Gulabkothari's Blog

मई 29, 2011

द्रवण

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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हर पदार्थ की तीन अवस्थाएं होती हैं-घन, तरल और विरल। बर्फ, जल और वाष्प। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आदित्य। अगिA, वायु तथा आदित्य। शरीर में भी तीनों अवस्थाएं विद्यमान रहती हैं-अस्थि, अवयव, रक्त और श्वास-प्रश्वास। इसी प्रकार मन के भाव भी घन-तरल और विरल होते हैं। मन का द्रवण या द्रवित होना, भावपूर्ण अभिव्यक्ति में नेत्रों से जल बह पड़ना ही द्रवण है। जो टस से मस न हो, जिसे पत्थर का दिल कहा जाता है, वही घन रूप है।

दो शब्द हैं-द्रव और द्रव्य। द्रव्य तो पदार्थ, सामग्री को कहते हैं, किन्तु द्रव लक्षण रूप भी है। इसके साथ प्रवाह भी है, आवेग भी है। अवसर अथवा परिस्थितिवश द्रव घन भी बन जाता है और विरल (वायु रूप) भी। जीवन का निर्माण भी विरल अवस्था से तरल होते हुए घन रूप में आना ही है। इसी को हम अव्यय-अक्षर-क्षर अवस्था स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कह लेते हैं। पंचकोशों में बाहरी अन्नमय कोश घन रूप है। भीतर के तरल-विरल बनते हुए आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं।

हमारे जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ के रूप में स्पष्ट होता है। अर्थ और काम के व्यापार (शरीर और मन के) को धर्म का आधार देते हुए कामनातीत हो जाना (मोक्ष) ही जीवन की सार्थकता है। हर व्यक्ति के पास कामना के भी दो धरातल होते हैं-एक अहंकार का तथा दूसरा ममकार का। बाकी रूप इन्हीं के स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) तथा अविद्या (अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) के कारण। शरीर, मन, बुद्धि पर सत-रज-तम के आवरण भी होते हैं। यही तो हमारे आचरण की भूमिका तय करते हैं।

संसार में हमारे व्यवहार के मूल बिन्दु भी अहंकार और ममकार ही होते हैं। अहंकार का धरातल ठोस होता है, ममकार का तरल। एक पक्षीय होने पर दोनों ही हितकारी नहीं होते। अहंकार बुद्धि में उठता है, अत: ऊष्ण है। सहजता से समझौता नहीं करता। ममकार मन रूप है। व्यक्ति एकपक्षीय प्रवाह में बह जाता है। मन के विषयों पर महिलाओं का नियंत्रण श्रेष्ठतर होता है। उनके व्यवहार का क्षेत्र भी प्रेम-स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य आदि होता है। अत: वे अधिक द्रवणशील होती हैं। यहां तक कहा जाता है कि आंसू तो उनकी आंख के कोर पर ही मानो बैठा रहता है। यह तो महिलाओं का अचूक हथियार कहा जाता है।

तब क्या द्रवण जीवन के युद्ध क्षेत्र का हथियार मात्र है? नहीं! द्रवण जीवन की एक ऎसी बरसात है, जो मन के धरातल को धोकर पाक-साफ (निर्मल) कर देती है। द्रवणशीलता का कारण भी तो निर्मलता ही होती है। दया-करूणा का भाव होता है। स्त्री के मुकाबले पुरूष में बहुम कम होता है। अहंकार इसे घन रूप कर देता है। पत्नी रूप में स्त्री ही इसे पिघला सकती है। जो स्त्री स्वयं पुरूष भाव में जीती है, वह भी पुरूष जितनी ही द्रवित हो पाती है। çस्त्रयों की तरह न होने से वह पुरूष के अहं को भी द्रवित नहीं कर पाती। उसका अपना अहं भी घन ही होता है।

मानव व्यवहार में द्रवण प्रेम का उच्चतम स्तर है। शबरी के बेर का प्रसंग, चन्दनबाला के बाकलों का महावीर स्वामी को बहराने का प्रसंग, विदुर पत्नी का कृष्ण को केले के छिलके खिलाने जैसे अनेक प्रसंग हैं, जो द्रवणशीलता के श्रेष्ठ उदाहरण बनते हैं। इसके विपरीत जब कौरव सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, वह पूरी शक्ति से उसे रोकने का प्रयास कर रही थी। यह उसका अहंकार था। जब हारने लगी, कोई वश नहीं चला तब कृष्ण को पुकारकर समर्पित हो गई। यह भक्ति रस का शुद्ध द्रवण था।

हमारे सभी शास्त्र-पुराण साक्षी हैं कि भावनाओं की कठोरता में भी çस्त्रयां ही पुरूषों से काफी आगे हैं। जब-जब भी आसुरी शक्तियों ने दैविक शक्तियों को पराजित किया है, देवताओं ने देवियों की ही शरण ली है। देवियों ने ही असुरों का संहार भी किया है। क्रूरता में भी पुरूष कभी çस्त्रयों से आगे नहीं निकल सकता। यही कारण है कि सिंह जैसे पति पर भी सवार होकर उसे पिघलना सिखा देती है। गृहस्थाश्रम की शुरूआत करने को जीवन में प्रवेश करती है।

वानप्रस्थ से पूर्व पति को द्रवण का पाठ सिखाकर विदा हो जाती है। वानप्रस्थ में इसी के सहारे भक्ति मार्ग पर चढ़ाती है। भक्ति द्रवण का ही पर्याय है। बिना मां के आगे रोये भक्ति में प्रवेश संभव ही नहीं। आत्मा के सारे आवरण ज्ञान से ही नहीं हट जाते। मन का द्रवण चाहिए। पत्नी ही सिखा सकती है। स्त्री नहीं सिखा सकती। अर्घनारीश्वर में दोनों ही नर हैं, दोनों ही नारी। इस काल में दोनों में ही स्त्रैण भाव की बहुलता होने लगेगी। माया भाव के आवरण और माया ही हटाने वाली। पुरूष को प्राप्त करना है तो स्त्री भाव में आना ही होता है। तब देवता के आगे, गुरू के आगे आंखों से निरन्तर रस धार बहने लगती है।

एक आpर्यजनक बात यह भी है कि स्त्री ही द्रवण भाव में प्रतिष्ठित करती है। फिर भी वह स्वयं कामना से पार पाने में अक्षम है। उसका ममकार उसे बांधे रखता है। इसे पति ही तोड़ना सिखाता है। वैसे गुरू भी इस कार्य में सक्षम होता है, किन्तु वहां बिना शर्त का समर्पण सहज नहीं होता।

कृष्ण विश्राम कर रहे हैं। रूक्मणी पांव दबा रही है। अचानक उसका हाथ कृष्ण के तलुवे के छाले पर जाता है। आpर्यचकित हो कर कृष्ण से प्रश्न करती है कि यह कैसे हुआ। न आपको पैदल चलना पड़ा, न किसी भक्त ने नंगे पांव भगाया? कृष्ण बस मुस्कुरा दिए। रूक्मणी रहस्य को समझ नहीं पाई। फिर पूछा। कृष्ण ने कहा कि इसका कारण तो तुम स्वयं हो। काटो तो खून नहीं। “कृष्ण! यह कैसे संभव है? मेरे मन में तो इस प्रकार का भाव तक नहीं उठ सकता।” कृष्ण सहज भाव से कहने लगे कि çस्त्रयों की ईष्र्या का कोई विकल्प भी नहीं, इलाज भी नहीं। कुछ दिन पूर्व राधा यहां आई थी। तुम्हारी देख-रेख में ही थी। तुम अभी तक उससे ईष्र्या करती हो। तुमने उसको गरम-गरम दूध पिला दिया था। तुम्हें नहीं मालूम कि उसके ह्वदय में मेरे चरण रहते हैं। छाले तो होने ही थे। भतृüहरि शतक में एक विवेचन आता है पति-पत्नी संवाद का-

पति-“नाराज क्यों हो?”
पत्नी-मैं क्यों नाराज होने लगी।
पति-मेरी ऎसी कौनसी गलती हुई?
पत्नी-तुम्हारी तो कोई गलती नहीं, सारी गलती तो मेरे होने की है।
पति-किन्तु तुम्हारी आवाज रोने जैसी?
पत्नी-किसके आगे रोऊं?
पति-मैं हूं ना!
पत्नी-फिर तो रोने की जरूरत ही क्या थी।

ये अध्याय जीवन की उन पाठशालाओं के हैं, जो जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। द्रवणशीलता में प्रवेश कराने का कार्य करते हैं। इस के बिना घन को द्रव नहीं कर सकते। द्रव भी द्रव में ही लीन हो सकता है। अत: संन्यास आश्रम का लक्ष्य तरल को विरल में रूपान्तरित कर देना है। तभी सत्य का रूप छूटेगा। ऋत् बनकर ऋत् में समा सकेगा। जहां से आए, वहीं लौट सकेंगे।

हर पदार्थ की तीन अवस्थाएं होती हैं-घन, तरल और विरल। बर्फ, जल और वाष्प। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आदित्य। अगिA, वायु तथा आदित्य। शरीर में भी तीनों अवस्थाएं विद्यमान रहती हैं-अस्थि, अवयव, रक्त और श्वास-प्रश्वास। इसी प्रकार मन के भाव भी घन-तरल और विरल होते हैं। मन का द्रवण या द्रवित होना, भावपूर्ण अभिव्यक्ति में नेत्रों से जल बह पड़ना ही द्रवण है। जो टस से मस न हो, जिसे पत्थर का दिल कहा जाता है, वही घन रूप है।

दो शब्द हैं-द्रव और द्रव्य। द्रव्य तो पदार्थ, सामग्री को कहते हैं, किन्तु द्रव लक्षण रूप भी है। इसके साथ प्रवाह भी है, आवेग भी है। अवसर अथवा परिस्थितिवश द्रव घन भी बन जाता है और विरल (वायु रूप) भी। जीवन का निर्माण भी विरल अवस्था से तरल होते हुए घन रूप में आना ही है। इसी को हम अव्यय-अक्षर-क्षर अवस्था स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कह लेते हैं। पंचकोशों में बाहरी अन्नमय कोश घन रूप है। भीतर के तरल-विरल बनते हुए आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं।

हमारे जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ के रूप में स्पष्ट होता है। अर्थ और काम के व्यापार (शरीर और मन के) को धर्म का आधार देते हुए कामनातीत हो जाना (मोक्ष) ही जीवन की सार्थकता है। हर व्यक्ति के पास कामना के भी दो धरातल होते हैं-एक अहंकार का तथा दूसरा ममकार का। बाकी रूप इन्हीं के स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) तथा अविद्या (अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) के कारण। शरीर, मन, बुद्धि पर सत-रज-तम के आवरण भी होते हैं। यही तो हमारे आचरण की भूमिका तय करते हैं।

संसार में हमारे व्यवहार के मूल बिन्दु भी अहंकार और ममकार ही होते हैं। अहंकार का धरातल ठोस होता है, ममकार का तरल। एक पक्षीय होने पर दोनों ही हितकारी नहीं होते। अहंकार बुद्धि में उठता है, अत: ऊष्ण है। सहजता से समझौता नहीं करता। ममकार मन रूप है। व्यक्ति एकपक्षीय प्रवाह में बह जाता है। मन के विषयों पर महिलाओं का नियंत्रण श्रेष्ठतर होता है। उनके व्यवहार का क्षेत्र भी प्रेम-स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य आदि होता है। अत: वे अधिक द्रवणशील होती हैं। यहां तक कहा जाता है कि आंसू तो उनकी आंख के कोर पर ही मानो बैठा रहता है। यह तो महिलाओं का अचूक हथियार कहा जाता है।

तब क्या द्रवण जीवन के युद्ध क्षेत्र का हथियार मात्र है? नहीं! द्रवण जीवन की एक ऎसी बरसात है, जो मन के धरातल को धोकर पाक-साफ (निर्मल) कर देती है। द्रवणशीलता का कारण भी तो निर्मलता ही होती है। दया-करूणा का भाव होता है। स्त्री के मुकाबले पुरूष में बहुम कम होता है। अहंकार इसे घन रूप कर देता है। पत्नी रूप में स्त्री ही इसे पिघला सकती है। जो स्त्री स्वयं पुरूष भाव में जीती है, वह भी पुरूष जितनी ही द्रवित हो पाती है। çस्त्रयों की तरह न होने से वह पुरूष के अहं को भी द्रवित नहीं कर पाती। उसका अपना अहं भी घन ही होता है।

मानव व्यवहार में द्रवण प्रेम का उच्चतम स्तर है। शबरी के बेर का प्रसंग, चन्दनबाला के बाकलों का महावीर स्वामी को बहराने का प्रसंग, विदुर पत्नी का कृष्ण को केले के छिलके खिलाने जैसे अनेक प्रसंग हैं, जो द्रवणशीलता के श्रेष्ठ उदाहरण बनते हैं। इसके विपरीत जब कौरव सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, वह पूरी शक्ति से उसे रोकने का प्रयास कर रही थी। यह उसका अहंकार था। जब हारने लगी, कोई वश नहीं चला तब कृष्ण को पुकारकर समर्पित हो गई। यह भक्ति रस का शुद्ध द्रवण था।

हमारे सभी शास्त्र-पुराण साक्षी हैं कि भावनाओं की कठोरता में भी çस्त्रयां ही पुरूषों से काफी आगे हैं। जब-जब भी आसुरी शक्तियों ने दैविक शक्तियों को पराजित किया है, देवताओं ने देवियों की ही शरण ली है। देवियों ने ही असुरों का संहार भी किया है। क्रूरता में भी पुरूष कभी çस्त्रयों से आगे नहीं निकल सकता। यही कारण है कि सिंह जैसे पति पर भी सवार होकर उसे पिघलना सिखा देती है। गृहस्थाश्रम की शुरूआत करने को जीवन में प्रवेश करती है।

वानप्रस्थ से पूर्व पति को द्रवण का पाठ सिखाकर विदा हो जाती है। वानप्रस्थ में इसी के सहारे भक्ति मार्ग पर चढ़ाती है। भक्ति द्रवण का ही पर्याय है। बिना मां के आगे रोये भक्ति में प्रवेश संभव ही नहीं। आत्मा के सारे आवरण ज्ञान से ही नहीं हट जाते। मन का द्रवण चाहिए। पत्नी ही सिखा सकती है। स्त्री नहीं सिखा सकती। अर्घनारीश्वर में दोनों ही नर हैं, दोनों ही नारी। इस काल में दोनों में ही स्त्रैण भाव की बहुलता होने लगेगी। माया भाव के आवरण और माया ही हटाने वाली। पुरूष को प्राप्त करना है तो स्त्री भाव में आना ही होता है। तब देवता के आगे, गुरू के आगे आंखों से निरन्तर रस धार बहने लगती है।

एक आpर्यजनक बात यह भी है कि स्त्री ही द्रवण भाव में प्रतिष्ठित करती है। फिर भी वह स्वयं कामना से पार पाने में अक्षम है। उसका ममकार उसे बांधे रखता है। इसे पति ही तोड़ना सिखाता है। वैसे गुरू भी इस कार्य में सक्षम होता है, किन्तु वहां बिना शर्त का समर्पण सहज नहीं होता।

कृष्ण विश्राम कर रहे हैं। रूक्मणी पांव दबा रही है। अचानक उसका हाथ कृष्ण के तलुवे के छाले पर जाता है। आpर्यचकित हो कर कृष्ण से प्रश्न करती है कि यह कैसे हुआ। न आपको पैदल चलना पड़ा, न किसी भक्त ने नंगे पांव भगाया? कृष्ण बस मुस्कुरा दिए। रूक्मणी रहस्य को समझ नहीं पाई। फिर पूछा। कृष्ण ने कहा कि इसका कारण तो तुम स्वयं हो। काटो तो खून नहीं। “कृष्ण! यह कैसे संभव है? मेरे मन में तो इस प्रकार का भाव तक नहीं उठ सकता।” कृष्ण सहज भाव से कहने लगे कि çस्त्रयों की ईष्र्या का कोई विकल्प भी नहीं, इलाज भी नहीं। कुछ दिन पूर्व राधा यहां आई थी। तुम्हारी देख-रेख में ही थी। तुम अभी तक उससे ईष्र्या करती हो। तुमने उसको गरम-गरम दूध पिला दिया था। तुम्हें नहीं मालूम कि उसके ह्वदय में मेरे चरण रहते हैं। छाले तो होने ही थे। भतृüहरि शतक में एक विवेचन आता है पति-पत्नी संवाद का-

पति-“नाराज क्यों हो?”
पत्नी-मैं क्यों नाराज होने लगी।
पति-मेरी ऎसी कौनसी गलती हुई?
पत्नी-तुम्हारी तो कोई गलती नहीं, सारी गलती तो मेरे होने की है।
पति-किन्तु तुम्हारी आवाज रोने जैसी?
पत्नी-किसके आगे रोऊं?
पति-मैं हूं ना!
पत्नी-फिर तो रोने की जरूरत ही क्या थी।

ये अध्याय जीवन की उन पाठशालाओं के हैं, जो जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। द्रवणशीलता में प्रवेश कराने का कार्य करते हैं। इस के बिना घन को द्रव नहीं कर सकते। द्रव भी द्रव में ही लीन हो सकता है। अत: संन्यास आश्रम का लक्ष्य तरल को विरल में रूपान्तरित कर देना है। तभी सत्य का रूप छूटेगा। ऋत् बनकर ऋत् में समा सकेगा। जहां से आए, वहीं लौट सकेंगे।

गुलाब कोठारी

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