Gulabkothari's Blog

मई 16, 2011

जया और ममता का डंका

बिल्ली के भाग छींका

परिणाम बताते हैं कि तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव सीधे-सीधे भ्रष्टाचार से प्रभावित हुए। करूणानिघि परिवार की सत्तालोलुपता और धनसंग्रहण की नीति के कारण परिवार में कलह भी शुरू हुई तथा सार्वजनिक भी हो गई। दोनों पुत्रों की सत्ता पर कब्जे की महत्वाकांक्षा ने स्टालिन और अझगिरि में मतभेद पैदा कर दिए।

कांग्रेस ने भी इस बार द्रमुक पर अघिक सीटों का दबाव बनाया। इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। चुनाव प्रचार में खुलकर उपहार बांटे जा रहे थे। सत्तर करोड़ रूपए की राशि बरामद होने के बाद यह स्पष्ट था कि यह राशि मतदाताओं को खरीदने में काम आने वाली थी।

पिछले पांच साल के सरकार के कार्यकाल को भी भ्रष्टतम ठहराया गया। धमकियां, भ्रष्टाचार एवं अतिक्रमण चरम पर रहे। परिवार के अनेक सम्बंधी इस कार्य में खुलेआम जुड़े थे। सरकारी अनुबन्धों की चर्चा तो मीडिया में पूरे कार्यकाल में बनी रही।

एक बड़ा मुद्दा और रहा। श्रीलंका में सरकार ने अभियान चलाकर लिट्टे का सफाया कर दिया था। इसके लिए भारत ने भी सैनिक सहयोग दिया था। श्रीलंका सरकार के नरसंहार की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की जांच समिति ने की। इससे जनता का खून खौल गया था। अब तमिलों के पुनर्वास के लिए जो कुछ किया जा रहा है, उससे जनता संतुष्ट नहीं है। इतने संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस एवं द्रमुक की उदासीनता की प्रतिक्रिया भी चुनाव परिणाम में दिखाई दे रही है। इसी प्रकार जनता इस बात पर भी आक्रोश में है कि प्रदेश के मछुआरों पर भी श्रीलंकाई तटरक्षक जानलेवा हमला करते हैं। सोनिया का आश्वासन तनाव कम नहीं कर पाया। तमिलनाडु में तेरह जिले तटवर्ती क्षेत्र में आते हैं।

हाल ही में करूणानिघि की पुत्री का नाम जिस प्रकार 2-जी स्पेक्ट्रम में आया, जनता स्वयं को अपमानित एवं ठगी सी महसूस करने लगी। पिछले चुनावों में जनता ने जयललिता को भी भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण हराया था। इस बार उनका भ्रष्टाचार करूणानिघि के आगे छोटा पड़ गया। इसके अलावा भी एक नीतिगत फैसला जयललिता की सफलता का कारक बना, वह था छोटे दलों के साथ गठबन्धन। सन् 2006 के चुनाव में फिल्म अभिनेता विजयकान्त ने एक नई पार्टी बनाई थी डी.एम.डी.के.। इस पार्टी ने अन्नाद्रमुक का सर्वाघिक नुकसान किया था। इस बार जयललिता ने विजयकांत को साथ ले लिया। सारा घाटा ही लाभ में बदल गया। वन्नियर समुदाय पर भी विजयकान्त की अच्छी पकड़ है। चुनाव प्रचार में विजयकांत का प्रभाव रहा।

एक बात और भी। इस बार पूरे प्रचार के दौरान जयललिता का रूख उदारवादी रहा। इस कारण चुनाव प्रचार भी संगठित रूप ले पाया। मीडिया भी स्वीकारता है कि जयललिता इस बार कुछ नरम पड़ी, साथ लेकर चली।

लेकिन जयललिता ने जो चुनावी वादे किए, वे कितने पूरे कर पाएंगी, यह समय के गर्भ में है। धन बटोरना उनकी भी कमजोरी है। क्या ग्यारहवीं कक्षा से कॉलेज तक के विद्यार्थियों को मुफ्त लेपटॉप मिलेंगे? सभी गृहणियों को पंखे, मिक्सी, ग्राइण्डर। महिलाओं को विवाह सहायता 25 हजार रूपए। चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र साथ में। प्रसूता महिला को 12 हजार रूपए तथा 6 माह का अवकाश। बड़े शहरों में मोनो रेल सेवा आदि अनेक घोषणाएं कर रखी हैं। औद्योगिकीकरण, तकनीकी शिक्षा और रोजगार की बड़ी चुनौतियों का खुलासा शायद आगे होगा।

जयललिता के सिर पर विजयी सेहरा तो बंध गया, किन्तु इसका श्रेय द्रमुक को अघिक जाता है। अच्छा होगा यदि सरकार पहला संकल्प ही यह करे कि अगली बार खुद के बूते पर अच्छी छवि के साथ फिर आना है।

सोनार मोमता

पश्चिम बंगाल के आम चुनावों ने एक नया इतिहास रच दिया। पूरी कैडर वाली पार्टी को एक संघर्षशील और संकल्पवान शक्तिरूपा ने धराशायी कर दिया। अब मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर अपनी चोटी बांधेगी। जिस दिन ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग से महिला पुलिस ने चोटी पकड़कर नीचे तक घसीटा था, सीढियों से, उस दिन द्रोपदी की तरह ममता ने भी संकल्प किया था, कि मुख्यमंत्री बनकर ही केश बांधेंगी और तभी सचिवालय में प्रवेश करेंगी। ज्योति बसु तब मुख्यमंत्री थे। काश, वे आज भी होते। आस्था और तपस्या के रंग और प्रजा के संग।

राजनीति के धरातल पर चुनाव परिणाम वाम मोर्चा की हार अघिक है। ज्योति बसु ने कृषि भूमि के पट्टे बांटकर लोकप्रियता भी कमाई थी और कृषि की उपज को भी दुगना कर दिया था। बुद्धदेव या तो अपनी छवि को बड़ा करते या बसु की छवि को छोटा करते। उन्होंने औद्योगिकरण को गतिमान कर दिया और प्रदेश को अग्रणी पंक्ति में खड़ा करने के पीछे पड़ गए। बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं लाए, भूमि अघिग्रहण करने की कवायद शुरू की। तीन-तीन फसलों वाली भूमि जाने लगी तो तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुई। तब ममता आगे आई। सरकार भी आक्रामक हो गई। सिंगूर से टाटा की नैनो वापस लौटी। नंदीग्राम में प्रस्तावित बिजली परियोजना बन्द हुई। किसान वाम मोर्चा से छिटक गए।

उधर, पार्टी के भीतर हलचल हुई। मोर्चा के मुख्य घटक फारवर्ड ब्लॉक, सीपीआई, आरएसपी लगभग 70-75 सीटें जीतते रहे हैं। मोर्चा ने इनका कद छोटा कर दिया। टिकट कम कर दिए। ये बागी हो गए। इनके चेयरमैन विमान बोस अकेले पड़ गए।

ममता पर वाम मोर्चा के लोगों ने दो घातक हमले किए। ममता के कई जगह फ्रेक्चर हुए। प्रदेश की जनता में रोष व्याप्त हुआ। उधर व्यापारियों से चन्दा वसूली के नाम पर ज्यादतियां भी कम नहीं हुई। वाम मोर्चा के मुख्य संचालक अनिल विश्वास का अचानक निधन हो गया। सभा आयोजक सुभाष चक्रवर्ती नहीं रहे।

ममता बनर्जी के अकेले होने को लेकर भी बहुत असमंजस बना रहा, किन्तु अन्त में अच्छी छवि वाले सेवानिवृत अघिकारियों को साथ लिया। जनता ने सहारा दिया और नैया पार हुई।

अब जब ममता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगी, तब सब कुछ नए सिरे से करना पड़ेगा। पूरी उम्र जो पुलिस और प्रशासन उसे धक्के  मारते रहे, वे अब भी कन्नी काटेंगे। जिन मुद्दों को उसने उठाए रखा उनको भी नई दृष्टि से देखना होगा। जैसे कृषि और उद्योगों के बीच संतुलन। कोलकाता की और गंदे तथा पिछड़ेपन की छवि से मुक्ति भी उनका पहला प्रयास होना चाहिए।

ममता ने साहित्य, संस्कृति, सिनेमा क्षेत्र के अच्छे लोगों को भी साथ लिया। इससे भी बड़ी कूटनीति का दाव खेला। तृणमूल कांग्रेस, एनडीए का हिस्सा होती थी। धीरे-धीरे उसने अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया। कठिन कार्य था, किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण भी था। कर दिखाया ममता ने। कांग्रेस के पाले में घुसपैठ कर डाली। इस कारण ममता की पकड़ राज्य के उन 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर हो गई, जो 34 वर्षो से वाम मोर्चा की विरासत बने हुए थे। सभी ममता के साथ आ गए। ममता ने भी उनको 15 प्रतिशत आरक्षण का लालीपॉप दे तो दिया है – धर्म के नाम पर। अब समय ही तय करेगा राज्य का भविष्य।

चुनाव तो पांच प्रदेशों में हुए, कोई नेता बनकर उभरा तो वह है ममता। कुल मिलाकर ममता की चतुराई ने परिस्थितियों का आकलन करके अपना मार्ग निकाला है, उसकी तपस्या का इतिहास साक्षी बना रहा है, हर बंगाली ने मां, माटी और मानुष के विश्वास को प्रतिष्ठित किया है। हार्दिक बधाई ममता को, बंगाल को!

गुलाब कोठारी

प्रधान संपादक पत्रिका समूह

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