Gulabkothari's Blog

मई 1, 2011

सम्मान

मानव सामाजिक प्राणी भी है और व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्र और अकेला भी जीना चाहता है। भारतीय दर्शन में अकेला जीना, स्वयं के लिए जीना निषिद्ध भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। समूह ही सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का हेतु भी था।

व्यक्तिगत पहचान के लिए जीने का मार्ग खोला आज की शिक्षा पद्धति ने। आप घरों में होने वाले पंरपरागत गीत-संगीत का स्वरूप देखें, तो वह भी समूह में ही रहा। जाति-समुदाय के रीति-रिवाज सामूहिक रहे। भाईचारे का एक वातावरण पूरे समूह पर छाया रहता। सुख-दु:ख में भागीदारी बहुत बड़ा संबल होती थी। यह समानता ही सम्मान था व्यक्ति का। समूह की मुख्य विशेषता ही यह थी कि वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। धन, पद आदि सब बीच में नहीं आते थे। शिक्षा ने नौकरी का रास्ता दिखाया। घर से अलग होना मजबूरी बन गया।

व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं स्वच्छन्द होकर हावी होने लगीं। पुश्तैनी ज्ञान का साथ छूट गया। पराधीन भी हो गया और असुरक्षित भी। अकेले होते ही पूरी जीवनशैली बदल गई। परम्परागत वार-त्यौहार, रीति-रिवाज आदि अकेले रहने के कारण छूट गए एवं विकास की दौड़ में पीछे रह गए। छुियों का कलैण्डर जीवन का आधार बनकर रह गया। सम्मान शब्द की सार्थकता भी छूट गई। परिवार में कभी-कभी बहस हो जाती है। सम्मान कोई दूसरा करता है। जब व्यक्ति अपने अलावा किसी अन्य के लिए या समाज के लिए कुछ करने की क्षमता प्रदर्शित करता है। आज राजनीति में सम्मान और अपमान का भेद ही समाप्त हो गया। गुणों का होना भी अनिवार्य नहीं है। समान का साधारण अर्थ बराबरी का ही होता है।

सम्मान सहित। प्रतिष्ठा, मानता, प्रमाण आदि अर्थो में भी समान का प्रयोग होता है। यहां मान का अर्थ गर्व और ईष्र्या रूप में नकारात्मक भाव से भी होता है। व्यवहार में ये सारे पक्ष गौण हो जाते हैं। जब भी दो लोगों के बीच व्यवहार होता है, समानता का भाव ही श्रेष्ठ होता है। जहां भी इस भाव में कुछ कमी आई, समझो कुछ मिठास कम हो गया। यदि आत्मा के स्तर पर सब बराबर हैं और एक ही ईश्वर के सब अंश भी हैं, तब असमान तो हो ही नहीं सकते। बड़े होकर तो बच्चे भी मित्र बन जाते हैं। समानता सदा आत्मिक धरातल से अनुभूत होती है जो मन के पास ही होता है।

बुद्धि से कुछ दूर दिखाई पड़ता है। अत: बुद्धिमान व्यक्ति के व्यवहार में समानता का भाव कम ही दिखाई पड़ता है। ऊष्णता के कारण वह तोड़ने के गुणों से युक्त रहता है। मिठास पाने के लिए मनस्वी की ओर भागता है। मिठास समानता का ही परिणाम होता है। इसके कारण ही आया हुआ व्यक्ति खाली नहीं लौटता। प्रकृति ने नर-नारी को पूरक के रूप में पैदा किया, ताकि एक-दूसरे की जरूरत भी बनी रहे, आकर्षण शक्ति भी बनी रहे और समानता का भाव भी। समानता के मूल में केवल दृष्टि भेद ही है। गुरू शिष्य को यदि समान मानकर शिक्षित करता है, तभी उसे गुरू पद पर बिठाकर प्रसन्न हो सकता है। अपना प्रतिनिधि मान सकता है। यहां स्वयं गुरू भी निमित्त रहता है। ज्ञान वह अपने गुरू से ग्रहण करके शिष्य को देता है। पिता-पुत्र की स्थिति भी ऎसी ही है। पति-पत्नी के बीच समानता की परिभाषा समय के साथ तेजी से बदली है। इसमें विसंगति यह है कि हम जीना तो भारत में चाहते हैं, किन्तु जीवन शैली भारतीय हो यह हमको स्वीकार्य नहीं है। यही जीवन के हर क्षेत्र में असमानता की शुरूआत है। समानता दृष्टि है, नियम-कायदे का नाम नहीं है।

अवसर की समानता, सुविधाओं की समानता ही समान सूचक है। एक-दूसरे की नकल करना समानता नहीं है। “सहधर्म चरताम्” समानता सूचक है। गृहस्थी का सारा भार नारी पर थोपकर तटस्थ पुरूष कैसे सुखी रह सकता है। पत्नी की तरह पति को भी पत्नी के प्रति समर्पण करना पड़ेगा। आवश्यकतानुसार श्रद्धा, वात्सल्य, स्नेह आदि भी प्रकट करने होंगे। क्योंकि भारतीय विवाह सामान्य लोकानुबन्ध नहीं है। एक ही संवत्सर आत्मा के अर्घवृगलात्मक (दाल जैसे) दो भूतात्माओं का समन्वय माना गया है। यही इनकी पूर्णता का कारण है, पूरकता का प्रमाण है और समानता की दृष्टि है। भौतिक दृष्टि की समानता के लक्षण स्थूल होते हैं। आज समानता का अर्थ हुआ हर कार्य में दोनों का बराबर हाथ बटाना, हर सुविधा एवं स्वच्छन्दता की बराबरी। वासना-व्यसन में पूर्ण स्वतंत्रता। शिक्षा-नौकरी-खान-पान में बराबरी।

दोनों अपनी-अपनी बुद्धि के सहारे ताल ठोकते रहें, उलझते रहें समानता के नाम पर। इसी दृष्टिकोण पर आज के कानूनों ने भी मोहर लगाई है। न इसमें संस्कृति का ध्यान रखा गया, न विदेशों में इन कानूनों के प्रभावों पर शोध हुआ। पुरूष को बच्चे पैदा करने के लिए कानून क्यों बाध्य नहीं करता? स्त्री को ही बच्चे पैदा करने हैं तो विवाह पूर्व इस विषय की जानकारी कानूनी रूप से अनिवार्य क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि जो शिक्षा लड़कों को नहीं दी जाती, वह केवल लड़कियों को कैसे दी जा सकती है। उनको लड़कों जैसी शिक्षा देना ही समानता का प्रमाण है। यहां तक कि आज की माताएं भी इस बोझ को अपने सिर नहीं लेती। शादी के बाद बेटी जाने और उसका भाग्य! हमने तो उसे बेटे जैसे ही पाला है। कोई किसी तरह का भेद महसूस होने नहीं दिया। यही अगर दर्द और वात्सल्य की भाषा और परिभाषा रह गई तो यह सिद्ध हो जाता है कि आज का उच्च शिक्षा प्राप्त मानव भी जैविक सन्तान पैदा कर रहा है। जब उसमें ही संवेदना नहीं है, तो संतान के पास कहां से आएगी? संपन्न परिवारों की çस्त्रयां तो गर्भकाल में भी इतना व्यसनों (शराब-तंबाकू) का सेवन करती हैं, कि उनकी सन्तानों पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा है। विकसित देशों की यही कहानी हमारे सामने है। समानता की भ्रामक परिभाषा ने हमें सम्मान से वंचित कर दिया है।

क्या बाहरी परिवेश के साथ भीतर का व्यक्ति बदल सकता है? त्रेता-द्वापर में भी हम ही थे। वे कहानियां आज भी हम पर लागू होती हैं। कौन किस-किस शरीर में जीता हुआ यहां पहुंचा, किस-किस रूप में हमारा आदान-प्रदान रहा होगा। यदि इन प्रश्Aों पर सोचे तब समानता का पहलू क्या? जब व्यक्ति विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) का सहारा लेकर पुरूषार्थ करता है (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) तब दोनों का मूल समानता दिखाई देता है। दोनों ही एक धर्म पर आधारित हैं।

समानता एक ही दिशा तथा एक ही मार्ग (धर्म) की ही होती है। जब लक्ष्य भी एक हो, लक्ष्य के प्रति संकल्प भी एक हो, पूर्ण दृढ़ता हो, सहयात्रा का सपना हो, तब समानता संभव है। जिससे भी मिले उसे अपनी यात्रा में जोड़ लें अथवा उसकी यात्रा में शामिल हो जाएं। समानता का एक अर्थ है-वह ही मेरी पूर्णता है।

गुलाब कोठारी

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: