Gulabkothari's Blog

जुलाई 4, 2011

बलिदान

कहते हैं कि जिनको मरना नहीं आता, उनको जीना भी नहीं आता। मरना कौन चाहता है- गरीब, रोगी, वृद्ध? कोई नहीं चाहता। प्रभात झा जैसे अपवाद को छोड़ दें, जो इच्छामृत्यु मांगकर स्वयं के लिए अनन्त भोगों की कामना करता जान पड़ता है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में उलझकर एक पशु की तरह जीने के स्वप्न देखता है। एक मृत्यु जबलपुर में रेलवे के मास्टर क्राफ्टमैन दसई ने देखी। कभी मृत्यु की कामना भी नहीं की। अपनी योग्यता के आधार पर प्रमोशन भी पाता रहा।

 

मृत्यु शरीर की होती है। महापुरूषों का शरीर मानवता का प्रकाश फैला देने वाली मशाल होता है। ऎसे लोग समय से पहले पैदा होते हैं। कृष्ण द्वापर में ही पैदा हो गए और आवश्यकता उनकी आज है। आज भी वे हमको उपलब्ध हैं। आजादी की जंग में कितने महापुरूष काम आए? क्या उनके बिना स्वतंत्रता का मिलना संभव था? वे कहीं भी इस मुद्दे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। ऎसे महापुरूष स्वयं को देश और देशवासियों के आगे नगण्य मानते थे। जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग है, मातृभूमि के लिए काम आ सकना। और जिन-जिन को ऎसे अवसर प्राप्त हुए, उन्होंने प्रमाणित भी कर दिखाया। हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। शहीद हो गए। जीवन को देशवासियों के भावी सुख के लिए समर्पित कर गए। कुर्बान हो गए।

 

दसई की कुर्बानी भी शहीदों की सूची में सदा जीवित रहेगी। विवेकपूर्ण ढंग से, सम्पूर्ण जागरूकता के साथ डेढ़ हजार लोगों की जीवन रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गए। एक ही बार मरता है आदमी। इनमें से कुछ मृत्यु को भी अनुष्ठान बना लेते हैं और सदा-सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

 

दसई अमर हो गए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि यदि सामान्य जन-जीवन में भी लोग देश के व्यापक हित में ऎसी कुर्बानियां देते हैं, तो सरकार उनको भी शहीदों की सूची में शामिल करे। उनके परिवारों का सम्मान किया जाए। उनके बच्चों का सिर गर्व से ऊंचा रह सके, इसमें समाज के हर वर्ग का सहयोग रहे। भ्रष्टाचार के युग में जहां बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग स्वार्थपूर्ति के लिए टूटे पड़ते हैं, वहां ऎसी शहादत युवा पीढ़ी में नए प्राण फूंकती है। इसी से देश जिन्दा रहता है।

 

यह सही है कि रेलवे ने दसई परिवार को बड़ी आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया है। किन्तु आर्थिक सुख-सुविधा की सीमा बहुत छोटी होती है। सम्मान बड़ी चीज है। नेताओं जैसा नहीं कि कुर्सी से उतरे और राम-राम से भी गए। सरकार को ऎसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे समाज में ऎसे शहीदों के प्रति एक आत्मीयता का भाव जागृत हो, श्रद्धा पैदा हो सके। इनके परिजनों का समाज में स्थान बन सके। इनके लिए भी जन समारोह किए जाएं।

 

इनका राजकीय सम्मान हो। इनकी भी प्रतिमाएं लगाई जाएं। पाठ्य पुस्तकों एवं इतिहास में इनका नाम दर्ज हो। सेना में मरने वाले हर सैनिक को पदक और ‘शहीद’ संज्ञा से नवाजा जाता है। यहां इस स्वैच्छिक बलिदान को भी क्यों नहीं उसी श्रेणी का सम्मान, ‘पk’ अलंकरण जैसे सम्मानों से अलंकृत किया जाए। तब देश में एक नई शक्ति का संचार होता रहेगा। देश सुरक्षित ही नहीं, आत्मबल के साथ आगे बढ़ता रहेगा।

 

गुलाब कोठारी

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