Gulabkothari's Blog

जून 17, 2011

नई संस्कृति!

जिन लोगों ने हमारा संविधान लिखा और जो लोग आज उसे लागू कर रहे हैं, ये दोनों एक देश और एक सभ्यता के नजर नहीं आते। संविधान लिखने वालों के आगे हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। जो आज संविधान लागू कर रहे हैं, उनके आचरण और भाषा, संवेदनहीनता, व्यक्तिगत लांछन आदि से तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। राजनेताओं में गरिमा नहीं, अहंकार भर गया। अपने स्वार्थ के आगे किसी का सम्मान करना ही भूल गए। स्वार्थ सिद्ध नहीं तो पार्टियां बदल लेते हैं। आज स्पष्ट लगने लगा है कि भले ही ये लोग भिन्न-भिन्न भाषा और कटाक्ष काम में लें, हैं तो भीतर एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।

 

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जो कुछ कांग्रेस के बारे में कहा, वह उनके भीतर का ही कलुष है। ‘यूपीए सरकार मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम हो गई है।’ ‘कांग्रेस लादेन की औलाद है।’ इस प्रकार की भाषा पहली बार नहीं बोली। यह मुम्बई की कच्ची बस्तियों की भाषा है। जहां लाज-शर्म-सभ्यता से जुड़े प्रश्न उठते ही नहीं। लेकिन चाल-चलन-चेहरा के आधार पर राजनीति करने वाले लोग अभद्र, अश्लील भाषा का प्रयोग करें और यह भी कहे कि मुझे तो येन-केन प्रकारेण सत्ता चाहिए, तब किसके कान खड़े नहीं होंगे। देखो तो, निकल किसके मुंह से रहे हैं।

 

यह तो एक ताजा बानगी है। पिछले कुछ सालों का राजनीति का इतिहास देखें तो लगेगा कि आज की राजनीतिक संस्कृति का यही नया स्वरूप बन गया है। फिर चाहे लालकृष्ण आडवाणी, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, सुषमा स्वराज, राहुल गांधी, लालू यादव, मुलायम सिंह, बाल ठाकरे, जयललिता, राबड़ी देवी…. किसी को भी ले लें।

 

अब नेता मुद्दों और नीतियों के आधार पर विपक्षी/ विरोधी दलों की आलोचना नहीं करते। अभद्र टिप्पणियां करते हैं। अन्दर सब एक जैसे हैं। सदन में किसी मुद्दे पर बहस करते ही नहीं। जो व्यक्ति सार्वजनिक सभाओं में अत्यन्त शालीन, विकासवादी एवं जोशपूर्ण भाषण देते हैं, लोगों को आश्वासन देकर वोट बटोरते हैं, वे ही सदन में कितना असभ्य व्यवहार करते हैं कि देखने वालों को शर्म आ रही है। उनको नहीं आती। अपने इस दोहरे चरित्र को ही शायद हथियार मान लेते हैं।

 

विकीलीक्स क्या है? राडिया पुराण देश को क्या संदेश दे रहा है? बाबा रामदेव क्यों अचानक हरिद्वार जाकर बैठ गए? जयललिता दिल्ली में करूणानिघि के परिवार और चिदम्बरम को क्यों निशाने पर लिए थी? इस्पात खनन की सूचनाएं लीक होने के पीछे क्या रहस्य है? रिलायन्स के साथ अनेक मुद्दे सरकारी मिलीभगत से जुड़े क्यों अचानक सार्वजनिक हो रहे हैं?

 

किसी भी मतदाता को पूछकर देख लो कि पिछले चुनावों में देश के बड़े-बड़े नेताओं ने किस-किस अभद्र भाषा का प्रयोग किया। किस प्रकार राजनेता कृतत्व से हटकर व्यक्तिगत लांछन लगाने लगे हैं। स्कूल का छात्र भी ऎसा करे उसे कोई माफ नहीं करेगा। कितना घटिया स्तर हो सकता है लोकतंत्र के चुने हुए जन प्रतिनिघियों का एक-दूसरे के खिलाफ! शर्म ही क्या, घिक्कारने की बात है। इस नई राजनीतिक संस्कृति को तो इनके परिजन भी टीवी पर देखकर पहचानने से मना कर देते होंगे। किन्तु सच तो यह है कि यही आज की संस्कृति हो गई है।

 

किसी राजनेता के पास जनता की बातों के लिए समय नहीं है। सभी मिलकर जनता को लूट रहे हैं। जो कम लूट रहा है वह राडिया को ले आएगा। विकीलीक्स का उपयोग कर लेगा या फिर सीधा-सीधा नाम लेकर आक्रमण कर देगा। आम आदमी को इन सूचनाओं की जानकारी या गहराई मालूम नहीं। उसे तो पता है कि राशन कार्ड का काम हो या ड्राइविंग लाइसेंस का, बिना पैसे काम नहीं होता।

 

लोकतंत्र का नया अर्थ धीरे-धीरे नई पीढ़ी समझने लग गई है। समय दूर नहीं लगता जब इन काले चेहरों को एक झटके में मतदाता बाहर कर देगा। वरना दिग्विजय, गडकरी जैसे एक-दो बड़बोले हर पार्टी में उभर कर आ गए तो पार्टियां तो डूबेगी ही, साथ ही हर सभ्य नागरिक इन पर थू-थू करेगा। पांच साल बाद उन्हें हरा कर। यह वही देश है जो वेदों के ज्ञान के आधार पर विश्व में फिर से सिरमौर होने के सपने देख रहा है।

 

गुलाब कोठारी

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