Gulabkothari's Blog

मई 15, 2011

कारक

बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। यह कारण ही कारक का पर्याय है। हर कार्य में कारण-कार्य भाव रहता है। कारक शब्द में शक्ति भी है, ऊष्मा भी है। देने का भाव भी है। वैसे तो कर्म के लिए पहला कारक इच्छा होती है। इच्छा (अवग्रह) के बिना चेष्टा (ईहा) नहीं होती। अवगम से ही मानो स्वीकृति मिल गई। तब प्रश्A उठता है कि क्या इच्छा का भी कोई कारक होता है। इच्छा पैदा नहीं की जाती। इच्छा का एक कारक होता है ज्ञान। जिस विषय का ज्ञान नहीं उसके बारे में इच्छा नहीं उठती। जो उठती है तब उसका कारक ज्ञान न होकर प्रारब्ध होता है।

गीता में कृष्ण ने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय तीनों सदा साथ रहते हैं। मूल में तो ज्ञाता की इच्छा ही रहती है। बिना ज्ञाता के ज्ञेय का ज्ञान मानव के लिए हित और अहित दोनों कर सकता है। भारत और पश्चिम के ज्ञान का मूल भेद यही है। हमारा ज्ञान आज भी ज्ञान ही माना जाता है। “एको ज्ञानं ज्ञानम्” इसकी परिभाषा है। ब्रह्माण्ड में सब चीजों एवं प्राणियों के मूल में एक ही तžव है। इसी का दूसरा पक्ष पश्चिमी प्रयोगात्मक ज्ञान है। इसको विज्ञान कहते हैं। “विविधं ज्ञानं विज्ञानम्”। विरूद्धं ज्ञानं विज्ञानम्। विशिष्टं ज्ञानं विज्ञानम्।

अन्तर बस इतना ही है कि हमारे ज्ञान में ज्ञाता है और पश्चिम के ज्ञान में ज्ञाता नहीं है। वह पूर्ण रूप में उपकरणों पर आधारित है। अत: उस ज्ञान का उपयोग व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करेगा। यही कारण है कि विज्ञान के प्रयोग सही और गलत दोनों दिशाओं में हो रहे हैं। भारतीय ज्ञान में सूचना एवं जानकारियों का अभाव है। वह विवेक एवं प्रज्ञा पर आधारित है। इसमें किसी का अहित संभव ही नहीं है। “सर्वे भवन्तु सुखिन” हमारा वेद वाक्य है।

शिक्षा एक बड़ा कारक है। अब तक शिक्षा का आधार ज्ञान रहा था। आज की शिक्षा मूलत: विज्ञान पर आधारित या पश्चिमी जीवन शैली पर टिकी हुई है। इसमें हित-अहित का कोई भेद स्पष्ट नहीं है। समाज का तो चिन्तन ही गौण है। यही शिक्षा जब कारक बनती है तब व्यक्ति केवल स्वयं के लिए जीने वाला बन जाता है। बौद्धिक स्तर पर स्वयं को ऊपर उठाकर और अकेला हो जाता है। सुविधाओं को ही सुख मानने वाला व्यक्तित्व तैयार होता है। सारी चेतना शक्ति का उपयोग जड़ (अर्थ) के संग्रहण में लगा देता है। ऎसे में न तो यह शिक्षा सर्वकालिक हो सकती है, न ही सार्वभौमिक। अत: शिक्षित व्यक्ति के कार्य भी अल्पकालिक एवं सामाजिक/ राष्ट्रीय दृष्टि से अर्थहीन ही साबित होते हैं।

इसी प्रकार एक कारक होती है प्रकृति – सतोेगुण, रजोगुण, तमोगुण रूप में। माया का यह रूप ही जीवन का कारक-पालक-संहारक है। महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली रूप इनका स्वरूप है। जैसी व्यक्ति की प्रकृति (स्वभाव) होती है, वैसी ही अहंकृति और आकृति भी होती है। इनमें से यदि एक भी बदल जाए तो अन्य दो भी स्वत: बदल जाती हैं। व्यक्ति न अहंकृति को बदल सकता है, न आकृति को। प्रकृति को सहजता से बदल सकता है। प्रकृति ही क्षर पुरूष रूप कर्म का कारक है।

हमारे जीवन में स्वाध्याय का यही महत्व है। कुछ समय निकाल कर व्यक्ति स्वयं के बारे में चिन्तन करता है। अपनी प्रकृति को समझने का प्रयास करता है। अपने विद्या-अविद्या अथवा ज्ञान-अज्ञान भाव को समझने का प्रयास। प्रकृति के रूपान्तरण का प्रयास अपने धर्म-ज्ञान-विवेक से करता है। अपने अर्थ चिन्तन एवं कामना-संसार का आकलन करता है। यदि ज्ञानवान है तो तमोगुणों को सतोगुण में रूपान्तरित करने का प्रयास करेगा। एक संकल्प रूप में। बदलाव अस्थाई होता है, रूपान्तरण स्थाई होता है। रूपान्तरण के साथ ही व्यक्ति की आकृति, वाणी, खान-पान और सम्बन्धों में परिवर्तन आता दिखाई पड़ता है। अहंकार की कमी सत्वगुण का प्रमाण है। इसके साथ ही निस्वार्थ प्रेम का विकास दिखाई देने लगता है।

कारकों में सर्वशक्तिमान कारक प्रारब्ध को माना गया है। पिछले कर्म जो पूरे हो चुके, चाहे इस जन्म के अथवा पूर्व जन्म के, उनके फलों को प्रारब्ध कहते हैं। इनका स्वरूप भी भिन्न होता है। व्यक्तिगत फल भी होते हैं, दूसरों के साथ लेन-देन के रूप में, सुख-दुख, धनी-गरीब, जन्म-मरण, यश-अपयश आदि प्रारब्ध का ही क्षेत्र माना जाता है। कहावत भी है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जन्मकाल में जो कुण्डली बनी, उसमें हम प्रारब्ध देखते हैं। कर्म करना तो तब तक शुरू ही नहीं होता। कर्म-फल के अनुरूप न चाहते हुए भी व्यक्ति को रूग्णता, दुर्घटना, दारिद्रय आदि को स्वीकार करना पड़ता है। मित्रों एवं शत्रुओं के बीच में जीना पड़ता है। हमारा बनाया हुआ भाग्य हमें ही भोगना पड़ता है।

इसी प्रकार जो मेरा भावी जीवन बनेगा, उसका कारक मेरे वर्तमान कर्म होंगे। उन्हीं के फल मुझे कल मिलेंगे। वर्तमान मेरे जीवन का एक मात्र कारक काल क्षेत्र है। न अतीत मेरे काम का, जीवन का मृत अंश, न भविष्य मेरे नियंत्रण में। वर्तमान ही कर्म को पूजा का स्वरूप देता है। जीवन को धारण करके धर्मरूप बन जाता है।

कर्म मूल में स्थूल होता है। क्रिया रूप होता है। कर्मफल भी स्थूल रूप में ही अधिकांशत: प्राप्त होता है। सम्पूर्ण सृष्टि क्षर पुरूष से निर्मित हो रही है। इसका कारण अक्षर पुरूष होता है। प्राण रूप माया शक्ति होती है। अदृश्य और सूक्ष्म। अक्षर सृष्टि का निर्माण और आलम्बन अव्यय पुरूष होता है। वही अव्यय पुुरूष्ा जिसको कृष्ण ने स्वयं का पर्याय बताया है। सम्पूर्ण सृष्टि में यही एक मात्र पुरूष है। बाकी सब माया के ही नाम-रूप आकार हैं। माया ही राग-द्वेष रूप कर्म कराती है, कर्मबंध कराती है। कर्मफल भी भोगने को प्रेरित करती है।

क्या हर कर्म का कारक कर्म ही है? कर्म भी तो परिणाम ही है। ज्ञान युक्त इच्छा का। इच्छा को पैदा नहीं कर सकते। इच्छा पूरी करने को ही जीवन शैली नाम दिया गया है। इच्छा मन में उठती है। यह मन भी प्रकृति के प्रभाव में रहता है। अत: प्रवाह में बहना भी इसका स्वभाव है। यह प्रवाह भी कई तरह के कर्म करवाता है। इसके साथ ही विवेक का होना भी आवश्यक है। किन्तु फिर भी परिणाम सही निकलें, यह जरूरी नहीं। परिणाम नीयत से आते हैं। देश-काल-संयोग-निमित्त-विद्या-कला-राग आदि माया के सभी रूप कारक होते हैं। किन्तु जिन भावनाओं के आधार पर कर्म किया जाता है, फल की दिशा में तो यही एक कारक होता है।

गुलाब कोठारी

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