Gulabkothari's Blog

जुलाई 7, 2011

असंवैधानिक!!!

आजादी के साठ साल बाद लोकतांत्रिक सरकार में किसी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार स्तर की कार्यवाही, गतिविधि या किसी योजना को सर्वोच्च न्यायालय की ओर से असंवैधानिक ठहराना इस बात का प्रमाण है कि दोनों ही सरकारों का काम-काज लोकतंत्र के स्वरूप पर ही गहरी चोट करने जैसा चल रहा है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विरूद्ध चलाया गया अभियान मानवीय संवेदनाओं की सभी सीमाओं को पार चुका था। आदिवासियों को बन्दूक की नोक पर पहाड़ों से नीचे उतार कर जंगल और पहाड़ खाली करवाए जा रहे थे।

आज भी बन्दूक की नोक पर उनसे जमीनें बेचने की कार्रवाई करते रहते हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर की तरह उत्तर के अकेले जाजंगीर जिले में 35 से ज्यादा पावर प्लान्ट बनाने के करार किए जा चुके हैं और इनके लिए सार्वजनिक उपयोग के नाम पर अपरिवर्तनीय भूमि को रूपान्तरित करके उद्योगपतियों को हस्तान्तरित किया जा रहा है। जो रूकावट पैदा करेगा, उसके साथ नक्सलियों जैसा व्यवहार होगा। इसके लिए आदिवासियों को ही हथियार उपलब्ध करा दिए सरकार ने, ताकि मारे भी वही और मरे भी वही।

सर्वोच्च न्यायालय का इतने साहसपूर्ण फैसले के लिए अभिनन्दन, साधुवाद, नमन और वन्दन! आश्चर्य की बात तो यह है कि इस असंवैधानिक गतिविधि को बनाए रखने के लिए केन्द्र सरकार की हजारों करोड़ रूपए की राशि राज्य सरकार के पेट में जा रही थी। इस दौरान हुई हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, जैसे जंगलों से पेड़ काटे जाते हैं। इनमें नक्सली भी थे और बेगुनाह भी।

इसी धन से कुछ भिण्डरेवाला भी पैदा हो गए। जैसे प. बंगाल के पुरूलिया में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों को राज्य के विरूद्ध हथियार उपलब्ध कराए थे। हाल में, पिछले माह जयराम रमेश ने कुछ नए क्षेत्र भी छत्तीसगढ़ में खनन के लिए संरक्षित वन भूमि से खोल दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतंत्र की हिलती हुई जड़ों की ओर देश को चेतावनी दी है, किन्तु यह नहीं बताया कि होना क्या चाहिए। न तो केन्द्र सरकार अपने मंत्री एवं विभाग के विरूद्ध अभियोग चलाने वाली और न ही राज्य सरकार अपने किए-कराए को गलत मानने वाली।

अब या तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय आगे बढ़े या फिर राष्ट्रपति को विधि विशेषज्ञों से राय करके कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए। इतने बड़े लोकतंत्र में असंवैधानिक सरकारी गतिविधि स्वयं लोकतंत्र का भी और 125 करोड़ नागरिकों का अपमान है। उल्लेखनीय है कि माओवादी नक्सलवाद के नाम से विनायक सेन को राजद्रोह के अपराध में राज्य सरकार ने जेल में बन्द कर दिया था। उच्च न्यायालय से उसको जमानत भी नहीं मिली। उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत स्वीकार कर ली कि वहां ऎसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

अब जब उच्चतम न्यायालय ने सरकार प्रायोजित सलवा जुडूम को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया, तब क्या स्वयं राज्य सरकार पर सवालिया निशान नहीं लग जाते? अब तक हजारों करोड़ रूपए का उपयोग इसी सरकार ने ही इस असंवैधानिक गतिविधि में किया है। नक्सल समस्या के केन्द्र में जाने की तैयारी (जड़ तक पहुंचने की) न राज्य सरकार ने दिखाई है, न ही केन्द्र सरकार ने जबकि मूल रूप से उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार का ही है, जिसके निर्देशन में राज्य सरकारें काम करती हैं।

एक नक्सल क्षेत्र केन्द्रीय रूप में दण्डकारण्य (सभी छ: राज्यों की सीमा पर) के एक लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में कार्यरत है, जो संयुक्त रूप से इन प्रदेशों में सरकारों के समानान्तर कार्य करता है। इनकी आय का स्त्रोत स्थानीय लकड़ी, वन्य जीव आदि हैं।

उनके मार्ग बन्द करके सरकारें उनसे निपट सकती हैं। चन्दन तस्कर वीरप्पन की तरह। कुछ स्थानीय विद्रोही सरकारों की नीतियों से पैदा होते हैं। इनको स्वीकारने की तैयारी राज्य सरकारों की कम होती है। इस तंत्र की अपनी अर्थव्यवस्था होती है, जिसमें बड़े-बड़े औद्योगिक घराने भी जुड़े हैं। स्थानीय नागरिकों को तो हर स्थिति में अत्याचार ही सहने पड़ते हैं। राजनेता भी इनको विकसित करना नहीं चाहते। इनको आप रोटी, कपड़ा, इलाज, शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाएं तो दें। नक्सलियों के नाम सारा धन ऊपर वाले खा जाएंगे, तो क्या ये लोग प्रतिक्रिया नहीं करेंगे? इसका उत्तर भी उच्चतम न्यायालय से ही अपेक्षित है।
गुलाब कोठारी

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