Gulabkothari's Blog

मई 10, 2011

जीवन का विकास

हमारा शरीर स्थूल और भौतिक है, हम इसके हर अंग और कार्यो को देख सकते हैं, उनका आकलन कर सकते हैं, ऎसा हमारा मानना है। किन्तु, वास्तविकता यह है कि इसका संचालन हमारी बुद्धि करती है, हमारा भाव-तंत्र करता है जिसको हम न देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। शरीर में अपने आप तो केवल प्राकृतिक क्रियाएं ही हो सकती हैं, अन्य कुछ नहीं।

कोई भी व्यक्ति बिना भावों के जी नहीं सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रियाएं होती हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही इनका आधार तय करता है। भाव कहां से आते हैं?

भाव हमारे अनुभवों और दृष्टिकोण का मिश्रण कहे जा सकते हैं। हमारे अनुभव चेतनागत होते हैं। जिस प्रकार हमारी इच्छा मन में स्वत: उठती है, उसी प्रकार हमारे भाव भी स्वयं स्फूर्त होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि इच्छा का स्वरूप स्वतंत्र होता है और भावना हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ढली होती है।

भावना हमारे सूक्ष्म और कारण शरीरों से जुड़ी होती है, क्योंकि यह स्वयं सूक्ष्म है। इसका प्रतिबिम्ब होता है- हमारा आभा मण्डल। उसे हमारा भावनात्मक शरीर कह सकते हैं। दिनभर हमारे भावों के साथ आभा-मण्डल में भी परिवर्तन होते रहते हैं। आज आभा-मण्डल के अध्ययन में विश्व स्तर पर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई हैं। आभा- मण्डल में दो तरह के परिवर्तन होते हैं- रंगों के रूप में और तरंगों के रूप में। इनका विश्लेष्ाण करके व्यक्ति के भावों का आकलन किया जा सकता है। आज वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति का सारा खेल ऊर्जा और पदार्थ के एक-दूसरे में परिवर्तित होने के सिद्धांत पर चलता है। हमारे भाव भी ऊर्जा की श्रेणी में आते हैं, इनको देखना, समझना और मापना भी सम्भव है। जब भावनाओं के द्वारा हमारे मन और शरीर में अनेक क्रियाओं का संचालन होता है तो निश्चित है कि वहां कोई शक्ति है।

सृष्टि की सभी ऊर्जा सामग्री का सम्बन्ध पदार्थ से होता है, अत: भाव भी पदार्थ रचना से बाहर नहीं हो सकते। यह भी सत्य है कि यह ऊर्जा अति सूक्ष्म है। इसी कारण यह (अंतरिक्षीय) वैश्विक ऊर्जा का अंग भी है और उसी के साथ एक जीव होकर कार्य करती है। एक ही प्रकार के नियम दोनों ऊर्जाओं पर लागू होते हैं। अत: इसका भी अर्थ यही है कि हम सीधे प्रकृति से जुड़े हैं और हमारे कार्यकलापों का नियमन भी प्रकृति ही करती है। चूंकि हमारा आभा-मण्डल पृथ्वी के आभा-मण्डल से सीधा जुड़ा है, इसीलिए हम पार्थिव कहलाते हैं। इसी प्रकार हमारा जीवन पृथ्वी पर निर्भर करता है और पृथ्वी सूर्य-चन्द्रमा आदि से जुड़ी हुई है।

जिस प्रकार भावों की तरंगों का आभा-मण्डल होता है, उसी प्रकार हमारी बौद्धिक तरंगों का आभा-मण्डल भी होता है। दोनों आभा-मण्डल अपने आप में स्वतंत्र होते हैं और एक-दूसरे को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। ये शरीर के साथ भी जुड़े रहते हैं। इस प्रकार हमारे आभा-मण्डल के भी अनेक स्तर होते हैं, अनेक रूप और रंग होते हैं।

संसार में जड़ और चेतन दोनों में आभा-मण्डल विद्यमान रहता है। जड़ पदार्थो में आभा-मण्डल स्थिर दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इनमें क्रियाकलाप नहीं होते। इसके विपरीत चेतना का आभा-मण्डल परिवर्तनशील नजर आता है। सभी चेतन स्वतंत्र रहते हुए भी पृथ्वी की सीमा में ही रहते हैं। इन सभी के केन्द्र में जीव होता है, आत्मा होती है या कारण शरीर रहता है। इसके बिना न तो क्रिया हो सकती है और न ही अभिव्यक्ति। हमारा शरीर, हमारी आकृति ही हमारी अहंकृति का यश है, सोम है, अभिव्यक्ति है और हमारी प्रकृति इसका व्यक्तित्व प्रकट करती है। हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है।

हमारे विचार और भाव आते-जाते रहते हैं, किन्तु यह केन्द्र अथवा “मैं” स्थाई बना रहता है। इसी के कारण शरीर की आस्था है। जीवन के सारे ज्ञान और अनुभवों का आधार यही है। अनुभवजनित यही ज्ञान सृष्टि के विकास का आधार बनता है। कौन सीखता है और कौन ज्ञान का उपयोग करता है, इसका उत्तर “अन्त” है। ज्ञान और अनुभव ही हमारी भावभूमि का निर्माण करते हैं। ये कार्य मन के स्तर पर होते हैं। अनुभव निरन्तर होते ही रहते हैं, रूकते नहीं। भाव भी रूकते नहीं हैं। हमारा आभा-मण्डल एक ओर हमारे व्यक्तित्व के आधार पर बदलता रहता है तो दूसरी ओर पृथ्वी के आभा-मण्डल के प्रभाव से भी बदलता रहता है, अत: इस सृष्टि और शरीर का संचालन एक ही सिद्धान्त पर आधारित है। “यथा अण्डे तथा पिण्डे” का भी यही अर्थ है।

जो कुछ हमारे जीवन में घटित होता है उसका भावनात्मक प्रारूप हमारे आभा-मण्डल में विद्यमान रहता है। सूक्ष्म स्तर पर आभा-मण्डल वैसा ही बना रहता है। चूंकि स्थूल के परिवर्तन धीरे होते हैं अत: समय के साथ ही वे परिलक्षित होते हैं। सूक्ष्म में परिवर्तन निरन्तर गतिमान रहता है। अतिसूक्ष्म तक इसका विस्तार होता है। हर प्राणी और पदार्थ का आभा-मण्डल सृष्टि से जुड़ा है। वह दूर-दूर तक सूक्ष्म रूप से व्याप्त है, अत: हर एक प्राणी एक-दूसरे से प्रभावित होता ही है चाहे दूसरा चुपचाप पास ही बैठा रहे। ऊर्जा का आदान-प्रदान तो वहां भी होता ही रहता है। भावनाओं को प्रभावित करने का क्रम तो बना ही रहता है। चीनी विद्वान एवं दार्शनिक ताओ ने लिखा है कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सृष्टि या प्रकृति के इस आदर्श को नकारा नहीं जा सकता। इसी में सृष्टि के विकास का बीज छिपा हुआ है।

यह परिवर्तन हम सब मिलकर लाते हैं। हमारी ऊर्जाओं का आदान-प्रदान ही परिवर्तन का मूल कारण है। हम भावनाओं को भले ही निजी सम्पत्ति मानें, किन्तु यह सत्य है कि हमारी भावनाओं को हमारा सम्पूर्ण वातावरण, जड़-चेतन प्रभावित करता है। सब मिलकर एक-दूसरे को परिवर्तित करते हैं, इसीलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा का सही अर्थ समझा जाना आवश्यक है।

हमें आयु सूर्य से मिलती है। अन्न चन्द्रमा से मिलता है। सोम की कमी चन्द्रमा पूर्ण करता है। हमारा मन परमेष्ठि लोक से आया हुआ है। अर्थात हमारे जीवन में इन सबका नित्य जुड़ाव है, प्रभाव है। हमारी इच्छा, कामना, भावना इसी की अंग हैं। जैसे-जैसे हम ऊपरी स्तरों पर देखते हैं, इनका स्वरूप अतिसूक्ष्म होता चला जाता है, गतिमान होता चला जाता है।

हमारे भावों की तरंगें अंतरिक्ष में रहती हैं। सभी प्राणियों के भावों की तरंगें अंतरिक्ष में होने से अंतरिक्ष इन तरंगों का समुद्र बन जाता है। ये मिश्रित तरंगें सबको प्रभावित करेंगी और सब मिलकर इन तरंगों के मिश्रण को प्रभावित करेंगे। इस बात से किसी देश अथवा भू-भाग की संस्कृति का महžव भी समझा जा सकता है। एक व्यक्ति को आने वाला क्रोध दूसरे व्यक्ति के क्रोध की तरंगों को बढ़ा देता है और उनके आपसी व्यवहार का निर्घारण करता है। सही प्रभाव सद्भाव की तरंगों का होता है। ऋ çष्ा-मुनियों के समीप सभी शांत क्यों दिखाई पड़ते हैं- हम समझ सकते हैं। यही कारण है कि रोगी को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक सौन्दर्यपूर्ण स्थानों पर रहने की सलाह दी जाती है। प्रकृति की इस अद्भुत उपचार क्षमता का कारण भी सूक्ष्म भाव तरंगें ही हैं। वन्य जीव, पशु-पक्षी, पर्वत, नदी-नाले, पेड़-पौधे सभी की भाव-तरंगों का मिश्रण हमें प्रसन्न एवं निरोगी बनाये रखता है।

गुलाब कोठारी

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