Gulabkothari's Blog

अप्रैल 23, 2011

रिश्वत जिन्दाबाद!

हर युग के साथ जीवन के नियम बदलते हैं। इसी परिवर्तन का नाम युग है। प्रकृति हर युग में एक ही सिद्धान्त पर कार्य करती है। युग परिवर्तन का अर्थ भौतिक परिवर्तन, मूल्यों में परिवर्तन, लक्ष्य, गति और दिशा में बदलाव। आज तो जीवन पूर्णतया अर्थशास्त्र पर टिका हुआ है। अर्थ दृष्टि के आगे कोई दृष्टि जाती ही नहीं है। अर्थ की तीन दशाएं होती हैं: दान, भोग और नाश। भोग प्रधान जीवन और अर्थ का अनर्थ ही कलियुग की भाषा है।

हमारे वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक बहस के लिए एक मुद्दा छेड़ा है। विभाग के मुख्य सलाहकार कौशिक बसु ने सुझाव दिया है कि रिश्वत लेने और देने के प्रति भेद दृष्टि रहनी चाहिए। कानून में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि जायज कार्य करवाने के लिए भी यदि दबाव में रिश्वत दी जाती है तो उसे लाचारी मानते हुए रिश्वत देने वाले को दोषमुक्त मान लेना चाहिए तथा रिश्वत लेने वाले की सजा दोगुनी कर देनी चाहिए। बसु का मत है कि इससे रिश्वत देने वाला आश्वस्त होगा कि यदि रिश्वत लेने वाले को पकड़वा दिया, तो उसकी राशि उसे वापस मिल जाएगी। रिश्वत के प्रकरणों में तेजी से गिरावट आएगी।

पिछले सालों में, देश में जितने भी कानून बने, संशोधित हुए, उनका इतिहास देख लें। कानूनी किताबें जनता की समझ में नहीं आती। लागू करने वाले लोग वही होते हैं। किसी कानून ने सामाजिक दशा में अपेक्षित सुधार किया हो तो बता दें। फाइलों में तो कुछ भी हो सकता है। बाल श्रम कानून हो, महिला बाल विकास, महिला सशक्तिकरण हो, परिवार नियोजन आदि किसी भी कानून को देख लें।

सब जगह विपरीत परिणाम दिखाई देंगे। हां, राजनेताओं और अधिकारियों की समृद्धि से जुड़े कानून अक्षरश: लागू होते हैं। बाकी जनता के सारे अधिकार रिश्वत की भेंट चढ़ जाते हैं। रिश्वत के उदाहरण स्वरूप हाल ही में जोधपुर के अरावली इंस्टीटयूट की जमीन का मुद्दा सामने आया। जिसके भू-परिवर्तन के आदेश प्राप्त करने के लिए वरूण आर्य को सपत्नीक दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर भूख हड़ताल के लिए बैठना पड़ा। कुल 145 घण्टों की भूख हड़ताल के बाद 18 अपे्रल को भू-परिवर्तनों के आश्वासन का पत्र प्राप्त हुआ।

अक्टूबर 2009 में आवश्यक कार्यवाहियां पूरी करने के बाद भी आदेश इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि जनप्रतिनिधि पांच लाख रूपए मांग रहा था। सरकार गूंगी हो गई। उच्च न्यायालय में फरवरी में याचिका लगाई, जिसकी अभी तारीखें पड़ रही हैं। जायज कार्य के लिए रिश्वत का इतना दबाव कि व्यक्ति भूख हड़ताल करके मरना पसन्द करे। इससे बड़ी बेशर्मी किसी भी सरकारी तंत्र की क्या हो सकती है कि रोजमर्रा के काम के लिए यह रास्ता अख्तियार करना पड़े। यह सामन्ती व्यवस्था से भी बुरा हाल है। दरिन्दों की गिद्ध दृष्टि में लोगों का मर जाना भी तो आज जायज हो गया है।

देश भर में आत्महत्याएं हो रही हैं और बसुजी कह रहे हैं कि मजबूरी में दी गई रिश्वत कानून सम्मत कर दी जाए। उनको मालूम है क्या कि बिना मजबूरी रिश्वत नहीं दी जाती? आज तो लोग रिश्वत में भी इज्जत मांगने लगे हैं। लेने वाला क्या लौटाएगा। हमने ऎसे भी कई उदाहरण देखे हैं। रिश्वत में धन भी काला ही काम आता है। जो प्रमाणित करना चाहेगा, उसके लिए सजा मिलने या न मिलने का भेद नहीं होता।

न वह किसी कानून का मोहताज होता है। प्रश्न तो यह है कि क्या ऎसे कानूनों से हम भ्रष्टाचार को प्रतिष्ठित नहीं करेंगे। अभी राडिया काण्ड में रिश्वत का जो खुलासा हुआ उसमें अम्बानी, टाटा, जैसे नाम करोड़ों क्या अरबों के लेन-देन में पकड़े गए। क्या ये लोग कभी रिश्वत लेने वालों की शिकायतें करेंगे? क्या हमारे प्रधानमंत्री या कोई भी विधान इन लेने-देने वालों को जेल में भेज पाएगा? कानून तो आज भी है। क्या विभिन्न दलों के नेता/मंत्री भ्रष्टाचार के कारण जेल जाते हैं? बल्कि इनको तो मुख्यमंत्री गोदी में खिलाते हैं। कमाऊ पूत की तरह।

इस कानून के प्रस्तावित बदलाव से बड़े स्तर का भ्रष्टाचार तेज गति से बढ़ेगा। मध्यम वर्ग तो हर हाल में मार खाने के लिए ही भारत में पैदा हुआ है। उसके जीवन की मोमबत्ती दोनों सिरों से जलती है। कानून का डर उच्च वर्ग को है ही नहीं और निम्न वर्ग का क्या चला जाएगा। जब रिश्वत देने वाला भय मुक्त हो जाएगा तो काम करने का मार्ग सुलभ हो जाएगा। उसे क्या पड़ी है शिकायत करने की। खेद की बात तो यह है कि सारे रिश्वत के प्रकरण इस बात का प्रमाण हैं कि उचित कार्य के लिए भी रिश्वत लेने वाला संवेदनहीन है।

उसे न तो देश से कोई लगाव है, न ही किसी व्यक्ति से। तब क्या अर्थ रह जाएगा कानूनों का और क्या अर्थ रह जाएगा लोकतंत्र का। आप अपने ही देश में बेगाने बनकर जीते रहो। कानून की आड़ में रिश्वत देना अनिवार्यता हो जाएगी। धन ऊपर तक बंटता है। शिकायत कर भी दोगे, तो किस-किस से वसूल पाओगे। अफसर, बड़े अफसर का नाम लेगा। बड़ा अफसर किसी मंत्री का।

मंत्री मुख्यमंत्री का तथा मुख्यमंत्री आलाकमान का। रिश्वत देने वाला आसमान को ताकता रहेगा। अपनी तकदीर के लिए भगवान का धन्यवाद करके सो जाएगा। जैसे आज नई पीढ़ी की जवानी सो रही है।

गुलाब कोठारी

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