Gulabkothari's Blog

मार्च 21, 2011

बुरा न मानो

होली इस देश के चार प्रमुख सांस्कृतिक त्योहारों में से एक है। शत्रुता, द्वेष एवं मन की मलिनता मिटाने के लिए भी होली का सहारा लिया जाता है। कहने को भले ही आज इस त्योहार का स्वरूप बिगड़ गया, किन्तु रंग खेलने और मनों को नए सिरे से प्रेम के रंग में रंगने के लिए आज भी होली की भूमिका है। यह प्रेम रंग तभी चढ़ सकता है जब पुराना मैल उतरे।

आज हमारे देश में भ्रष्टाचार का मैल हर जाति-धर्म और समाजों में चढ़ता ही जा रहा है। जन-जन त्रस्त है। केवल भ्रष्ट लोग मस्त हैं। कोई नई बात भी नहीं है। हर युग में ऎसा होता रहा है। देव और असुर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दिन में गर्मी पाकर आकाश के कण देव रूप (अग्नि प्रधान) हो जाते हैं। रात्रि के समय वे ही कण उष्णता के अभाव में सोम प्रधान (अंधकार युक्त ) हो जाते हैं। किसी के चेहरे से पढ़ा नहीं जा सकता कि कौन किस गर्मी में देव रहेगा और किसकी कमी से असुर हो जाएगा।

बचपन में हम गांवों में देखा करते थे कि लोग होली दहन के बाद हर एक घर के बाहर जाकर व्यक्तिगत सम्बोधन से आवाजें लगाते थे कि व्यक्ति ने क्या बुरा किया। समाज में उसके आचरण से क्या छवि बनी। ये व्यक्तिके लिए सुधार की चेतावनी भी थी और अवसर भी। नकारात्मक भूमिका की सार्वजनिक अभिव्यक्तिभी थी। कोई इसका बुरा नहीं मानता था। न ही इस मुद्दे पर कभी चर्चा ही होती थी। यह सम्मान सूचक भी था।

तो आइए! इस होली से पुरानी परम्परा को पुनर्जीवित किया जाए। सफाई घर से ही शुरू हो। मित्र-रिश्तेदारों से बात की जाए। उनके गुण-दोषों पर चर्चा हो। मोहल्ले में रहने वाले भ्रष्ट लोगों से मिलकर बात की जाए। अपराधियों से बात करें, कि आपके मन में उनकी क्या छवि है। उनको अपनी छवि सुधारने का एक अवसर दें। स्वीकार करते हैं तो बहुत ही अच्छा है। नहीं तो प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। सुधरने का आश्वासन दें तो अति सुन्दर। नहीं तो फैसला द्वार पर चिपका कर लौट जाएं। उनके किसी स्वजन को भी दे सकते हैं। किन्तु उचित होगा चस्पा करना। इस सूचना में सजा की शर्त भी होनी चाहिए। कुछ लोग हो सकता है घर से गायब रहें। उन सबका सार्वजनिक बहिष्कार घोषित कर सकते हैं। या तो सुधर जाओ, या फिर चले जाओ। हमें आपके वर्तमान स्वरूप की आवश्यकता नहीं है। यदि व्यक्ति में जरा भी सकारात्मक भाव है, अच्छा बनने का सपना है, तो वह तुरन्त इस अवसर का लाभ उठाना चाहेगा। वह बाहर आएगा, स्वीकार करेगा और मार्ग बदलेगा। उसके बाद उसके बच्चों को भी तो उसी समाज में रहना है। अपने कृत्यों से कोई बच्चों को अपमानित नहीं होने देगा। महिला तो यह भूल हर्गिज नहीं कर सकती। यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार में बच्चे भी साथ जुड़ें हों। बहिष्कार से बड़ी कोई सजा नहीं। न तो उनको बुलाना, न उनके यहां जाना।

हां, बड़े सरकारी अफसरों के मामले में झिझक हो सकती है। डरने की बात नहीं है। उन तक तो सूचना पहुंचा देना ही काफी है। जो अन्य प्रदेशों के हैं वे शुरू में परवाह नहीं करेंगे। धीरे-धीरे घाव गहरे होते जाएंगे। रहना तो उनको भी इसी प्रदेश में है। नेताओं की अकड़ तो वैसे भी पांच साल से ज्यादा नहीं चल पाती। सुना दो संकल्प कि अगले चुनाव में निवृत्त कर देंगे।

सब कुछ सम्मानजनक ढंग से किया जाना चाहिए। राजनीति अंश मात्र भी न हो। शुद्ध मानवीय धरातल, लोकहित का भाव और ईश कृपा का सहारा। विश्वास है सब कुछ ठीक ही होगा।
गुलाब कोठारी

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