Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2011

पत्र

प्रत्येक अभिव्यक्ति में शब्द होते हैं, ध्वनि होती है। यहां तक कि यह ध्वनि लिखने में भी लेखक को सुनाई देती है। पढ़ने में पाठक को सुनाई देती है। चेहरे भी लिखने-पढ़ने वालों के एक-दूसरे को दिखाई पड़ते हैं। भले अनजान ही क्यों न हों। इसी को तो पश्यन्ति (देखना) कहते हैं। इसके बाद मध्यमा और वैखरी-शब्द और भाषा। जब लोग बोलने से पूर्व भी नहीं सोचते, तब लिखने से पहले कैसे सोच लेंगे। और वह भी सूक्ष्म तरंगों को। आज तो ई-मेल का युग है। वहां पश्यन्ति होती ही नहीं। अनुभूत नहीं हो पाती।

एक समय था जब हम एक-दूसरे को पत्र लिखा करते थे। पत्र को हाथ में लेते ही मन आनन्दित हो उठता था। उस लिखने वाले का चेहरा सामने आ जाता और अनुमान लगाते कि क्या लिखा होगा। जैसे-जैसे नई तकनीक आती गई, यह सुख पीछे छूटता चला गया। जो नित्य पत्र के सहारे संपर्क में रहते थे, वे घोर निराश हो गए। उनको फोन पर होने वाली बातचीत में वैसा सुख नहीं मिलता।

पत्र आना मन का उत्सव होता था। उसी प्रकार पत्र लिखना भी अनुष्ठान से कम नहीं होता था। अनपढ़ और नि:शक्त जन जब किसी से पत्र लिखवाते थे, उनके ह्वदय की हिलोरों को देखते ही बनता था। ये हिलोरें ही पत्र की शक्ति होती थी। पढ़ने वाले तक पहुंचती थी। पढ़ने वाले के ह्वदय में भी हिलोरें उठने लगतीं। मन से मन की बात। संप्रेषण का अद्भुत जरिया। व्यष्टि रूप पत्र का समाचार पत्र के रूप में समष्टि रूप सामने आया। लिखने वाले भी अनेक, पढ़ने वाले भी अनेक। आज इसमें से आदमी बाहर निकल गया। लिखने वाला पत्रकार पढ़ने वाले को दिखाई नहीं पड़ता। चेतनाविहीन संप्रेषण रह गया। अत: पत्रकार भी यंत्रवत् संवेदनहीन हो गया। बुद्धि विलास मात्र रह गया। अहंकार की तुष्टि, महत्वाकांक्षा, स्वार्थपूर्ति आदि ने इसे व्यापार का रूप दे दिया।

अब समाचारों के विषय पढ़ने वालों के लिए हितकारी हों, यह आवश्यक नहीं रह गया। लोकहित और लोकतंत्र, जिस नाम से समाज में प्रतिष्ठित हुए थे, दोनों ही विस्मृत होने लग गए। यहां तक कि स्वयं समाचार भी गौण होते जान पड़ते हैं। लक्ष्य तो विज्ञापन बनते जा रहे हैं। सिद्धान्तवादी सम्पादकों की ऎसे पत्रों को आवश्यकता ही नहीं लगती। व्यवस्थापक लगने लगे हैं।

पत्रकार बड़ा इसलिए माना गया कि वह एक साथ अनेक पाठकों का हित चिन्तन करता है। पत्र में लिखने से ही कोई पत्रकार नहीं हो जाता।
संप्रेषण का एक सिद्धान्त है जिसके कारण जीवन में पत्र का मूल्य अथवा महत्व होता है। पत्र में लिखने वाले के मनोभाव होते हैं। पूर्ण मनोयोग से लिखा जाता है। अत: पढ़ने वाले को मन की वह भाषा सुनाई देती है। लिखने वाले का चेहरा बात करता जान पड़ता है। वही संप्रेषण याद भी रहता है। स्मृति में स्थान बना लेता है। उसका न तो आकलन किया जाता, न उसकी किसी तरह की आलोचना ही होती है। बस, दो व्यक्ति होते हैं-लिखने वाला-पढ़ने वाला।

समाचार-पत्र का लेखन इसीलिए कठिन होता है कि उसे हर श्रेणी और समझ के पाठक पढ़ते हैं। श्रमजीवी, बुद्धिजीवी, मनोजीवी एवं आत्मजीवी। अत: पत्रकार की कलम इतनी दक्ष हो कि इन सबको संतुष्ट कर सके। पत्रकार स्वयं किस धरातल पर जीने वाला है, उस पर भी बहुत निर्भर करेगा। पुराने पत्रकार बुद्धिजीवी माने जाते थे। आज तो स्वेच्छा से श्रमजीवी बन गए। तब समाज के लिए शिक्षक की भूमिका कैसे निभा सकते हैं। इसके लिए सांस्कृतिक धरातल का बड़ा और मजबूत होना भी अति आवश्यक है। पाठक के श्वास के साथ जुड़कर शब्दों के स्पन्दन रक्त को प्रभावित कर सकते हैं? पाठक की प्रकृति और आकृति को बदल सकते हैं? पांच-छह घण्टे का नित्य पढ़ने का अभ्यास भी चाहिए। पत्रकार को ज्ञान का अभाव महसूस ही नहीं होता। न समाचारों में सम्बोधन होता है।

सम्बोधन व्यापारिक भी हो सकता है, आत्मीयता का भी और शुद्ध बुद्धिमता का भी। वैसी ही छवि समाज में पत्रकार की बनती है। आजादी के संघर्ष में पत्रकार निर्भीक थे क्योंकि अपने संकल्प पर दृढ़ थे और लिखने को स्वतंत्र भी थे। आजादी के बाद ऎसे पत्रकारों की संख्या घटती गई। सम्पादक के ऊपर स्वामी के निर्देश हावी होने लग गए। जहां स्वामी स्वयं सम्पादक का कार्य कर रहे थे, वे निर्भीक भी रहे और संघर्ष भी करते रहे। आज भी ऎसे पत्रकारों की स्वतंत्र श्रेणी है, पहचान है। वे तपने को तैयार रहते हैं। उनका सपना, उनका जीवन अपने पत्र से भिन्न नहीं होता।

वे ही समाज को रूपान्तरित कर सकते हैं। उनकी अभिव्यक्ति ही लोकतंत्र के लिए प्रकाश स्तंभ बनती है। पाठक उनसे ही जुड़ते हैं। अखबार पाठकों से जुड़े यह महत्वपूर्ण नहीं है। पाठक का अखबार से जुड़ना महत्वपूर्ण है। इसके लिए हर पत्रकार को एक कलाकार की तरह भूमिका निभानी चाहिए। शरीर के श्रम और बुद्धि के कौशल के सहारे मन के भावों को अभिव्यक्ति देनी होगी। तब जाकर अभिव्यक्ति कला बनेगी। तब पढ़ने वाले के मन को छू सकेगी।

पत्रकार पहले स्वयं से प्रश्न करे कि वह पाठक को पत्र क्यों लिखना चाहता है। क्या परिणाम अपेक्षित है अथवा मात्र सूचना ही देना है। क्या पाठक का रूपान्तरण चाहता है। क्या पाठक का आशीर्वाद चाहता है। वे सारे प्रश्A सामने रहें जो किसी मित्र या सम्बंधी को पत्र लिखते समय होते हैं। इसका अर्थ यह है कि पत्र में वह स्वयं भी रहे और उसका पाठक भी हर शब्द में साथ चले। आज क्या हो रहा है? मान लेे कि पत्र लिखने वाले आदमी को पत्रकार कहते हैं। उसकी जगह “पत्र” लिखने वाले को पत्रकार कहते हैं।

आदमी गायब हो गया। पदार्थ रह गया। जड़ ही जड़। इसके साथ जुड़कर चेतना भी जड़ हो गई। क्योंकि वह भी पाठक के स्थान पर धन (जड़) के पीछे भागने लगी। कला भाग समाप्त हो गया। यह कलम किसी का दिल नहीं छू सकती। स्वयं बेदिल है।

पत्रकारिता निर्जीव बन गई। पत्रकार किसी को पत्र भी लिखे और दिल को न छू सके तो? क्या समाज में कोई बदलाव ला सकता है? नहीं। अपना पेट भर सकता है, बस।

जब पढ़ने वाला लिखने वाले को नहीं पहचान सके तो लिखने की सार्थकता? आवश्यकता इस खोती हुई विरासत को फिर जीवन से जोड़ने की है। पत्र लिखने का अभ्यास शुरू होना चाहिए। हाथ से और पूर्ण मनोयोग से लिखें। जीवन में इस छोटे से संकल्प से मिठास की एक धारा बहने लगेगी। पीने वाले की तृप्ति की अनुभूति आपकी शक्ति होगी। मिठास से सींचने का यह अभ्यास भक्ति का ही दूसरा नाम है। पत्रकार चाहे तो इसे सहज ही प्राप्त कर सकता है। लाखों लोगों के दिलों में जगह बना सकता है। इसी का सुख आनी वाली पीढ़ी को मिलेगा।

गुलाब कोठारी

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