Gulabkothari's Blog

अप्रैल 11, 2011

अहिंसक आक्रामकता

सामन्ती शासन और लोकतंत्र में एक अन्तर यह भी है कि कानून लागू कैसे किया जाए? फरियादी की बात यदि बिलकुल नहीं सुनी जाए, जैसे कि हमारी राष्ट्रीय सेवाओं के अघिकारी नहीं सुनते तो यह सामन्तवाद में भी आसुरी प्रवृत्ति मानी जाती है। राजा को सजा देने का अन्तिम अघिकार प्राप्त होता है। चाहे सही, चाहे गलत! लोकतंत्र में सुनवाई के अनेक धरातल होते हैं।

 

आज पूरा देश भ्रष्टाचार को कोस रहा है, क्योंकि जायज मांगों की भी पूर्ति नहीं होती। मानवीय समस्याओं जैसे पीने का पानी, सफाई आदि की शिकायतों को सुनने के लिए भी किसी के पास कान नहीं बचे। मुंह सबके खुले हैं। क्या किसी अघिकारी की वाणी ‘जनता के सेवक’ जैसी है? क्या उसे याद है कि जो व्यक्ति सामने खड़ा है, वही उसकी तनख्वाह के लिए टैक्स भरता है।

 

कभी देखो किसी अफसर को, कैसे दुत्कारता है जनता को। यदि अफसर विशेष श्रेणी का हुआ तो बात शुरू करने से पहले ही दो-चार गालियां मां-बहन की दे चुका होगा। जैसे उसके तो मां-बहन होती ही नहीं। इसीलिए आज तो सरकारी वर्ग में भी धड़े हो गए। ठीक ये की ये दुर्दशा हमारे धर्म-गुरूओं ने कर रखी है। साम्प्रदायिकता तीसरा बड़ा मुद्दा है। आतंकवाद तो है ही। ये सारे विषधर देश को खण्डित कर रहे हैं। हमारी गौरव गाथा कह रहे हैं- विश्व को। इसी तरह के विष्ायों ने मिलकर भ्रष्टाचार को जीवनशैली का अनिवार्य अंग बना दिया।

 

सरकार (विधायिका और कार्यपालिका) तो लगता है जनता को मच्छर-मक्खी से अघिक मानती भी नहीं। राजनेताओं को तो जनता के बीच हर पांच वर्ष में जाकर रिश्वत देते रहना पड़ता है, वोटों के लिए।

 

अफसरों को कोई हिला भी नहीं सकता। इनके बिना मंत्री भी क्या कर सकते हैं। मंत्री अस्थायी, अफसर स्थायी। मंत्री/विधायक/सांसद अपने कार्यकाल में अपनी लागत निकालना चाहता है, अगले चुनाव की व्यवस्था करना चाहता है और कुछ कमाना भी चाहता है। अफसर मदद करता है। अपनी भी सेंकता है। अब न्यायपालिका में भी इस तरह के कई उदाहरण सामने आने लगे। उच्चतम न्यायालय के कई मुख्य न्यायाधीशों के भी नाम मीडिया में आ चुके हैं।

 

जनता को सदा मीडिया पर विश्वास रहा है कि मीडिया ऎसे मुद्दों को जनता के सामने लाता रहेगा। लाता भी रहा है। लेकिन मीडिया का ही एक हिस्सा व्यापारिक भी हो गया। अब लोकतंत्र के चारों पाये मिलकर ‘महातंत्र’ का रूप ले चुके। अब आम आदमी के पास जाने को कोई जगह नहीं बची। इसके अनेक दुष्प्रभाव देश के सामने आ चुके। सबसे पहला तो प्रभाव ‘वंशवाद’ की स्थापना करके लोकतंत्र का अपमान करना। इसी का दूसरा रूप बना अपराघियों का सांसद-विधायक के रूप में चुनाव होना, उनको मंत्री तक बना देना।

 

जितना काला धन अर्जित हुआ उसे सही हाथों में, सुरक्षित कैसे रखा जाए। इस समस्या ने नेताओं तथा बड़े अफसरों को माफिया श्रेणी के लोगों से जोड़ दिया। अपराघियों को टिकट के साथ लाइसेंस एवं ठेके भी मिल गए। सुपारियां तो इनको पहले भी मिलती थीं। इनका अघिकांश धन मादक द्रव्यों, हथियारों तथा शराब की तस्करी आदि में ही लगता है। वो भी पुलिस की देख-रेख में।

 

यह सब कल तक होता रहा होगा। हम सारे नागरिक आज से ही प्रण कर लें कि जागरूक रहकर संघर्ष करेंगे। अपने भविष्य को इन झूठे, आपराघिक प्रवृत्ति के जन प्रतिनिघियों के भरोसे नहीं छोड़ेंगे। अब वोट देकर पाच साल चुप नहीं बैठेंगे। हमारी इस भलमनसाहत का नेताओं/अफसरों ने खुलकर दुरूपयोग किया है। जिसको भी आप खुली छूट दोगे, वह ऎसा ही करेगा। चाहे आपका बेटा ही क्यों न हो। मानव स्वभाव से स्वेच्छाचारी है। उसे मर्यादा में रखने के लिए अंकुश चाहिए। यह अंकुश आगे से हमें लगाना है।

 

जनता आज लोकतंत्र के चारों पायों के घेरे में फंसी है। अत: कोई योजना हम तक नहीं पहुंचती। हम चारों पायों के आधार हैं तो हमें अपना वह रूप दिखाना भी होगा। हम न तो कानून बनाएंगे, न ही कानून हाथ में लेंगे। लेकिन जब भी किसी पाये से जुड़े व्यक्ति का व्यवहार लोकहित अथवा कानून के विरूद्ध देखेंगे, उसे दिया अपना आधार-सहारा खींच लेंगे। उसका सार्वजनिक बहिष्कार घोषित कर देंगे।

 

ऎसे नेता, अफसर और मीडिया की पहचान करना मुश्किल काम नहीं है। ऎसे नेता-अफसर जिनका भ्रष्टाचार के मामलों में नाम आ जाए, जो समाज सुधार के बजाय जातिवाद को बढ़ाने वाले कार्यक्रमों में जाएं, जो स्वयं आपराघिक छवि के हों, जिन पर मुकदमें चल रहे हों और जो अपराघियों के कार्यक्रमों में जाएं। जो चारित्रिक रूप से गिरे हुए हों। ऎसे अघिकारी जो सरकारी निर्णयों में जातिवाद, भाई-भतीजावाद के आधार पर पक्षपात करें और राजनेताओं के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा दिखाएं। इसी तरह जो मीडिया भ्रष्ट और अपराधी तत्वों के साथ जुड़कर धन कमाने में लग जाए, स्वयं माफिया की तरह व्यवहार करे। जनहित की परवाह ही नहीं करे।

 

हम न ऎसे मीडिया को घर में घुसने देंगे न ऎसे राजनेता-अफसर को अपने कार्यक्रमों में बुलाएंगे, न उसके यहां जाएंगे। जनप्रतिनिघि हुआ तो अगले चुनाव का फैसला भी साथ ही हो जाएगा। धर्म, जाति, स्त्री, पुरूष जैसे मुद्दे बीच में कभी नहीं आएंगे। हमारी यह एकता ही एक-एक करके सबका नशा उतारेगी। सबको उत्तरदायित्व का बोध भी कराएगी। समाज से भी जोड़ेगी। फिर नेता भी योजना पूरी कराएंगे, मंत्री भी क्षेत्रों पर ध्यान देंगे, अघिकारी भी प्रतिनिघि को वस्तुस्थिति से एक बार तो परिचय कराएगा ही और भ्रष्ट मीडिया भी या तो सुधर जाएगा नहीं तो निबट जाएगा।

 

लोकतंत्र में लोक और तंत्र दोनों ही व्यवस्थित बने रहें, इसके लिए आवश्यक  है कि दोनों की भागीदारी सामंजस्यपूर्ण हो। लोक ब्रह्म होता है और तंत्र माया। माया के जाल पर जब तक लोक का अंकुश है तब तक लोकतंत्र अक्षुण्य है। आज चूंकि तंत्र की ही माया काम कर रही है। इस माया को जड़ता के स्थान पर जाग्रत चेतना से ही सही दिशा, सही देश और सही काल के परिप्रेक्ष्य में संयमित रख सकते हैं। वर्ना तो सब चौपट ही समझो। हमारे किये का फल हमें तथा हमारी सन्तानों को ही भोगना है।

गुलाब कोठारी

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