Gulabkothari's Blog

जून 19, 2011

स्वार्थ

स्वार्थ यानी स्वयं के लिए। व्यक्ति जीता किसके लिए है-स्वयं के लिए। जो भी लक्ष्य लेकर पैदा हुआ, उसके लिए। अपने निजी स्वरूप- प्रकृति के अनुकूल, आत्म-स्फूर्त स्वतंत्रता के साथ। इस स्व में ही स्वजाति भी अन्तर्निहित रहती है। इसी से ‘स्वयं’ बनता है। जो अपने आप होता चला जाए और निजी रूप में भी बना रहे।

 

इस स्व को अर्थ के अनेकार्थ के साथ समझने से अर्थ-अनर्थ-व्यर्थ-स्वार्थ आदि स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। अर्थ को यहां ‘के लिए’ के रूप में देख रहे हैं। स्वयं के लिए। आशय, प्रयोजन, इच्छा, साधन, हेतु, विषय, धन, वस्तु, उपयोग के लिए जैसे भी इसके अर्थ होते हैं। चार पुरूषार्थो में एक पुरूषार्थ अर्थ भी है। अर्थ यानी मतलब। अभिव्यक्ति, लक्ष्य और व्यंग्य तीन रूप कहे गए हैं अर्थ के। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना भी अभिव्यक्ति ही है।

 

अर्थ मांगने को भी कहते हैं और दावा करने को भी। रीति-परंपरा और यथार्थ को भी। जब व्यक्ति स्वयं के लिए जीता है, चिन्तन और कर्म करता है, वह व्यष्टि भाव कहलाता है। सामाजिक प्राणी होने से, प्रकृति दत्त स्वरूप के कारण, सम्पूर्ण सृष्टि के साथ अन्तर्निहित सम्बन्ध के कारण और ईश्वर अंश रूप होने के कारण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इस जीवन की अवधारणा है। इस चिन्तन स्वरूप को समष्टि भाव कहते हैं।

 

जब व्यक्ति घोर स्वार्थी हो जाए तब क्या होता है। उसे हर चीज स्वयं के लिए जान पड़ती है। हर प्राणी उसके लिए उपभोग या उपयोग रूप जान पड़ता है। परायेपन का भाव मिट जाता है। सब कुछ स्व में समा जाता है। यही व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरण है। स्व का ‘अहं ब्रह्मास्मि’ हर एक प्राणी में प्रतिष्ठित होना समष्टि है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य रूपी ज्ञान से अविद्या-अस्मिता-आसक्ति (राग-द्वेष), अभिनिवेश के पर्दे हटे, वैसे समष्टि भाव प्रतिष्ठित हुआ। अहंकार और ममकार दोनों विदा हो जाते हैं।

 

स्व का भी तो अपना एक स्वरूप है। स्व किसको कहते हैं? शरीर को? नहीं! शरीर नष्ट होता है, स्व नहीं। शरीर मेरा है, मैं नहीं। शरीर स्वयं कुछ नहीं कर सकता। चलाया जाता है। शरीर स्व का आश्रय है, पहचान है, वाहन है, अभिव्यक्ति है, भीतर की सारी क्रियाओं का प्रतिबिम्ब है, स्व नहीं है।

 

तब क्या बुद्धि स्व है? नहीं। बुद्धि मेरा साधन है। मेरे लिए चिन्तन करती है, निर्णय करती है, नियोजन करती है, सही-गलत का फैसला भी करती है, मन की इच्छाओं का अनुसरण करती है, सूर्य के द्वारा प्राप्त होती है, इसका निर्माण अहंकार से होता है, अत: मेरे अहंकार से जुड़ी अवश्य रहती है किन्तु स्व नहीं है।

मन भी मेरा है, मैं नहीं हूं। इसमें उठने वाली इच्छाएं भी मेरी हैं, कत्ताü बनकर रहना चाहता है, चन्द्रमा की ऊर्जाओं का अनुसरण करता है। हर इच्छा के साथ नया मन बनता है। इच्छापूर्ति के साथ ही मर जाता है।

 

शरीर का स्वार्थ है अर्थ, सुख, सुविधा, भोग। इन्द्रियां भले ही मन से जुड़ी हों, किन्तु उनके विषयों को शरीर ही भोगता दिखाई देता है। इसी भोग के साथ रोग और योग भी शरीर के ही विषय जान पड़ते हैं।

 

शरीर आत्मा का प्रवेश द्वार है। शरीर के रहते हुए आत्मा को मुक्त कराना ही जीवन का सबसे बड़ा स्वार्थ है। अत: शरीर को जानना, इसकी भाषा को समझना हमें भीतर के अदृश्य धरातलों की (मन, बुद्धि, आत्मा की) गतिविधियों की जानकारी देता है। पास में कौन व्यक्ति बैठा है, थाली में रखा कौन-सा व्यंजन आज नहीं खाना चाहिए आदि बाहरी परिस्थितियों की सूचना भी शरीर के स्पन्दन देते हैं।

 

प्रकृति के साथ शरीर का सम्बन्ध, माता-पिता, भाई-बहन आदि के साथ सम्बन्ध भी प्राकृतिक अभिव्यक्ति ही है। सत, रज, तम का स्वरूप जीवन में क्या है-भोजन में क्या है, विचारों में क्या है, यह जानना सही मार्ग पकड़ने के लिए आवश्यक है। शरीर के माध्यम से कौनसी ऊर्जाएं बाहर जाती हैं, मन के स्पन्दन हजारों-हजार मील दूर पहुंचते हैं, आभामण्डल एवं विभिन्न शक्ति केन्द्रों के माध्यम से कैसे प्राणों को समझना, उनके प्रयोग करना, वाणी (वाक्) के क्षेत्र को ब्रह्म की तरह समझ पाना, इच्छाओं के निर्माण में वाक् के स्पन्दनों की भूमिका जान लेना हमारे गहन स्वार्थ का क्षेत्र है।

 

विचार, भाषा, शब्द, अर्थ, वर्ण, आदि को जान लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि मौन को जान लेना। व्यक्ति को उसके विचारों से ही जाना जाता है। विचार ही ज्ञान का धरातल है। इनको जाने बिना ज्ञाता और ज्ञेय के साथ एकाकार हो ही नहीं सकते। ज्ञान योग के द्वारा यदि कर्मो का विपाक करना है तो विचारों की प्रकृति (सत, रज, तम) को जान लेना पहला स्वार्थ है। धर्म का उपयोग इसके बिना न समझेंगे, न ही कर पाएंगे। विचारों की उष्णता को ह्वदय की शीतलता के साथ समन्वित करना भी सुख का मार्ग है। अहंकार की शक्ति एवं दिशा पर नियंत्रण भी विचारों की प्रकृति से जुड़ा है।

 

स्वार्थ का अर्थ आम तौर पर भौतिक जगत के साथ, धन-समृद्धि के साथ ही देखा जाता है। इसको तो क्षुद्र दृष्टि या जड़ता कहा जाता है। स्वार्थ तो कामना के साथ जुड़ता है। कामना अभाव सूचक होती है। आवश्यकता अभाव में ही दिखाई पड़ती है। हर इन्द्रिय प्रतिक्षण मन को किसी विषय की ओर ले जाता है, उससे जोड़ता है, मन में विषय के प्रति आकर्षण पैदा करता है। बार-बार पैदा करता है। प्रवाह बनाता है। इस मन को जानना हमारा अति महत्वपूर्ण स्वार्थ है। इसके बिना व्यक्ति मार्ग भटक सकता है। प्रवाह पतित हो सकता है। मन संवेदनाओं का केन्द्र है। अभिव्यक्ति का धरातल है। बिना मन को समझे मनोयोग प्राप्त नहीं होगा। भक्ति मार्ग नहीं मिलेगा।

 

जीवन के सम्बन्ध नहीं बनेंगे। इस मन पर पड़े आवरणों को समझना उन्हें हटाने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह मन सृष्टि के मूल मन का प्रतिबिम्ब है। वही हमारा आत्मा है। जीवन का स्वार्थ है आत्म साक्षात्कार। स्वयं ही स्वयं को देखना। यदि यहां तक शरीर के रहते नहीं पहुंच पाए तो यह प्रमाण होगा कि हम कतई स्वार्थी नहीं हैं। न हम स्वार्थ की परिभाषा को सही अर्थो में समझ पाए। जब आत्म साक्षात्कार होता है तो सबमें एक ही स्वरूप भी नजर आता है। उसी समझ के साथ मन में निस्वार्थ प्रेम भी पैदा होगा। प्रेम का यह निस्वार्थ स्वरूप ही भक्ति है, यही मोक्ष है। हम इतने स्वार्थी बन सकें कि अपने भीतर ही ब्रह्माण्ड को, कृष्ण को पा सकें।

गुलाब कोठारी

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