Gulabkothari's Blog

अप्रैल 17, 2011

संघ का वेंटीलेटर

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00
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लोकतंत्र संकट काल से गुजर रहा है। आचरण का अनाचार देश हित पर हावी हो रहा है। व्यक्तिगत स्वार्थ का जंग भी लोकतंत्र की हर कड़ी पर लग चुका है। आरक्षण और वंशवाद की अमरबेल फल-फूल रही है। राजनीति सुधारवादी होने के स्थान पर प्रतिक्रियावादी होती जा रही है। देशभर में इसका व्यापारिक स्वरूप फैलता जा रहा है। क्या पहुंचेगा नई पीढ़ी तक?

आज भी देश में कांग्रेस शक्तिशाली राजनीतिक दल है तथा भाजपा अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में। सही बात तो यह है कि चुनाव भाजपा के नाम पर लड़ा जाता है और राजनीति संघ करता है। संघ यह कहकर चुनाव नहीं लड़ता कि वह एक गैर राजनीतिक संगठन है। उसका यह अहंकार कि भाजपा को वोट संघ ही दिलाता है, भाजपा के हाथ से सत्ता छीन कर हर जगह काबिज होने का प्रयास कर रहा है। संघ की छवि और भाजपा दोनों संकट में हैं।

अटल जी जब प्रधानमंत्री थे, तब संघ के साथ सेतु रूप आडवाणी को उपप्रधानमंत्री का दर्जा दिया गया था। संघ इस देश का सर्वाधिक व्यापक और अनुशासित संगठन है। इसका विकल्प भी देश में नहीं है। इसकी कमजोरी यह है कि यह उदारवादी नहीं हो सकता। अटल जी उदारवादी थे। दोनों में मतभेद न रहें, यह कार्य नीति निर्घारण के साथ ही संघ के साथ संवाद से तय हो जाए।

हुआ ठीक उल्टा। उप प्रधानमंत्री के अपने नए कार्यकाल में आडवाणी जी ने संघ के साथ संवाद ही नहीं रखा। आलोचना भी कर बैठे। उसी काल में सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने अपने शब्द बाणों से भाजपा की जड़ें काटने में प्रभावी भूमिका निभाई। तीन-चार बार तो मेरी अटल जी से सीधी बात हुई इन नामों को लेकर। उनका कटाक्ष “हमारा दुर्भाग्य है” यह सब कुछ कह देता है। इसी काल में भाजपा का भ्रष्टाचार भी चरम पर पहुंच गया था। बड़े-बड़े नेता भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ गए थे। यह भाजपा के पतन की शुरूआत थी, जिसे “इण्डिया शाइनिंग” भी नहीं रोक पाया। अटल जी ने घुटने टेक दिए। भाजपा को चुनावी हार पच नहीं पाई।

बौखलाहट में कई बयान जारी हुए थे। उसी का एक परिणाम था कि कांग्रेस ने भाजपा के काम निकाल कर अन्दर-अन्दर हाथ मिला लिया। आज कांग्रेस निश्चिंत है कि भाजपा उसे कभी सत्ताच्युत नहीं करेगी। स्वयं सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, अरूण जेटली जैसे दिग्गज अपनी-अपनी कुर्सियों को हाथ में लिए दौड़ रहे थे, देश उन पर हंस रहा था। इनका कोई आधार नहीं रहा देश में।

प्रश्न यह है कि भाजपा कमजोर हो रही है? किनकी वजह से हो रही है फिर उन्हें हटाने का फैसला कौन करेगा? उल्टे आप उन्हें प्रमोशन दे रहे हो। आखिर संघ के सामने ऎसी क्या मजबूरी है कि वो उसे गाली देने वालों को सहन कर रहा है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हों या सुषमा स्वराज अथवा फिर अरूण जेटली उन्हें अपनी मनमर्जी से पद और अधिकार लेने की छूट कैसे दे रहा है? भाजपा सही अर्थो में नेतृत्वविहीन हो गई है। वरना शीर्ष स्तर पर यह तमाशा नहीं होता।

शायद यही कारण था कि संघ ने भाजपा की सत्ता को गडकरी के माध्यम से सीधा हाथ में लेना उचित समझा। अब तो हर प्रदेश और हर संगठन के शीर्ष पर संघ ही है। यही भाजपा के दम घुटने का संकेत है। उम्र तो समय के हाथ है। संघ का वेंटीलेटर अब इसमें पुन: प्राण नहीं फूंक पाएगा। अगले चुनाव में भाजपा का क्या स्वरूप होगा, भाजपा संघ के नियुक्त अध्यक्षों और संगठन महामंत्रियों के चंगुल से कितना बच पाएगी, उसी पर भाजपा की भावी जीवन यात्रा निर्भर करेगी। संभावना कम ही है। संघ जहां भी नाराज होकर बैठ जाता है, भाजपा हारती ही है।

भाजपा को जितवा कर कीमत मांग कर टांग खींचना इज्ात बिगड़वाता है। यह बातें चुनाव पूर्व में तय भी हो सकती हैं। अब देर हो गई। भाजपा नेतृत्व शून्य है। संघ के सहारे टिकी हुई है। या तो संघ अपना “गैर राजनीतिक दल” का मुखौटा उतारकर राजनीति में उतरे या पूरी तरह बाहर रहकर अपने मूल उद्देश्यों पर टिका रहे। आज तो भाजपा का बेजान शरीर दिख रहा है। संघ शक्तियों का केन्द्रीकरण कर रहा है। अब तो “मराठा” पदाधिकारियों की नई खेप भी चर्चा का विषय बन चुकी है। देश को संघ की भी जरूरत है और भाजपा की भी।

आज दोनों की स्थिति देश को स्वीकार्य भी नहीं है। लाखों कार्यकर्ताओं के अनुशासित संगठन को यदि मुटी भर स्वार्थी तत्व नियंत्रण में करना चाहें, अपने स्वार्थ के आगे देश की बदनामी की चिन्ता न करें, भाजपा को जीवनदान मिलने की संभावना क्षीण जान पड़े तो कार्यकर्ता के मनोबल का क्या होगा। भाजपा नहीं रही तो लोकतंत्र में विपक्ष का नया चेहरा कैसा होगा? क्या विपक्ष के बिना कांग्रेस सामन्तवाद के रूप में देश को स्वीकार्य होगा? प्रश्न आज मूलत: संघ के पाले में ही है।

क्या वह भाजपा के पेड़ को फिर से हरा-भरा होने में मदद करेगा अथवा अमरबेल बनकर सदा के लिए धराशायी करना चाहेगा? संघ में अपनी संस्थाओं के प्रति मातृत्व का भाव रहना चाहिए, न कि संहारक का। संघ के कार्यकर्ताओं में भी साहस होना चाहिए कि जैसे वे बाहरी आलोचकों के प्रति आक्रामक होते हैं, वैसे ही अपने शीर्ष पुरूषों के विरूद्ध क्यों नहीं हों। यदि उनके आचरण से संघ जैसी विशाल संस्था का मान भंग होता हो। भ्रष्टाचार के विरूद्ध अभियान को भी नाटक ही मानेंगे, यदि घर से शुरू नहीं हुआ तो। पहले घर के बड़े भ्रष्टों का बहिष्कार करे संघ!

गुलाब कोठारी

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