Gulabkothari's Blog

मई 8, 2011

कन्या

माया का पर्यायवाची है षोडशी, कन्या, देवी, प्रकृति आदि। माया ही विश्व की शक्ति है। पुरूष पर पूर्ण शक्ति युक्त नियंत्रण प्रकृति का ही होता है। लोक व्यवहार में इसके विकल्प रूप में कन्या पूजन किया जाता है। कंस ने नवजात कन्या का वध किया था, उसका परिणाम पांच हजार सालों से हम पढ़ रहे हैं। यही बात बच्चों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ाते हैं।

फिर भी कन्या भ्रूण हत्या की दर बढ़ रही है। कन्या दान का विषय मानी जाती थी। उसकी पवित्रता के उत्सव मनाए जाते थे। आज तो वह इन जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्र होना चाहती है। उसे नहीं मालूम अच्छी पत्नी, अच्छी मां का जीवन में क्या महत्व है।

इनसे जुड़ी कोई शिक्षा आज उसके पास नहीं होती। मां-बाप बिना शिक्षण-प्रशिक्षण दिए ही उसको जीवन संग्राम में धकेल देते हैं। जो 8-10 हाथ वाली शक्तिरूपा बनने की क्षमता रखती है, उसे भी पुरूष के समान दो हाथ वाली बनकर संतोष करना पड़ रहा है। उसको मांगकर ले जाने वाले नहीं मिलते, दहेज के सहारे समझौता करते हैं।

क=शक्तिशाली, या=पूर्ण नियंत्रण। न्=शून्यता का पर्याय निराकार आत्मा। जो है, किन्तु ऋत् रूप है। स्थान नहीं रोक पाता। कत्ताü भी नहीं है। साक्षी भाव मात्र है। ऎसे तžव को समझ पाना, उसका स्वरूप तय कर पाना, आकार देना तथा उसके कार्यो का अथवा उसके नाम से किए गए कार्यो का नियमन चिन्तन के बाहर की बात है। कन्या में सृजन शक्ति होती है।

माया-महामाया-योगमाया का विकास, जीवन के प्रति दृष्टि, विषय को समझने की क्षमता, एकाग्रता आदि सभी बालक के मुकाबले कहीं अधिक विकसित होते हैं। उसमें आवरित करने की शक्ति होती है। पुरूष इस दृष्टि से प्रकृति के मुकाबले कमजोर होता है। परिणाम स्वरूप स्त्री ही पुरूष को भोगती है। इसी का नाम माया है कि पुरूष सदा भ्रमित रहता है कि वह भोक्ता है।

माया का उद्देश्य है शक्तिमान की शक्ति बनना। उसे माया के प्रपंचों से परिचित कराना, उसके पितृ ऋण मोचन में सहायक होना, उसके जीवन को पूर्णता प्रदान करके सृष्टि यज्ञ चलाना, जीवन के उत्तर काल में शान्ति में स्थित रहना तथा शक्तिमान को शक्ति के चंगुल से बाहर निकालकर मोक्ष मार्ग पर चढ़ाना। किसी पुरूष की जीवन शैली में जीवन के प्रति इतनी गहन समझ दिखाई नहीं देती। माया ही आकर उसे इन गहराइयों से, यथार्थ से परिचित करा कर पे्रम मार्ग से ह्वदय पट खोलती है।

आज गुरूकुल नहीं रहे। ब्रह्मचर्य आश्रम भी नहीं रहा। छोटी उम्र में तो शादी की संभावना वैसे भी कानून ने समाप्त कर दी। इसके विपरीत शिक्षा ने शादी की उम्र दो गुना से भी आगे खिसका दी। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव यह सामने आया कि शादी से पहले लड़कियां खोटे आचरण वाले लोगों के हाथों में फंसने लग गई, जिनके साथ शादी करवाना मां-बाप के लिए सुखद नहीं होता। विकल्प भी नहीं बचते।

कन्या भी नहीं बचती। तब लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे कानून बनते हैं। किसी भी कन्या के लिए इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है। लड़का तो घर छोड़ता नहीं है। लड़कियां आती रहे-जाती रहे। बुढ़ापे में पीहर लौट जाए। घर-गृहस्थी-संतान के सपने?

कन्या मात्र शरीर का नाम नहीं है। शरीर जीवन के कार्य क्षेत्र का निर्घारण मात्र है। कार्य कब और कैसे अथवा क्यों करना है। यात्रा का निर्घारण वाहन नहीं करता। चालक करता है। कन्या शरीर का चालक अत्यन्त समर्थ एवं ऊर्जावान होता है। ऊर्जाओं के संचालन की क्षमता अद्भुत होती है। शरीर से कोमलता, चेहरे से निर्मलता और आंखों में चपलता उसके सृष्टि निर्माण के अस्त्र-शस्त्र हैं। संतान पैदा करना उसका निर्माण नहीं है। यह तो इस शरीर की नैसर्गिक क्रिया है।

कन्या शरीर से जुड़ी है। उसके यौवन का एक बड़ा काल खण्ड इसमें व्यतीत होता है। गर्भावस्था में संतान का रक्षण, पोषण और सर्वागीण विकास मां पर ही टिका रहता है। अत: कन्या की स्वीकृति के बिना सन्तान कर्म संभव नहीं है।
पुरूष की स्वीकृति परिवार के संस्कार तक सीमित रहती है। उसे बीज वपन के लिए भूमि चाहिए। संतान को संस्कार देने की समझ चाहिए। सौम्या को अगिA को जाग्रत करके उसको समर्पित हो जाने का संकल्प चाहिए। “हां, मैं आ गई। मैं तुम्हारी वंश वृद्धि के लिए तैयार हूं।

तुम्हारी सन्तान का पोषण भी करूंगी, सकारात्मक दृष्टि का संचार करूंगी तथा स्वयं को फिर भी गौण रखूंगी। हमारे बीच सदा सखा भाव रहेगा।” पुरूष की एकमात्र स्वीकृति सखा भाव बनाए रखने की होती है। सब कुछ एक-दूसरे पर आधारित होने के बाद भी सखा भाव (अपेक्षा रहित) रहता है। यही दैविक सबन्ध है।

असुरों को इसमें केवल दैहिक सबन्ध दिखाई पड़ता है। बिना दोनों की स्वीकृति के बलात्कार करना असुरों की प्रवृत्ति है। वे देवों के हर कार्य में बाधक होते हैं। कन्या असुरों के लिए अभिशाप बनती है। देव गुणों का रक्षण करती है। चन्द्रमा के प्रचुर मात्रांश के कारण ही सौम्या कहलाती है। इस कारण संकोच युक्त भी है, माधुर्य प्रधान भी और जोड़ने वाला तžव रूप भी। माया रूप होने से गति प्रधान सृष्टि स्वरूपा है।

आत्मबल का पर्याय होने से पीहर छोड़कर ससुराल में जाने को सदा ही तैयार रहती है। मन में शंका या संकोच तो होता ही नहीं। इसका अर्थ ही है कि वह स्वयं के लिए नहीं, सम्पूर्ण ससुराल के लिए जीने का साहस रखती है। इसी के लिए स्वयं को तैयार करती है।

मां-बाप भी ससुराल भेजने की दृष्टि से ही तैयार करते हैं। सारी शिक्षा-दीक्षा-संस्कार इसी बात को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं। ये सब उसे अगले घर में उपयोग भी करने हैं, सिखाने भी हैं। धर्म-अर्थ-काम के दर्शन को सीख लेना उसकी अनिवार्यता है।

आश्रम व्यवस्था के अनुकूल चर्या, प्रकृति के स्वरूप का महत्व, कर्म और फल जैसे विषयों का व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त करती है। और सबसे आpर्य इस धरा का यही है कि हर दृष्टि से पारंगत इस कन्या का मां-बाप दान कर देते हैं। फिर जीवन भर उनका अधिकार पुत्री पर नहीं रह जाता। यही उसके जीवन का सर्वोच्च त्याग भी है और सबसे बड़ा उत्सव भी।

कन्या का स्वरूप और लक्ष्य ही प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। कौन दूसरा प्राणी है इस धरती पर जो मां-बाप के साथ रहकर स्वयं को इस तरह तैयार करता हो, किसी दूसरे घर को प्रकाशमान करने के लिए। न वह मां-बाप के लिए जीती है, न ही स्वयं के लिए। कन्या रूप में सारी दैविक शक्तियो का ज्ञान प्राप्त करती है।

इन्हीं की सहायता से निर्माण-पोषण और निवृत्ति के लक्ष्य को पूरा करती है। जिस जीव को शरीर में धारण करती है, वह स्वेच्छा से शरीर में प्रवेश करता है। पूछकर, स्वीकृति लेकर नहीं आता। अतिथि बनकर आता है। देवता की तरह रहता है, पूजित होता है। परिष्कृत और प्रशिक्षित किया जाता है। माया का मां रूप इससे बड़ा क्या होगा कि इस अनजान जीव का पोषण करके, शरीर में लपेटकर विश्व को भेंट करती है।

अभिमन्यु बनाकर। ससुराल में भी, अनजान जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में रहते हैं। इसी स्थिति में अपने कर्मो का, प्रारब्ध का भोग भी करती है, सन्तान की आत्मा को संस्कारित भी करती है, पति को देवरति में प्रवेश कराती है, उसके मन में विरक्ति पैदा करती है (इस जीवन के आरंभ में यही माया कामना/आसक्ति बनकर आई थी) ताकि कामना से निवृत्त हो सके। पति की मोक्ष मार्ग पर प्रतिष्ठा ही इसके जीवन का लक्ष्य है। पितृ ऋण चुकाने में सहायक होना। पीहर की शक्तियों का ससुराल में स्थानान्तरण करना।

पितृ प्राण, देव प्राण एवं भूत ग्राम का स्थानान्तरण ही विवाह का प्रयोजन होता है। कन्या का इन पर नियंत्रण रहता है। तब कन्या का पूजन क्यों न हो? भाग्यहीन हैं वे जो भ्रूण हत्या करते हैं, दहेज (जड़) के लिए चेतन को प्रताडित करते हैं, कन्या का अपमान अथवा उसके साथ अभद्र/आसुरी व्यवहार करते हैं। मीरां आज भी अमर है। उसको कुलनाशी कहने वाली सास का अता-पता ही नहीं।

कन्या भावी सभ्यता, संस्कृति एवं सृष्टि विराट की प्रतिकृति है। भगवान से प्रार्थना करें कि इस देश में फिर से कन्याओं की इज्जत बढ़े। ताकि देश फिर से ज्ञान मे विश्व का सिरमौर बने, सुख-शान्ति की स्थापना हो और आत्माएं मुक्ति को प्राप्त हों।

कन्या एक बन्धन युक्त आत्मा का वरण करती है और उसके मुक्त होने में सहायक होती है। वही माया स्वतंत्र घूम रही आत्मा को शरीर प्रदानकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए जीने का मार्ग देती है। उसके साथ क्या बीतता है उसे सहन कर पाने की क्षमता भी उसमें होती है।

जिस कन्या का संकल्प टूट जाता है, वह टूटे पत्थर की तरह और संकल्पवान छीणी-हथोड़े की चोट खा-खाकर मूर्ति बन जाती है। हर कन्या में यह दिव्य स्वरूप विद्यमान रहता है। अत: उसका पूजन किया जाता है।

गुलाब कोठारी

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