Gulabkothari's Blog

मई 6, 2011

सम्मान करें!

पिछले कुछ वर्षो में भारत में भी नर-नारी के आपसी व्यवहार, जीवन शैली और दृष्टि में अनेक परिवर्तन आए हैं। कुछ परिवर्तन शिक्षा के कारण आए हैं। कुछ परिवर्तन सत्ता के अहंकार रूपी आक्रमण से आए हैं। कुछ परिवर्तन विदेशी जीवन शैली की नकल, स्वच्छंदता तथा मीडिया (विशेषकर टीवी, सिनेमा, इंटरनेट) के प्रभाव से भी हुए हैं। परिणाम देखकर नहीं कहा जा सकता कि कोई सामाजिक परिवर्तन कर पाए हैं। नए कानूनों ने तो वैवाहिक सुख-शान्ति को चौपट ही कर दिया। देश के सत्ताधीश इसी पर ठहाके लगाकर विजयगान गा रहे हैं।

महिला सशक्तीकरण के नाम पर जो दुर्दशा नारी की हुई है और आने वाले समय में होगी, ईश्वर भी नहीं बचाने वाला। सारा पश्चिम साक्षी है कि सत्ता के विकासवादी अंधकार और अहंकार ने नारी को कहां खड़ा कर दिया है। ठीक उसी मार्ग पर हमारा देश आंखें मूंदकर दौड़ा जा रहा है।

वैसे तो देश का प्रशासन अभी तक पुरूषवाद से ऊपर नहीं उठ पाया। अत: यह महिलाओं के साथ विकास में सहयोग कर पाएगा, सम्भव ही नहीं है। सरकारी सेवा में जो 20-25 वर्ष रह चुकी हैं, उनका साक्षात्कार आपकी आंखें खोल देगा। महिला आरक्षण बिल पास हो गया, तो महिलाएं पुरूषों के चक्कर लगाकर हांफ जाएंगी। मिलेगा कुछ नहीं। दहेज विरोधी कानून का लाभ अधिक हुआ या घर में बदला लेने का नया हथियार बन गया। अब लिव-इन-रिलेशनशिप का कानून आने दीजिए। सारा नशा चूर होने में देर नहीं लगेगी। देश की आम महिला को तो इस कानून की कोई जरूरत नहीं है।

पुरूषों को तो रत्तीभर भी नहीं है। इनी-गिनी औरतों को खुश करने के लिए देश की संस्कृति से बड़ा भौंड़ा खिलवाड़ हो गया।

आजकल खूब जोर-शोर से सरकारी अभियान चल रहे हैं कि अक्षय तृतीया पर होने वाले बाल-विवाहों को सख्ती से रोका जाएगा। मां-बाप को पुलिस की लाठियां खानी पड़ेंगी। सरकार के किसी अधिकारी को यदि आप यह कह दो कि इनका असली विवाह तो अठारह साल की उम्र के बाद (गौणा) होता है। तब तक तो इसे सगाई मान सकते हैं। इस बात पर अधिकारी और समाज की विकासवादी महिलाएं आपके कपड़े फाड़ देंगे।

क्योंकि वे हर परम्परा को रूढि मानते हैं। आप पुरातनपंथी, दकियानूस और न जाने क्या-क्या पदक प्राप्त कर लेंगे। लेकिन यही लोग कितने खुश हैं कि अब नये कानून की छत्र-छाया में बारह साल से बड़े बच्चे (स्कूली छात्र-छात्राएं) स्वेच्छा से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे। यह कानून तो मानव और पशु में भेद ही समाप्त कर देगा और इस पर हमारा विकासवादी समाज गौरवान्वित होगा। यह स्वच्छन्दता किसको और क्यों दी जा रही है। इसका प्रभाव किस प्रकार का समाज पैदा करेगा।

हम बच्चों को किस मार्ग पर जाने की प्रेरणा दे रहे हैं। पहले ही जितना जहर सिनेमा-टीवी-इंटरनेट ने घोल रखा है, उससे मां-बाप का दम घुट रहा है। चलती हुई क्लास से लड़के-लड़कियां दो-तीन पीरियड के लिए भागते हैं, पुलिस उनको यूनिफार्म में होटलों से पकड़कर मां-बाप को फोन करती है।

इस कानून के बाद नई प्रकार की समस्याएं समाज के सामने आने वाली हैं। गर्भपात, विवाह पूर्व सन्तान और तलाक की तेज गति से समाज/देश चरमरा जाएगा। आज भी मां-बाप तलाक के नाम पर बेटियों का किराया मांगने लग गए। एक बेटी के दो-तीन तलाक जीवनयापन के लिए काफी हैं। पहले दहेज का भूत लड़के वालों के पक्ष में वसूली करवाता था। इंसान का कोई सम्मान ही नहीं।

विरोधाभास तो अब दूर नहीं किया जा सकता। अब हमारे नए कानून सांस्कृतिक धरातल पर बनते ही नहीं। उन सारी गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं जिनका हमारे निषेध हैं या सुख छीनने वाले हैं। çस्त्रयों को पीहर की सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। तब ससुराल में वह मालकिन कैसे बन पाएगी। न पीहर में उसका कोई स्वागत करेगा, न ही ननदें उसे छोड़ेंगी। होना तो यह चाहिए कि कोई भी नया कानूनी प्रारूप यदि हमारी संस्कृति को प्रभावित करता है तो बिना सामाजिक बहस के निर्णय नहीं होना चाहिए।

इसी प्रकार बारह साल की उम्र में बच्चों को शारीरिक सम्बन्धों की छूट देना और छोटी उम्र में होने वाली सगाई पर सरकार की लाठियां बरसाना न्यायसंगत नहीं है। हां, एक शर्त हो सकती है कि अठारह साल की होने तक कन्या मायके में ही रहेगी।

जो भी हो आने वाला समय, इस नए परिवेश में, भारतीय नारी के लिए बड़े मानसिक द्वन्द्व का होगा। मां-बाप भी मदद नहीं कर पाएंगे। कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती दर इसकी साक्षी है।

गुलाब कोठारी

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