Gulabkothari's Blog

मई 8, 2011

मां

प्रकृति और पुरूष मिलकर सृष्टि उत्पन्न करते हैं और उसे चलाते भी हैं। सृष्टि में पुरूष बस एक है-अव्यय पुरूष और इसी का अंश ले-लेकर माया (प्रकृति) भिन्न-भिन्न रूपो में सृष्टि का निर्माण करती हैं।

पुरूष शक्तिमान है, किन्तु कत्ताü भाव उसमें नहीं है। कत्ताü भाव सारा माया का ही है। हमारा सिद्धान्त अर्द्धनारीश्वर पर टिका है और सृष्टि की हर मादा में प्रकृति अंश (सोम) अधिक रहता है। यह सोम ही रस प्रधान मिठास का तžव है।

मिठास ही आकर्षण का कारण भी है। इसी से संकुचन का भाव बना होता है। माया के स्पन्दन ही सृष्टि का संचालन करते हैं। अत: नारी, स्त्री, पत्नी और मां रूप से मानव सृष्टि एवं संस्कारों को धारण किए हुए है। माया प्रकृति रूप में तीन गुणों को धारण करती है-सत-रज-तम। तीन प्रकार की सृष्टि पैदा होती है। पशुभाव/ अज्ञान भाव सारा तम रूप है।

सृष्टि के सभी नर-मादा इससे बाहर नहीं होते। कुछ नर-नारी भी पशुओं की तरह आहार-निद्रा-भय-मैथुन तक पशु की तरह जीते हैं। कुछ रजोगुणी होते हैं। विवाह से पूर्व लड़का-लड़की में पौरूषेय भाव (अगिA) की प्रधानता के कारण विकास ऊध्र्वमुखी होता है।

विवाह के बाद रजोगुण बढ़ता है। लड़की में स्त्रैण तžव बढ़ता भी है और जो दबा था वह प्रस्फुटित भी होता है। यह स्त्रैण भाव नारी को पत्नी बनाता है। पूरा गृहस्थाश्रम इसी आधार पर टिका है। बिना स्त्रैण भाव के पौरूष सु# रहता है। पत्नी (संकल्पित स्त्री) का कार्य साधारण नारी नहीं कर सकती। वहां तो तमस है। प्रवाह पतित करेगी। संकल्प में श्रद्धा और समर्पण है। सतोगुणी मार्ग है। इस पंथ का अन्तिम पड़ाव या शिखर ही “मां” है।

पशुवत जैविक सन्तान पैदा करने वाली “मां” नहीं हो सकती। ऎसी मां को सन्तान के बारे में किसी तथ्य की जानकारी नहीं होती। न वे सन्तान को संस्कार दे पाती हैं। कब गर्भवती हो गई, प्रसव हो गया और मां बन बैठी। कोई शिक्षण-प्रशिक्षण कुछ नहीं। एक मकान का निर्माण कर दिया। घर बस गया। गृहस्थी नहीं शुरू हुई।

गृहस्थी की मां हर सदस्य की मां होती है। दुर्गा या लक्ष्मी क्या किसी एक की मां हो सकती है? मां किसी शरीर का नाम नहीं, पोषणकर्ता की अवधारणा है। मां के लिए सृष्टि में कोई पराया नहीं होता।

घर में बच्चों का मां, पति रोगी हो तो उसकी भी मां, सास-ससुर की सेवा में भी मातृभाव और स्त्रैण मिठास। हमारा परिवार सुबह चाय पीने बाहर खुले में बैठता है। पोते-पोती को जमीन पर बिठाने में डर लगता है। सामने “मां” अनाज साफ करती रहती है।

हजारों-हजार मकोड़े मुंह में गेहूं-दाल आदि लेकर रेले में चलते रहते हैं। “मां” कहती हैं- “मैं जीऊंगी तब तक तो ऎसे ही चलेगा।” इसी प्रकार घर में किसी भी अवसर पर खाना बने, पहले अनाथाश्रम, अपाहिजों, कोढियों के आश्रम जाएगा। आप भले ही मेहमानों की संख्या में कतरब्यौंत करते रहो।

जब तक औरत का शरीर दिखाई देता है, “मां” दिखाई नहीं देगी। उसके बनाए हुए खाने में जीवन के संदेश नहीं सुनाई देंगे। रसोईये के खाने में कोई सन्देश नहीं होता, चाहे घर का हो या किसी होटल का। आपको स्पन्दित ही नहीं करेगा।

नई शिक्षित मां रसोई से बाहर आ गई। भोजन निर्जीव हो गया। “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।” पत्नी का बनाया खाना स्त्रैण भाव, स्नेह, प्रेम पैदा करता है। मां का बनाया खाना भक्ति मार्ग, निर्मलता, समष्टि भाव देता है। पुरूषार्थ के अन्तिम पड़ाव-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

ऎसी मां को बच्चे के भविष्य की कभी चिन्ता नहीं होती। किसी भी अन्य प्राणी की मां को देख लें। बच्चा तैयार हुआ और चल दिया। कौन मां प्रतीक्षा करती है, उसके लौटने का? हां, पति की प्रतीक्षा रहती है। मानव मां को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। अन्य प्राणी भोग योनि में रहते हैं, मानव योग/ कर्म प्रधान योनि में जीता है। इस योनि का उपयोग मोक्ष प्राप्ति में कैसे हो, पुनर्जन्म से आत्मा मुक्त कैसे हो, ब्रह्म से छूटा जीव पुन: ब्रह्म में लीन कैसे हो, इस ज्ञान का पहला गुरू “मां” होती है। इससे मां की गुरूता का अनुमान लगाया जा सकता है। इसी को दुर्गा स#शती में देवता भी प्रणाम करते हैं-

या देवी सर्वभूतेषु, मातृ रूपैण संस्थिता।।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।

मां को अवतार कह सकते हैं। धर्म की पुर्नस्थापना के लिए, समय से पूर्व आती है। धर्म की स्थापना बिना मानवता के संभव नहीं है। त्रेता, द्वापर की तरह कलियुग मे मानवता उपलब्ध नहीं है। अत: आज मां का महत्व भगवान जैसा हो गया। वह मानव तैयार करती है, तब ही धर्म की स्थापना संभव है। इसके बिना तो आज कृष्ण भी धर्म की रक्षा नहीं कर पायेंगे।

मां कभी मरती नहीं है। उसने तो अपना अस्तित्व (यौवन) सन्तान के लिए अर्पित कर दिया। संतान के शरीर का निर्माण किया। उसमें पांचों महाभूतों की व्यवस्था की। आत्मा का प्रवेश करवाया। आत्मा की परीक्षा ली। वैसा ही है क्या, जैसा कि ईश्वर से मांगा था।

वरना वैसा बनाना पड़ेगा। और पूरी उम्र मां-बाप प्राण बनकर इस शरीर में बहते हैं। तभी लोगों को सन्तान के साथ, उसके कार्यो के रूप में मां-बाप दिखाई देते हैं। आज भौतिक चकाचौंध, शिक्षा, कॅरियर आदि ने विश्व को सब कुछ दिया। बदले में “मां” को छीन लिया।

किसी भी घर में स्त्री, पत्नी, नारी मिल जाएगी, परन्तु मां को ढूंढ पाना कठिन हो गया है। वही व्यक्ति का, संस्कृति का निर्माण करती है। पत्नी (संकल्पित स्त्री) भी अधिक से अधिक पति को दाम्पत्य रति के द्वारा देव रति के लिए तैयार कर सकती है। पति के मोक्ष मार्ग का ठेका नहीं ले सकती। जिसके “मां” है, वह तो स्वयं ही “देव” है। वहां बस अद्वैत है।

नारी देह का नाम है।
स्त्री संकल्पवान पत्नी है।
मां-आत्मीयता का भावनात्मक/ प्राणात्मक समष्टि भाव है।

गुलाब कोठारी

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: