Gulabkothari's Blog

जून 18, 2011

सबका भला

एक ही ईश्वर की सृष्टि भिन्न-भिन्न आवरणों के कारण अलग दिखाई पड़ती है। विपरीत भाव में भी खड़ी हो जाती है। यही माया भाव का जगत है। भीतर एक, बाहर अनेक। बुद्धिमान वर्ग इस अनेकता के अहंकार में जीता है। मनीषी इस अनेकता में एकता देखकर। आज जो आरक्षण का विवाद छिड़ा हुआ है, वह इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। सरकार ने आरक्षण दिया और सहजता से देश के टुकड़े हो गए। आरक्षित वर्ग इतना प्रसन्न हुआ मानो जेल से छूटा हो। किन्तु विषवमन भी करने लगा। सारा देश इस दंश का अनुभव करने लगा। एक ओर सामूहिक रूप में गैर आरक्षित वर्ग के विरूद्ध कार्रवाइयां भी होने लगीं, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत तौर पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग आम बात हो गई। गांवों में भी दो धड़े हो गए। आरक्षित वर्ग के युवा अलग-थलग पड़ गए। इनमें अनेक तो पिता के पद के कारण अपराधों में भी लिप्त हो गए। इनका भविष्य मुख्य धारा का नहीं रहा। नई संस्कृति में ये फिर से अलग रहने को मजबूर हो गए। लाभ दो-तीन प्रतिशत को मिला, किन्तु सजा सभी सौ प्रतिशत को।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में रिगेनिंग को सही ठहरा दिया। जो व्यक्ति आरक्षण की आड़ में अपने वरिष्ठों से बहुत ऊपर निकल गए थे, उनको नए सिरे से वापस पुराने स्थान पर लाने के आदेश किस को नहीं चुभेंगे? मुख्यमंत्री की यह घोषणा कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना करेंगे, स्वागत योग्य है। अच्छा होगा यदि पालना शीघ्र एवं अक्षरश: उसी भावना में की जाए। बिना किसी समझौते के। जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आरक्षण स्वीकार करके ऊंचे पद ग्रहण किए थे, वे आज उसी कोर्ट के आदेश को मानने को तैयार नहीं दिखाई पड़ते। प्रतिक्रिया का एक छोटा रूप हम गुर्जर आंदोलन में भी देख चुके हैं। एक हलवाई ने इनके बच्चों को दूध बेचने से भी मना कर दिया था। अब यदि बड़ी प्रतिक्रिया होती है तो देश फिर वहीं पहुंच जाएगा, जहां से आरक्षण शुरू हुआ था। आगजनी और खून-खराबा महत्वपूर्ण नहीं होता। देश की एकता-अखण्डता और सामाजिक सौहार्द महत्वपूर्ण होते हैं। आरक्षण ने इनको तार-तार कर दिया है।
यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू किया गया और ईमानदारी से लागू किया तो देश में सैकड़ों अधिकारी और हजारों कर्मचारी फिर से नीचे के पदों पर काम करने को मजबूर होंगे।

नौकरी कोई छोड़ेगा नहीं। क्योंकि बाहर इनको यह लाभ नहीं मिलने वाले। जिन वरिष्ठ लोगों का ये अब तक अपमान कर रहे थे, फिर से उनके नीचे ही काम करना पड़ जाएगा। यही वह डर है जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के विरोध में ऎसी प्रतिक्रिया दिखाई पड़ रही है। जितनी अधिक प्रतिक्रिया होगी, उतना ही गैर आरक्षित वर्ग नाराज होता जाएगा। हालात बद से बदतर होते जाएंगे। इने-गिने सरकारी नौकरों के अत्याचारों एवं अधिनायकवादी व्यवहार का खमियाजा सारे समाज को पूरी उम्र भोगना पड़ेगा।

अन्त में आरक्षित वर्ग उसी सामाजिक धरातल पर जा पहंुचेगा, जहां उसको फिर से अपमान के घूंट पीने को बाध्य होना पड़ेगा। युवा पीढ़ी के प्रति समाज संवेदनशील नहीं दिखाई देगा। उचित तो यह होगा कि देशहित, समाजहित को ध्यान में रखकर फैसला तुरन्त लागू कर दिया जाए ताकि देश को नए घावों का दुख भोगने से बचाया जा सके। जो भूलें हुई , उन्हें भूल कर नया मार्ग प्रशस्त किया जाए। इसी में हम सब की भलाई है।
गुलाब कोठारी

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