Gulabkothari's Blog

जून 5, 2011

झूठ

हमें सदा सत्य बोलना चाहिए। सत्यमेव जयते! सत्य क्या है? ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या। जो दिखाई दे रहा है, वह भी मिथ्या है। हां, क्योंकि हर पल बदलता रहता है। जैसे नदी का पानी प्रतिक्षण अपना स्थान, स्वरूप और प्रभाव बदल लेता है। नियति को सत्य कहा है। पानी नीचे की ओर बहता है। अगिA ऊपर को उठता है। वायु तिरछा बहता है। यह नियति सत्य है। जो कभी नहीं बदलता, वही सत्य है। वह केवल ब्रह्म है। उसी के नाना रूप हैं। उसी का सारा विवर्त है।

हर कार्य के पीछे कारण रहता है। कारण एक रहते हुए भी कार्य अनेक हो सकते हैं। बीज एक है। उससे तना, टहनियां, पत्ते, फूल, फल आदि स्वरूप प्रकट होते हैं। जो सत्य नहीं होता उसे लोक व्यवहार में झूठ कहते हैं। काल्पनिक, अवास्तविक या मिथ्या भी कह देते हैं। सत्य छिपता नहीं है। एक ही रूप हो सकता है। झूठ का कोई निश्चित स्वरूप भी नहीं होता। बदलता रहता है। आकाश या जल की तरह फैला होता है। मैं जितने लोगों से मिलता हूं, व्यवहार करता हूं, सब भिन्न होता है। मां-बाप से अलग, बच्चों से अलग, मित्रों से अलग, व्यावसायिक लोगों से अलग, अजनबियों से अलग। और भी न जाने कितने रूप में मिलता हूं लोगो से। हर एक के साथ नया चेहरा।

नया मुखौटा। किसी को भी मेरा सही चेहरा दिखाई नहीं देता। यही झूठ है। सच होता तो सबको मेरा चेहरा एकसा दिखाई देता। किसको याद रहता है सत्य? एक और सत्य होता है। जिसके भी केन्द्र होता है, परिधि या स्वरूप होता है उसे सत्य कहते हैं। जिसके केन्द्र परिधि नहीं होते, वह ऋत कहलाता है। फैला हुआ। हवा-जल-आकाश आदि। इसीलिए कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते। जिसे हम सत्य कह रहे हैं वह ब्रह्म का विवर्त है। माया तैयार करती है। बनाती है तो बिगाड़ भी सकती है। यह माया द्वारा निर्मित विश्व झूठ होते हुए भी सत्य है। यानी झूठ भी अपने आप में एक सत्य है।

झूठ बोलना कारण वश भी होता है और किसी न किसी भय से भी। भय तो सबसे बड़ा मृत्यु का ही होता है। फिर भी इनके रूप हैं और मूल में सारे रूप मृत्यु से ही निकलते हंै। लोभ-स्वार्थ-ईष्र्या-संकटकाल-हानि का डर आदि कई कारण भी होते हैं कि व्यक्ति झूठ बोलता है। अहंकारवश अपनी होशियारी दिखाने को, किसी को नुकसान पहुंचाने अथवा गुमराह करने को, अज्ञान छिपाने को आदि हजारों कारणों से व्यक्ति झूठ बोलता है।

झूठ का अर्थ है सचाई से दूर। जैसे नदी जल को उद्गम से दूर ले जाती है। जैसे भौतिक चकाचौंध व्यक्ति को मोह में बांध लेती है। बाहरी विश्व में उलझे रहने को विवश करती है। व्यक्ति आत्मा से दूर रहकर भ्रम में जीता है। इसी के निराकरण के लिए तो योग का सहारा लिया जाता है। ताकि उसे झूठ और सत्य का भेद समझ में आ सके। पुरूष और प्रकृति मिलकर ही सृष्टि को चलाते हैं। प्रकृति के त्रिगुण- सत, रज, तम, हर सत्य को ढंकते रहते हैं। व्यक्ति की कामनाएं, महत्वाकांक्षाएं, असुर प्राणों के प्रभाव एवं प्रारब्ध भी यथार्थ से व्यक्ति को दूर ले जाते हैं। संकल्पवान व्यक्ति ही ऎसी स्थिति में स्थिर चित्त रह सकता है।

झूठ बोलने में वाक् चातुर्य की आवश्यकता होती है जो कि हर एक के पास नहीं होता। इसीलिए ज्यादातर लोगों का झूठ पकड़ा जाता है। जो होशियार होते हैं, वे आगे निकल जाते हैं। आज राजनीति में शीर्ष पर जितने भी नेता दिखाई पड़ते हैं, इसका उदाहरण हैं। सत्य पर टिके रहने के लिए साहस चाहिए। तपना पड़ता है। त्याग भी करना पड़ता है। मोह त्यागकर धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। ऎसे लोगों का इतिहास लिखा जाता है। झूठ बोलने वाले हवा में ही उड़ जाते हैं। बड़े-बड़े पदों पर बैठकर भी विस्मृति में चले जाते हैं।

सत्य बोलने का अर्थ है स्वयं के आवरण हटाने का संघर्ष। हम मानते हैं कि झूठ दूसरे के साथ बोला जाता है। ऎसा नहीं है। वाणी तो बोलने का अन्तिम पड़ाव है। इससे पहले व्यक्ति शब्दों का, भाषा का योजन अपने चिन्तन में करता है। जब उसे सही लगता है, उसके बाद बोलता है। चिन्तन का चित्रण व्यक्ति के मानस पटल पर अंकित हो जाता है। यह अंकन ही आवरण चढ़ाने-हटाने का कार्य करता है। यह हमारे भावनात्मक धरातल के नए रूप का निर्घारण करता है। सत, रज, तम के समीकरण का रूपान्तरण करता है।

मन की चंचलता व्यक्ति को प्रवाह से बाहर नहीं आने देती। उसे भी झूठ का सहारा ही सुविधाजनक लगता है। वाणी सरस्वती और विश्व लक्ष्मी या अर्थजगत का अन्तिम पड़ाव है- वाक् रूप। परा-पश्यन्ति-मध्यमा से होकर ही वैखरी प्रस्फुटित होती है। योगीजन इसी वैखरी के सहारे-सहारे पर तक पहंुच जाते हैं। सत्य ही ऋत बन जाता है। इस मन पर विजय भी पाना सहज नहीं होता। केवल सत्य के मार्ग से ही संभव है। सत्य से ही तो स्वरूप का निर्माण हो रहा है। आकार-आचार ही पहचान बनते हैं और व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। आवरण ही झूठ हैं। इनकी भी एक सचाई होती है। यही व्यक्ति के आचरण का प्रमाण-पत्र बनता है। एक दीपक के चारों ओर जिस रंग का कागज-सिलोफिन लगाएंगे, वैसी ही दीपक की लौ नजर आएगी। ये सारे आवरण संकल्प या लक्ष्य के अभाव में चढ़ते जाते हैं।

हमारी समाज व्यवस्था स्वयं आवरणों से शुरू होती है। जाति-धर्म-नियम-परम्पराएं सभी तो आवरण का कार्य करते हैं। शरीर स्वयं भी एक आवरण है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य ही आवरण मुक्ति का मार्ग है। अविद्या-अस्मिता-आसक्ति-अभिनिवेश से आवरण चढ़ते हैं। सत्य इतना डरावना लगने लगा कि बोलना कठिन है। झूठ बोलने से किसी को डर नहीं लगता। बल्कि अनेक बार तो अपने बोले हुए झूठ पर व्यक्ति गर्व करता है।

गुलाब कोठारी

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