Gulabkothari's Blog

जून 20, 2011

बाबा रे बाबा!

हाल ही दिवंगत हुए सत्य साई बाबा के निजी कक्ष से मिली सम्पत्ति का ब्योरा सुनकर देश स्तब्ध रह गया। स्वयं को संत ही नहीं भगवान कहने वाला व्यक्ति माया के जाल में इतना जकड़ा हुआ था कि संत की परिभाषा ही खो गई। भक्तों की श्रद्धा तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। यह भी हो जाना चाहिए कि ऎसे संतों के रूप में रहने वाले धर्म के सौदागरों को राजनीति में प्रश्रय नहीं मिले। बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग इनके आगे जब नतमस्तक होते हैं और मीडिया में प्रशस्ति ज्ञान होता है, तो आम आदमी मोह में फंस जाता है। ऎसे संतों के कार्यकलापों पर नियमित रूप से सरकार की भी दृष्टि होनी चाहिए।

 

बचपन में साधु-संतों की एक छवि गांवों में दिखाई पड़ती थी, कि वे घर के बाहर पहुंचकर आवाज लगाते थे। जैसे-अलख निरंजन! और भीतर से कोई आकर एक मुटी आटा दे जाता। कभी-कभार जैन मुनि भी आते। कथावाचक आते। इनमें कुछ तो किसी परम्परा में दीक्षित होते हैं, कुछ नहीं होते। संत शब्द तो लगता है अंग्रेजी के सेंट का अनुवाद बन गया है। साधु अपने-अपने सम्प्रदाय का प्रचार करते थे। आध्यात्मिक जीवन के प्रति जागरूकता पैदा करते थे। कुछ नागा साधु गांव के बाहर बगीचों में, चबूतरों पर धूणी जमा लेते। चिलम पीते और गांव वालो के साथ चर्चा करते।

 

एक और भी श्रेणी थी। इनके साधु अखाड़ों से जुड़े होते थे। गोरखनाथ परम्परा के लोग भी थे। सामन्त युग में ये लोग मल्ल युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्र विद्याएं सीखते थे। क्षेत्र की सुरक्षा का भार इनके पास होता था। सामन्ती युग तो समाप्त हो गया, किन्तु अखाड़े रह गए। धीरे-धीरे ये भी नागा साधुओं के रूप में पूरे देश में छा गए। हर कुंभ मेले में इन अखाड़ों को देखा जा सकता है। आज ये सब साधु हो गए। व्यसनों से भी इनका जीवन ओत-प्रोत दिखाई पड़ता है। अभी हरिद्वार कुंभ के बाद अखाड़ों के क्षेत्र में सफाई अभियान के दौरान बड़ी संख्या में शराब की खाली बोतलें मिलीं। जबकि हरिद्वार में मद्यनिषेध लागू है। साधु की शास्त्रीय कल्पना भिन्न है।

 

हर जीवनशैली में धर्म भी एक अनिवार्य घटक है। रूप भिन्नता के साथ। आज अघिकांश लोग बिना दीक्षा के साधु-संत का ताना बना लेते हैं। इसमें इनका बाहरी स्वरूप साधु का जान पड़ता है और भीतर में बिना शिक्षा-दीक्षा का। आज इस देश में साधु-संत महत्वाकांक्षी हो गए। आश्रम-ट्रस्ट बना लिए। यात्राओं के दौर तथा वैभव और यश-कीर्ति की लालसा में लिपट गए। इस देश ने वशिष्ठ और वाल्मीकि से लेकर विदुर और चाणक्य तक के स्वरूप देखे हैं। इन सबने बिना किसी लोभ-लालच के केवल राजा का मार्गदर्शन किया। लोक की समृद्धि पर आंख रखी तथा राजनीति से बाहर रहे। संत ही रहे।

 

आजादी के बाद संतों ने भी जैसे स्वतंत्रता का अनुभव किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हथियार का कारखाना चलाते थे। चन्द्रास्वामी को आप क्या कहेंगे- बाबा, तांत्रिक या सत्ता/हथियारों का दलाल? नरसिंह राव से लेकर चन्द्रशेखर तक पहुंच थी। सेंट किट्स घोटाला, लखू पाठक मामला और फेरा में भी आरोपी रहे। स्वामी चिन्मयानन्द अयोध्या मामले में भी जुड़े और मंत्री पद भी पाया। इसी प्रकार इनके साथी महन्त अवैद्यनाथ भाजपा की सक्रिय राजनीति में रहे। महंत चांदनाथ, आदित्यनाथ आदि भी राजनीति में रहे।

 

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती भी राजनीति की चपेट में आ गए। जेल भी जाना पड़ा। स्वामी अग्निवेश, साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा, प्रज्ञा ठाकुर जैसे कई नाम भी सीधे या परोक्ष रूप से सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। बाबा रामदेव ने जो अभियान एक संत के रूप में शुरू किया था, उसने भी बाद में राजनीतिक मोड़ ले लिया। अभियान ठप हो गया।

 

देश के सामने प्रश्न है कि किस को साधु-संत का दर्जा दे और किस आधार पर? क्या दीक्षित साधु को राजनीति में जाने की छूट दी जाए या गृहस्थ वेश में लौटकर ही प्रवेश करे। आज जिस प्रकार लोग संत बन रहे हैं, बदनाम हो रहे हैं, उससे नई पीढ़ी के मन में इन संतों के नाम से अविश्वास पैदा हो रहा है।

 

व्यक्ति संसार छोड़कर साधु-साध्वी बने और सत्ता के पीछे भी भागे तो संयम कैसे पाल सकता है? सत्ता से जुड़ते ही बाकी सारे कर्मकाण्ड भी जुड़ने लगते हैं। क्या आपने आसाराम बापू की भाषा सुनी है? बाबा रामदेव को बोलते सुना है? दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम मौलाना बुखारी के तो अनेक वाक्य आज भी लोगो के कानों में गूंज रहे होंगे। और ये सब धर्म के रहनुमा हंै।

 

साधु-साध्वी का चोला भी पहनो, सत्ता में भी रहो और गर्भपात भी करवाते रहो। बड़े-बड़े संतों के आश्रमों से निकले यौनाचार के किस्से देशभर में सुने जा सकते हैं। कई बड़े-बड़े आचार्यो के आश्रमों से हत्या के समाचार भी देश में फैले हैं। इससे मिलता-जुलता एक उदाहरण अजमेर का अश्लील फोटो काण्ड है। संत भिंडरावाले की घटना भी देश भूला नहीं है। तब क्या इनको डूबकर नहीं मर जाना चाहिए? लोग हैं कि फिर भी इनके आगे श्रद्धा से दण्डवत करते हैं। पश्चिम में भी ऎसे काण्ड न्यायालयों में पहुंचे हैं।

 

भीतर का आदमी सब जगह एक-सा है। क्यों नहीं ऎसे संतों को जनता वेश बदलने के लिए मजबूर करे? क्यों इनके नाम के पहले संत शब्द लगाया जाए? बल्कि इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाए? क्यों इनको धन भेंट करें? क्या दे रहे हैं आश्रमों वाले देश को-अपना अहंकार? कभी अखाड़ों में लड़ने वाले, चरस-गांजा पीने वाले भी संत और तपस्या करने वाले भी संत।

 

व्यापार करने वाले भी संत और मर्यादाहीन बोलने वाले भी संत? देश को चिन्तन करना पड़ेगा कि हम किस अज्ञान की कीमत चुका रहे हैं। क्या विरासत नई पीढ़ी के लिए छोड़ना चाहते हैं। हजारों साल पुराने कर्म और कर्म फलों की अवधारणा या धर्म और विज्ञान के समन्वय का सिद्धांत। क्यों साधुता का अपमान करने का अघिकार उनको दिया जाए? जिस धर्म का साधु सत्ता में भागीदार हो गया, मान लो धर्म बिक गया। वह धर्म के माथे पर काला टीका बन जाएगा। वोट की राजनीति को इस नुकसान से कुछ लेना-देना नहीं होता।

 

साधु के पद से जो सत्ता को बड़ा मानता है, वह मन में तो साधु है ही नहीं। समाज को क्या फिर भी ऎसे लोगों का बोझ उठाना चाहिए? क्या इनके आचरण का प्रभाव इनके साथ के उन अन्य संतों पर नहीं पड़ता जो धन और सत्ता की भूख से दूर रहकर वास्तव में संत का सा आचरण करते हैं। समय आ गया है जब जनता दूध का दूध और पानी का पानी करे। जो सत्ता मांगे, पहले उसका चोला उतरवाया जाए। ताकि उनके कारण देश के अन्य साधु-संत लांछित होने से बच सकें। विदेशियों की नजरों में देश और धर्म का सम्मान बचाया जा सके।

 

गुलाब कोठारी

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