Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2011

हजारों हजारे!

नेतृत्वहीन देश अभावग्रस्त जीवन की तरह भटकता है। न कोई गति, न कोई दिशा, न कोई संकल्प। भौतिकता का आवरण, अर्थ का बोलबाला, संकुचित व्यष्टिभाव सत्ता का पर्याय बन गया। इस कारण भुजबल, माफिया, तस्करी, हत्या, बलात्कार, द्वेष और ईष्र्या का वातावरण बढ़ता ही जा रहा है। जब अपनी सत्ता के सामने ईश्वर की सत्ता छोटी लगने लगती हैं। तब कोई अन्ना हजारे प्रकट होता है। सोती हुई जनता के कान में एक अलार्म बजा जाता है।

देश इतना बड़ा है, मुद्दे इतने सारे हैं, भाषाएं इतनी हैं कि एक अन्ना हजारे कुछ नहीं कर सकता। देश को सैकड़ों अन्ना चाहिए। अनिवार्य तो पहले यह है कि देश को जगाया जाए। कलियुग है। एक ही शरीर में सुर-असुर रहते हैं। जैसे ही असुर प्रकट हो, धावा बोलना पड़ेगा।

जैसे आजकल हमारी संस्कृति पर धावा बोला जा रहा है। एक बाबा रामदेव, दो सौ देशों में योगासन, शाकाहार, अध्यात्म की लहर चला सकते हैं, एक अवधेशानन्द स्वामी, मुरारी बापू, कमल किशोर नागर लाखों पाषाण ह्वदय लोगों को पिघला सकते हैं, अकेला राजस्थान पत्रिका दो करोड़ से अधिक पाठकों को सामाजिक सरोकार तथा संस्कार के क्षेत्र में नेतृत्व दे सकता है। सर्व सुविधा सम्पन्न राजनेता क्यों नहीं कुछ कर पाते।

आज देश में अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्रक्रिया रूक गई है। संत तो त्यागमूर्ति होते हैं। आत्म-कल्याण के लिए ही कार्य करते हैं। वे इस कार्य को सहज ही हाथ में ले सकते हैं। बीज रूप होते हैं। क्षमताओं से परिपूर्ण होते हैं। पेड़ बनाने के लिए बीज को अपना अस्तित्व भुलाना पड़ता है। रात में आत्म-जागरण और दिन में लोक चेतना जागरण में लगना होगा। यही आज हर स्वस्थ नागरिक का संकल्प होना चाहिए।

लोकतंत्र के प्रत्येक पाये के साथ एक अन्ना हजारे चाहिए। हर मीडिया हाऊस एक अन्ना हजारे बन सकता है। क्योंकि वह स्वतंत्र है। अब्दुल कलाम, अजीम पे्रमजी राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं में अलख जगा सकते हैं।

वकीलों के संगठनों को भी आगे आना चाहिए। बिना कपिल सिब्बल के। देश में अब तक जितने भी सांस्कृतिक धरातल के कानून बने और जिन्होंने बिना चिन्तन किए ही संस्कृति से खिलवाड़ किया, उनको बदलने के लिए सामाजिक बहस भी छेड़े तथा बदलाव के लिए भी दबाव डाला जाए। बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई हो।

आज तो इनको अभयदान प्राप्त है। तभी तो जनता के शत्रु बन बैठे हैं। बिना किसी अन्ना हजारे के ये नहीं मानेंगे। इनमें भी पुलिस तो राजनेताओं का ही कार्य करने में व्यस्त रहती है। वेतन किसी से लेती है, कार्य किसी अन्य के लिए करती है। क्या कहते हैं ऎसे लोगों को? इनके लिए तो हर प्रदेश में ही एक-एक अन्ना चाहिए। प्रत्येक राजनीतिक दल में भी हो फूल हजारे का।

हर क्षेत्र का एक हजारे, किन्तु एक दम अन्ना जैसा भी नहीं। जो खुद्दार हो, संकल्पवान हो, मातृभूमि को समर्पित हो। जिसकी आंख, देने पर टिकी रहे, लेने पर नहीं। हर सामाजिक मुद्दे पर, समस्या पर वैचारिक वैषम्यता पर युवा मैदान में उतरें। अभियान चलाएं, किसी के बहकावे में फिसलें नहीं, बिकाऊ लोगों के आगे टिकाऊ बनकर डटे रहें। पत्रिका तो साथ ही होगा। मुद्दा भी उठायेगा। हर मुद्दे को अंजाम तक ले जाएं। अन्ना के आंदोलन में हुए बिखराव के कारणों को भी ध्यान में रखें। हर समस्या को निराकरण के फूल चढ़ाएं। अपराधी सामने आ जाए तो तुरन्त उसके बहिष्कार की घोषणा भी करें। इस बीच यदि नकली अन्ना घुस जाए तो उसका इलाज भी कर दें।

आज दृढ़ इच्छाशक्ति वाले अन्ना हजारे चाहिए। तब देश बनेगा, देश का, नई पीढ़ी का भविष्य बनेगा। इन्हीं अभियानों में से नेतृत्व भी नया निकलेगा। पुराने सड़ने लगे हैं, फैंक देना हैं। उठो, बनो हजारे अन्ना!

गुलाब कोठारी

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