Gulabkothari's Blog

जुलाई 14, 2011

हेराफेरी

हमारे यहां एक शब्द है फेर-बदल। उसका ही दूसरा रूप है हेरा-फेरी। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में जो फेरबदल हुआ, वह भी एक श्रेणी की हेराफेरी ही कही जाएगी। क्योंकि हेराफेरी के रूप में उन मंत्रियों को हटाया जाता है जिनका कार्य और आचरण सही नहीं होता या फिर जिनसे दल का अध्यक्ष नाराज होता है। आजकल दोनों ही कारण गौण हो गए।

 

भ्रष्टाचार ही वह कारण है जिस कारण एक को हटाया जाता है तथा दूसरे को अवसर दिया जाता है। दिल्ली में तो सोनिया गांधी के आगे सब गूंगे हैं, किन्तु राज्यों में स्थिति स्पष्ट दिखाई पड़ती है। भाजपा में तो हर विधायक ही मंत्रिमण्डल में रहना चाहता है। सब अपने मुख्यमंत्री के कपड़े खींचते रहते हैं।

 

समस्या बहुत बड़ी होती जा रही है। संसद के पास चिन्तन को समय नहीं है। गंभीर विषय या बिल चर्चा में आते ही शोर शुरू हो जाता है। क्योंकि जिस तरह के सदस्य चुनकर आने लगे हैं और बहुमत के अभाव में मिश्रित दलों की सरकारें बनने लगी हैं, वहां गुणवत्ता के प्रश्न हवा हो गए। संसद में सदस्य भी केवल मेरिट से आते हों ऎसा नहीं है। कई तरह की श्रेणियां-आरक्षण आदि से, जातिगत आधार पर, महिला आरक्षण के कारण गोलमा देवी जैसे सदस्य को मंत्री बनाना भी नेता के लिए लाजमी हो जाता है।

 

दल-बदलुओं की शक्ति भी फेरबदल के लिए मजबूर कर सकती है। इनमें अघिकांश सदस्य प्रदेश/देश के परिप्रेक्ष्य में चिन्तन क्षमता भी रखें, यह आवश्यक नहीं है। कई बार अपराघियों को भी मंत्री बनाना पड़ता है। मध्यप्रदेश में कई हैं। तब नेता के पास एक ही मार्ग बचता है सबको संतुष्ट करने का फेरबदल। हालांकि यह कोई समाधान नहीं, लाचारी है। इससे परिणाम सुधरते हों, ऎसा भी संभव नहीं है। बारह जुलाई के शपथ ग्रहण समारोह के चित्रों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई दे जाता है।

 

फेरबदल में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन। क्योंकि न तो उनको निकाला जा सकता, न ही वे खरे उतरे। अन्य लोगों को भी संतुष्ट करना पड़ता है। इन मामलों में जनता का अनुमान गलत भी निकल सकता है, क्योंकि जनता मेरिट को ध्यान में रखती है और नेता समीकरण को।

वैसे फेरबदल का यूपी चुनावों से ही तो लेना-देना है। वरना तो भ्रष्ट लोगों को फेरबदल के नाम पर बाहर निकालकर उन्हें सजा पाने से बचाया भी जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। अनेक मुद्दों पर चर्चाएं बदल जाती हैं, क्योंकि या तो मंत्री को हटा दिया गया या विभाग बदल गया।

 

विपक्ष स्वयं कुछ बोलने की स्थिति में आज नहीं है। मंत्री हटता है या बदल जाता है, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सजा तो उसको मिलनी ही चाहिए। होता कुछ विपरीत ही है। भ्रष्ट मंत्री ही धन लाते हैं और बांटते भी हैं। फण्ड-रेजर माने जाते हैं। वे तो दूसरों को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस देते हैं। जनता को लूट लेना, जमीनों के अतिक्रमण, हत्याएं करवाना आदि को आश्रय देने वाले होते हैं। इनका तो दलों में विशेष सम्मान होता है।

 

फेरबदल का एक कारण है शीर्ष नेताओं के मर्जीदां लोगों को जगह देना। यह बहुत नाजुक मसला है। इस पर या तो नेता चुप रहकर मान लेता है अथवा शीर्ष की त्योरियां भी चढ़ सकती हैं। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि अब राजनीति में मेरिट के जमाने लद गए। अब बहुमत से चुनने के भी मार्ग बन्द हो गए। फेरबदल के नाम पर शीर्ष नेताओं की ओर से की जाने वाली नियुक्तियां लोकतंत्र के गाल पर तमाचा हैं। इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि नया स्वरूप देश के लिए कुछ अवश्य करेगा। उसका इस दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक नहीं है।

 

पहले दौर में श्रेष्ठ मानकर लोगों को मंत्रिमण्डल में लिया जाता होगा। आगे तो बस समीकरण ही तय कराते हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि चुनाव तक अब कोई और फेरबदल नहीं होगा, तब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकार सम्मेलन में कह डाला कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था। उनकी बात से प्रधानमंत्री को ठेस पहुंच सकती है, इसकी चिंता उनको नहीं है। वे तो उनसे ज्यादा समझदार नजर आना चाहते हैं।

 

खैर, मंत्रिमण्डल फेरबदल होते रहेंगे। इनका लोकतंत्रीय व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। जरूरी है हर सदस्य को आवश्यक ज्ञान एवं अनुभव का सहारा देना। उसके लिए मात्र अघिकारियों पर छोड़ देना भी देशहित में नहीं है। क्योंकि यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा से भिन्न है।

गुलाब कोठारी

 

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