Gulabkothari's Blog

अप्रैल 10, 2011

प्रहरी को जगाओ!

देश के संविधान में लोकतंत्र को तीन पाये मिले: विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका। इनके साथ एक जागरूक प्रहरी और जुड़ गया- मीडिया। उसने स्वयं को चौथा पाया घोषित कर दिया।

आजादी की जंग में मीडिया और पत्रकारों की भूमिका की प्रशंसा आज तक हो रही है। मीडिया की अवधारणा भारतीय नहीं है। यहां न मीडिया कभी संस्कृति का वाहक रहा, न ही विकास का। हमारे लोकगीत, लोकनृत्य और नाटय, छोटी-छोटी इकाइयों में, संस्कृति का संदेश दिया करते थे। आज भरतनाटयम, कथकली, यक्षगानम् आदि इन्हीं के अवशेष हैं।

हमारी जीवनशैली में पत्रकारकर्म कभी था ही नहीं। आज सूचना तंत्र के जाल ने एक नई जीवनशैली विकसित कर दी। मीडिया के बिना इस शैली की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
मीडिया अचानक उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण और भौतिकवाद की पकड़ में आ गया। ग्लैमर की चकाचौंध और सत्ता भोगने की महत्वाकांक्षाओं ने मीडिया की विश्वसनीयता विश्वभर में कम कर दी। सूचना और लोक शिक्षण की परिभाषाएं बदल गई।

मनोरंजन हावी होने लगा। बाजार की स्पर्द्धा में मीडिया का महत्व सामने आया। चुनावों को भी व्यापारिक स्पर्द्धा का रूप मीडिया ने ही दिया। और इसका दामन दागदार भी हुआ। मीडिया को आज जनता का नहीं, सत्ता का प्रतिनिधि माना जाने लगा है। मीडिया के सहयोग के बिना कोई नेता बन ही नहीं सकता। मीडिया क्या परोस रहा है, उस पर कोई गम्भीर नहीं है।

सत्ताधीश आपस में बांटकर अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। इतनी बड़ी स्वार्थपूर्ति के चलते मीडिया भी भ्रष्टाचार के प्रति मौन हो गया है। यही एकमात्र कारण है देश में बढ़ते भ्रष्टाचार का। हाल ही में हमने देख लिया कि किस प्रकार राडिया प्रकरण में अपने स्वार्थ के लिए नामी-गिरामी पत्रकार भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे दिखाई दिए।

आज हम कैरियर प्रधान किन्तु संवेदनाशून्य शिक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। मीडिया भी इसी का एक अंग है। मां-बाप, अध्यापक, धर्म गुरू आदि बच्चों को नित्य मानवता का पाठ नहीं पढ़ाते। एक मीडिया है जिसकी पहुंच घर-घर है। रेडियो, टीवी, इन्टरनेट बहुत गतिशील भी हैं और लोकप्रिय भी। अन्ना हजारे के अनशन का माहौल फेस-बुक तथा मोबाइल ने ही बनाया।

एक प्रमाण तो सामने आया कि मीडिया चाहे तो क्या नहीं कर सकता। प्रश्न यह है कि जब देश में भ्रष्टाचार को लेकर सब जगह त्राहि-त्राहि मची है, भूखे और बीमार भारतवासी सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं, तब मीडिया मौन क्यों? क्या व्यापार इतना बड़ा लक्ष्य है? क्या भ्रष्टाचारियों की कमाई में हाथ बंटाना गौरवान्वित करता है? क्या देश हित के विरूद्ध कार्य करने वालों, देश हित को बेचने वालों और भूमिगत माफिया का साथ देना लोकतंत्र के पैंदे में छेद करना नहीं है? जनता के चुने हुए प्रतिनिधि का विभिन्न घोटालों में साथ देना, उसके अपराधों को आश्रय देना और बचाना इसे लोकतंत्र का प्रहरी बना सकता है? यह तो स्वयं देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना हो गया। और हुआ केवल इसलिए कि देश का युवा सो रहा था। मीडिया भी नेताओं, अधिकारियों के साथ मिलकर जनता से विमुख हो गया। अब जनता तक विकास नहीं, केवल कर्ज पहुंचता है।

अन्ना हजारे ने प्रमाणित कर दिया है कि “भय बिन होए न प्रीत”। उनके इस अभियान ने युवा वर्ग की नींद उड़ा दी। सारे भेद भूलकर वे देश के लिए उठ खड़े हुए। इसका स्थायी लाभ तब मिलेगा, जब सम्पूर्ण मीडिया, पूरी शक्ति के साथ जनता की भाषा बोलेगा। मीडिया के धरातल से जनता के दर्द की चीखें सत्ताधीशों के कान तक पहुंचेगी। जब चुने हुए प्रतिनिधि अपना धर्म स्वयं निभाने लगेंगे।

मीडिया उनका पीछा करेगा। उनसे अपने स्वार्थ के लिए हाथ नहीं मिलाएगा। क्या नहीं हो सकता एक ही साल में? और क्यों नहीं होना चाहिए? मीडिया होकर यदि अपनी भूमिका नहीं निभाए तो इसका भी वैसा ही बहिष्कार क्यों नहीं हो, जैसा किसी जनप्रतिनिधि का? जब खोटा व्यक्ति मेरे घर में नहीं घुस सकता, तब खोटा मीडिया कैसे घुस सकता है? या तो मीडिया रहे ही नहीं, या फिर चौथा पाया ही बनकर रहे। जनता का विश्वासपात्र बनकर रहे। नहीं तो राजनेता की तरह घर बैठे।

ऎसे मीडिया को सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं पर भी रोक लगनी चाहिए। मीडिया हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। लोकतंत्र बचाने में सहायक केवल मीडिया ही हो सकता है। पर हमारा दिखाई दे, पराए जैसा नहीं। युवा शक्ति को यदि सुनहरा भविष्य चाहिए तो मीडिया को विश्वसनीय बनाने पर सारा जोर लगा देना चाहिए।

न किसी नेता को गाली देने की कोई जरूरत पड़ेगी, न किसी अधिकारी को। ऎसे मीडिया पर कार्रवाई के लिए युवा शक्ति को आगे आना चाहिए। मीडिया के बाहर कहीं कुछ नहीं है। भविष्य तुम्हारा है, मीडिया तुम्हारा है, निर्णय भी तुमको ही करना है। ईश्वर तुम्हारे विवेक और उत्साह को सही दिशा में बनाए रखे।

गुलाब कोठारी

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