्यान करके देखें। उन्हें गतिमान करें, उध्र्वगामी करें। क्रोध आएगा, आने दें। शुभ लक्षण होगा। दर्द कम होने लग जाएगा। आपने देखा होगा कि लम्बे काल तक तीर्थयात्रा में रहने वाले कई असाध्य रोगों से मुक्त हो जाते हैं। अमरीका के डॉ. ब्रूयन ने तो इस क्षेत्र में अनेक प्रयोग किए हैं। उनके अनुसार “क्रोध से रोग, रोग से भय, भय से नए रोग, एक ऎसा क्रम बनता है कि पीछा नहीं छुड़ा सकते। जैसे ही आप शान्त वातावरण में बैठें, आपने अभय का अनुचिन्तन किया अथवा भय तथा क्रोध पैदा करने वाले सभी निमित्त दूर हुए कि आपको आरोग्य लाभ होने लग गया। सोचें, आप क्रोध को कहां उगलेंगे?”

गुलाब कोठारी

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