Gulabkothari's Blog

मई 14, 2011

सिमटता लोकतंत्र

समय की अपनी चाल होती है। उसी से प्रारब्ध जुड़ा रहता है और उसी से भविष्य। वर्तमान बीच का निर्णायक मोड़ होता है। आज जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे समय की भाषा बोलते सुनाई पड़ रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में तो चुनावी नतीजे सुनामी साबित हुए हैं। चाहे इसे कम्युनिस्ट पार्टी के विरोध में कहें या ममता की तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में। बिना ऎसी सुनामी के पुराने बरगद नहीं उखाड़े जा सकते। बंगाल में सर्वाधिक लम्बी अवधि (34 साल) के वामपंथी गठबंधन शासन को मुंह की खानी पड़ गई। गठबंधन को एक चौथाई सीटों के आगे रास्ता नहीं मिला। तमिलनाडु की स्थिति भी कमोबेश यही है। बल्कि करूणानिधि की द्रमुक और भी दयनीय स्थिति में पहुंच गई है। दोनों राज्यों में यही अपेक्षित भी था। दोनों ही राज्यों में सत्ता पक्ष की छवि जनता की नजरों में गिर चुकी थी। मतदान पूरा सत्ता पक्ष के विरूद्ध रहा। भले कांग्रेस जीतकर उभरी हो। केरल के चुनाव साधारण ही रहे। पुaुचेरी ने तमिलनाडु का अनुकरण किया। हां, असम में सत्ता पक्ष कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत की।
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुaुचेरी में एक आश्चर्यजनक स्थिति बनी, जिसकी ओर पत्रिका लम्बे समय से इशारा कर रहा है, किन्तु सत्ता का अहंकार इसे नकारता रहा है। राष्ट्रीय दलों में से कांग्रेस हर राज्य में है, जो आज केन्द्र में सत्ता में भी है। दूसरे बड़े राजनीतिक दल की भूमिका निभाने के बावजूद केन्द्र का विपक्षी दल भाजपा सभी जगह पर नकार दिया गया। केन्द्र में विपक्षी दल इन पांचों राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। देश के लोकतंत्र को लकवा मारने लग गया है। संघ के भीष्म पितामह हाथ बांधे खड़े हैं। भाजपा को राख से उठते हुए देख रहे हैं!
इन परिणामों को देखकर भाजपा स्वीकार कर ले कि आज पांचों प्रान्तों में वह जनता की पहली, दूसरी, तीसरी पसन्द भी नहीं रही। आने वाले चुनावों में बाकी का भ्रम भी मिट जाएगा।

देखो तो, पश्चिम बंगाल में 294 में से 290 स्थानों पर भाजपा ने प्रत्याशी खड़े किए। कोलकाता भाजपा का अघोषित गढ़ और परिणाम शून्य। एक भी सीट नहीं जीत पाए। भले ही उनको गोरखा जन मुक्ति मोर्चा की तीनों सीटें मिल गई हों। हो गई न आतिशबाजी? भाजपा के लिए यह परिणाम गौरवशाली कहे जा सकते हैं!

तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा। 2-जी स्पैक्ट्रम के बाद भी द्रमुक तीस से अधिक सीटे ले आई। भाजपा अपना खाता भी नहीं खुला पाई। क्यों? साहुकार पेट पर तो भाजपा का कब्जा मानते हैं। राजनीति का भरोसा नहीं होता। करूणानिधि को हराने के लिए कांग्रेस ने जयललिता से हाथ मिला लिया हो। जैसा भाजपा ने झारखण्ड में शिबु सोरेन से हाथ मिलाया था।
असम में कांग्रेस ने पकड़ बढ़ाई। व्यापारियों ने वहां भी भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। कुल 126 सीटों में से वह 121 पर लड़ी लेकिन उसे केवल चार सीटें मिली। पिछली बार दस मिली थीं। गरीबी में आटा गीला। केरल की राजनीति का अपना एक मार्ग है। वह उसी पर चल रही है। कुल 806 सीटों पर लड़कर वह केवल 4 सीटें जीत पाई। बधाई भाजपा नेतृत्व और चुनाव समिति को। इससे बुरी हालत और क्या होगी कि भाजपा के पास आज राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता तक नहीं है।

सारे परिणाम यह सिद्ध कर रहे हैं कि देश का विपक्ष अपनी क्षमता नहीं बढ़ा पा रहा है। जब सत्ता पक्ष के समक्ष इतनी बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं, इतने महाभ्रष्टाचार के आरोप हैं, जांचें चल रही हैं, उस हाल में विपक्षी भाजपा इन तीनों बड़े राज्यों में खाता न खोल पाई या स्थिति को सुदृढ़ नहीं कर पाई, तब निश्चित है कि वह कांग्रेस से भी बहुत कमजोर है। घर में भले ही वह मूंछों पर ताव देती रहे, लोक में उसका मान नहीं रहा। यदि आज मध्यावधि चुनाव हो जाएं तो भाजपा का कटोरा दिल्ली जैसे रीत जाएगा। जहां कुछ है, वह भी सिमट जाएगा। उसी दिन से देश में कांग्रेस का सामन्तवाद लागू हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

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